भारत में शुरू हुआ फसलों की प्रिसीजन ब्रीडिंग का नया युग

मौजूदा ब्रीडिंग तरीकों से किसी किस्म की खासियत सुधारने में 8-10 साल लगते हैं, लेकिन जीनोम एडिटिंग उन बेहतर किस्मों को 3-4 साल में डेवलप करने में मदद कर सकती है। इस तरह यह खेती की समस्याओं को न सिर्फ सही और अच्छे से, बल्कि समय पर हल करने में भी मदद करता है

भारत में शुरू हुआ फसलों की प्रिसीजन  ब्रीडिंग का नया युग

जीनोम एडिटिंग पौधों के डीएनए में सटीक और लक्षित बदलाव करके फसलों में सुधार ला रही है। इस प्रक्रिया में  बाहर से कोई जीन नहीं डाला जाता। पुराने म्यूटेशन ब्रीडिंग तरीके रैंडम केमिकल या रेडिएशन से होने वाले बदलावों पर निर्भर थे। लेकिन क्रिस्पर/कैस (CRISPR/Cas) जैसे आधुनिक टूल वैज्ञानिकों को सटीक और तेजी से प्राकृतिक म्यूटेशन जैसी सुविधा देते हैं। भारत ने एसडीएन1 और एसडीएन2 जीनोम एडिटेड पौधों को सख्त बायोसेफ्टी नियमों से छूट दी है। इसके साथ रिसर्च संस्थानों ने ज्यादा पैदावार देने वाली, जलवायु परिवर्तन-रोधी और बेहतर क्वालिटी वाली किस्मों को तेजी से आगे बढ़ाना शुरू किया है। डीआरआर (DRR) धान 100 और पूसा डीएसटी1 (DST1) जैसी सफलताएं दिखाती हैं कि कैसे जीनोम एडिटिंग ब्रीडिंग समय को कम करने के साथ उत्पादकता बढ़ा सकती है।

 जीनोम एडिटिंग क्या है और यह कैसे किया जाता है?

जैसा कि नाम से पता चलता है, यह किसी भी जीनोम (डीएनए) में टारगेटेड और सटीक एडिटिंग (म्यूटेशन) करने के लिए एक ब्रीडिंग टूल है। इसे पहले इस्तेमाल होने वाले म्यूटेशन ब्रीडिंग का बेहतर रूप कह सकते हैं। पुराना तरीका मुख्य रूप से केमिकल या रेडिएशन के जरिए किया जाता था, जिसमें पौधों या जानवरों के डीएनए को रैंडम तरीके से एडिट या म्यूटेट किया जाता था। इसलिए जीनोम एडिटिंग को एक सटीक म्यूटेशन टूल माना जा रहा है।

जीनोम एडिटिंग कई टूल्स के माध्यम से की जाती है, जिनमें सबसे खास और सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाला क्रिस्पर/कैस है। क्रिस्पर/कैस के दो मुख्य हिस्से होते हैं- गाइड आरएनए (डीएनए की वह जगह बताने के लिए जहां एडिटिंग करनी है) और कैस (Cas) प्रोटीन (पौधों के अंदरूनी रिपेयर सिस्टम की मदद से डीएनए की जरूरी कटिंग करने और जोड़ने के लिए)।

पौधे की कोशिका में प्रवेश करने के बाद ये दोनों हिस्से डीएनए में जरूरी टारगेट को एडिट करते हैं। डीएनए के टारगेट लोकेशन पर एडिट/म्यूटेशन की पुष्टि होने के बाद, शोधकर्ता सेग्रीगेशन के जरिए इन सभी बाहरी हिस्सों को हटा देते हैं। उसके बाद उन पौधों को चुना जाता है जिनमें सिर्फ टारगेटेड म्यूटेशन होते हैं, लेकिन ट्रांसजीन (गाइड आरएनए, कैस जीन वगैरह) नहीं रहते। फिर उनके प्रदर्शन का विश्लेषण करके उन्हें आगे बढ़ाया जाता है। हालांकि जीनोम एडिटेड पौधों के शुरुआती कदम ट्रांसजेनिक प्रोसेस की तरह प्रतीत होते हैं, लेकिन इनमें आखिरी प्रोडक्ट ट्रांसजीन से मुक्त होता है। इसलिए यह ध्यान रखना चाहिए कि जीनोम एडिटेड पौधे जीएम (जेनेटिकली मॉडिफाइड) फसलें नहीं हैं।

क्या जीनोम एडिटेड पौधे बौद्धिक संपदा अधिकार के तहत आते हैं और क्या किसानों को इनकी कीमत ज्यादा चुकानी पड़ेगी?

कोई भी जीनोम एडिटेड पौधा बौद्धिक संपदा अधिकार के तहत नहीं है। भारतीय पेटेंट कानून के मुताबिक इन पौधों का पेटेंट नहीं कराया जा सकता। सिर्फ क्रिस्पर/कैस टूल आईपी-प्रोटेक्टेड है। इसलिए शोधकर्ता या शोध संस्थान को कमर्शियल इस्तेमाल के लिए क्रिस्पर/कैस का लाइसेंस लेना होगा। जीनोम-एडिटेड पौधे या वैरायटी को उसे डेवलप करने वाले व्यक्ति/संस्थान का आईपी माना जाता है। इसलिए डेवलपर का इन पौधों/बीजों पर पूरा हक होता है। क्रिस्पर/कैस के कमर्शियल इस्तेमाल के लिए लाइसेंस फीस हर केस में अलग-अलग होती है। ज्यादातर नॉन-प्रॉफिट इस्तेमाल के मामलों में क्रिस्पर/कैस का आईपी होल्डर फ्री लाइसेंसिंग देता है। क्रिस्पर/कैस लाइसेंसिंग की कीमत का किसानों को बेचे जाने वाले बीज की कीमत पर कोई असर नहीं पड़ता है। जीनोम एडिटेड पौधों की वैरायटी किसी भी दूसरी इनब्रेड वैरायटी की तरह होती हैं। इसलिए किसान उनके बीजों को बचाकर रख सकते हैं और कई चक्र में साल-दर-साल उनका इस्तेमाल कर सकते हैं। किसान बीजों की उपलब्धता के लिए बीज कंपनियों पर निर्भर नहीं रहेंगे।

जीनोम एडिटेड पौधे ट्रांसजीन मुक्त हैं या नहीं, यह कौन तय और रेगुलेट करता है?

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने मार्च 2022 के एक मेमोरेंडम के जरिए जीनोम एडिटेड पौधों (एसडीएन1 और एसडीएन2) को भारत में सख्त बायोसेफ्टी नियमों से छूट दी है। डेवलपर को भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के बायोटेक्नोलॉजी विभाग के स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) के अनुसार इंस्टीट्यूट बायोसेफ्टी कमेटी (आईबीएससी) और रिव्यू कमेटी ऑन जेनेटिक मैनिपुलेशन (आरसीजीएम) को डेटा और रिपोर्ट जमा करनी होती है। इस एसओपी में बताया गया है कि जीनोम एडिटेड पौधों में ट्रांसजीन के नहीं होने और म्यूटेशन की समयुग्मता का पता लगाने के लिए कौन सा डेटा देना जरूरी है। जब आईबीएससी और आरसीजीएम डेवलपर के जमा किए गए डेटा से पूरी तरह संतुष्ट हो जाते हैं, तो वे उस खास जीनोम-एडिटेड पौधे को छूट का नोटिस/सर्टिफिकेट जारी करते हैं।

क्या दूसरे देशों में भी जीनोम एडिटेड पौधों को सख्त बायोसेफ्टी नियमों से छूट है?

भारत के अलावा, अमेरिका, चीन, ऑस्ट्रेलिया, जापान, ब्राजील, फिलीपींस, बांग्लादेश समेत लगभग 40 और देशों ने जीनोम एडिटेड पौधों को छूट दी हुई है।

क्या जीनोम एडिटेड पौधों में फर्क करने का कोई तरीका है?

ऐसा कोई तरीका नहीं है जिससे जीनोम एडिटेड पौधों को दूसरे तरीकों से म्यूटेट/ब्रेड किए गए पौधों से अलग किया जा सके। इसलिए अगर भविष्य में कुछ देश जीनोम एडिटेड पौधों के प्रोडक्ट का निर्यात करते हैं, तो हम किसी डायग्नोस्टिक तरीके के बिना इसे रोक नहीं पाएंगे। मॉलिक्यूलर स्तर पर जीनोम एडिटेड पौधे प्राकृतिक या इंड्यूस्ड म्यूटेशन से तैयार पौधों से बहुत मिलते-जुलते हैं।

क्या इन जीनोम एडिटेड पौधों से मनुष्य की सेहत या जैव-विविधता को कोई खतरा है?

जैसा कि ऊपर बताया गया है, जीनोम एडिटिंग बिल्कुल म्यूटेशन ब्रीडिंग जैसा ही है, जो 150 से ज्यादा सालों से चल रहा है। पुराने तरीके से लगभग 4000 अलग-अलग तरह के पौधों को विकसित किया गया है। म्यूटेशन ब्रीडिंग की वजह से सेहत या बायोडायवर्सिटी को कोई खतरा होने की रिपोर्ट नहीं मिली है। इसके उलट, जीनोम एडिटिंग बायोडायवर्सिटी को बचाने का एक असरदार तरीका साबित हुआ है।

क्या जीनोम एडिटेड ब्रीडिंग लाइन्स को वैरायटी रिलीज के लिए अलग तरह से ट्रीट किया जाता है?

आईबीएससी और आरसीजीएम से छूट के बाद, जीनोम एडिटेड पौधों को दूसरे प्लांट ब्रीडिंग तरीकों से बनी ब्रीडिंग लाइन्स जैसा ही ट्रीट किया जाता है। इन पौधों का ऑल इंडिया कोऑर्डिनेटेड रिसर्च प्रोजेक्ट (एआईसीआरपी) के तहत सख्त फील्ड इवैल्यूएशन किया जाता है ताकि उनकी परफॉर्मेंस, अडैप्टेशन जोन और ट्रेट वेरिफिकेशन (बायोटिक-एबायोटिक स्ट्रेस वगैरह के प्रति सहिष्णुता) का आकलन किया जा सके। इसके अलावा, सभी मौजूदा रेगुलेशन और एक्ट, जैसे सीड एक्ट 1966 और प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वैरायटीज एंड फार्मर्स राइट्स एक्ट (PPVFRA) 2001 जीनोम एडिटेड पौधों पर लागू होते हैं।

क्या जीनोम एडिटेड पौधों की किस्मों के दाम कम मिलेंगे?

जैसा कि ऊपर बताया गया है, जीनोम एडिटेड पौधे म्यूटेशन से बनी किस्मों से बहुत मिलते-जुलते हैं, और उनमें अंतर करने का कोई तरीका नहीं है, इसलिए कम दाम मिलने का सवाल ही नहीं उठता।

क्या जीनोम एडिटेड पौधों की किस्मों को खास देखभाल की जरूरत होती है?

जीनोम एडिटेड पौधों की किस्मों को किसी खास देखभाल की जरूरत नहीं होती। पानी, उर्वरक और दूसरे संसाधनों का इस्तेमाल आम तौर पर किसी भी दूसरी फसल की किस्मों जैसा ही होता है। इसके उलट, अगर जीनोम एडिटेड पौधे को किसी खास समस्या से निजात पाने के लिए बनाया गया है - जैसे कम पानी या उर्वरक का इस्तेमाल - तो इन पौधों को कम संसाधनों में ही उगाया जा सकता है।

जीनोम एडिट के इस्तेमाल के मामले में भारत कहां खड़ा है?

भारत ने खेती में जीनोम एडिटिंग के इस्तेमाल में बहुत अच्छा काम किया है। यह दुनिया का पहला देश बना जिसने जीनोम एडिटिंग से चावल की दो किस्में - डीआरआर धान 100 (कमला) और पूसा राइस डीएसटी1 तैयार की हैं। डीआरआर धान 100 को एक मशहूर चावल किस्म सांबा महसूरी से बनाया गया है, जिसका दाना बारीक होता है और पकाने-खाने में यह किस्म बहुत अच्छी लगती है।

किस्पर/कैस के जरिए साइटोकिनिन ऑक्सीडेज जीन को म्यूटेट करके हैदराबाद स्थित भारतीय चावल अनुसंधान संस्थान (आईआईआरआर) के शोधकर्ताओं ने चावल में प्लांट हॉर्मोन साइटोकिनिन का स्तर बढ़ाया है। इससे पैदावार 19% तक बढ़ जाती है और फसल जल्दी तैयार होती है (ज्यादातर सांबा महसूरी जोन में)। सबसे जरूरी बात यह है कि डीआरआर धान 100 में सांबा महसूरी के असली दाने की क्वालिटी बनी रहती है।

ध्यान देने वाली बात है कि साइटोकाइनिन ऑक्सीडेज जीन में प्राकृतिक म्यूटेशन पहले से ही मौजूद होते हैं और कुछ ज्यादा पैदावार वाली जापानी और चाइनीज चावल की किस्मों में पब्लिश भी हुए हैं। इसके अलावा, यह जगजाहिर है कि साइटोकाइनिन फाइटोहॉर्मोन का बाहरी स्प्रे चावल की ग्रोथ और पैदावार को बेहतर बनाने में मदद करता है। हालांकि यह एक महंगा तरीका है। इसलिए आईआईआरआर के शोधकर्ताओं ने अधिक पैदावार वाली चावल की किस्मों में मौजूद प्राकृतिक म्यूटेशन के तरीके को अपनाकर उन्हें बेहतर बनाया।

इसी तरह पूसा राइस डीएसटी1 को एक बहुत लोकप्रिय चावल की किस्म एमटीयू1010 (MTU1010) से डेवलप किया गया है। इसके मामले में नई दिल्ली स्थित भारतीय कृषि शोध संस्थान (आईएआरआई) के शोधकर्ताओं ने क्रिस्पर/कैस से सूखा और क्षारीय मिट्टी को झेलने वाले डीएसटी1 नाम के जीन को म्यूटेट किया। डीएसटी1 में प्राकृतिक म्यूटेशन वाली चावल की किस्में दूसरे देशों में सूखा और क्षारीय इलाकों में पहले से ही उगाई जा रही हैं। इसलिए आईएआरआई के शोधकर्ताओं ने एमटीयू1010 के डीएसटी1 जीन में प्राकृतिक म्यूटेशन के तरीके को अपनाया ताकि इसे सूखा और नमक टॉलरेंट बनाया जा सके। सामान्य मिट्टी और ग्रोथ की परिस्थितियों में पूसा राइस डीएसटी1 की पैदावार एमटीयू1010 के बराबर है। लेकिन क्षारीय, इनलैंड सैलिनिटी और कोस्टल सैलिनिटी वाली परिस्थितियों में पूसा राइस डीएसटी1 ने मूल किस्म एमटीयू1010 की तुलना में क्रमशः 14.66%, 9.66% और 30.36% अधिक उपज दी।

डीआरआर धान 100 (कमला) और पूसा राइस डीएसटी1 दोनों को मौजूदा नियमों और रेगुलेशन के हिसाब से विकसित और आकलन किया गया है। इन दोनों वैरायटी को मई 2023 में बायोसेफ्टी रेगुलेटरी बॉडी ने आईबीएससी और आरसीजीएम को सौंपे गए पूरे डेटा और रिपोर्ट की जांच के बाद छूट दी थी। आईबीएससी और आरसीजीएम ने पता लगाया कि डीआरआर धान 100 (कमला) और पूसा राइस डीएसटी1 में कोई फॉरेन जीन नहीं है और टारगेट जीन (कमला के मामले में साइटोकाइनिन ऑक्सीडेज और पूसा राइस डीएसटी1 के मामले में डीएसटी1) म्यूटेशन समयुग्म हैं। छूट के बाद इन दोनों जीनोम एडिटेड म्यूटेंट लाइन्स (कमला और पूसा राइस डीएसटी1) को ऑल इंडिया कोऑर्डिनेटेड रिसर्च प्रोजेक्ट ऑन राइस (AICRPR) के तहत फील्ड आकलन किया गया।

आइसोजेनिक और जीनोम एडिटेड लाइन्स के लिए दो साल के मानक मल्टी-लोकेशन फील्ड आकलन का सख्ती से पालन किया गया। यह बात ध्यान देने योग्य है कि ऑल इंडिया कोऑर्डिनेटेड रिसर्च प्रोजेक्ट ऑन राइस के तहत जांची गई ब्रीडिंग लाइनें ब्लाइंड-कोडेड होती हैं। इसलिए, अलग-अलग सेंटर पर इन लाइनों की जांच करने वाले रिसर्चर्स को उनकी पहचान का पता नहीं चलता है। डीआरआर धान 100 (कमला) और पूसा चावल डीएसटी1 की अपनी-अपनी पेरेंट वैरायटी के मुकाबले बेहतर परफॉर्मेंस साबित होने के बाद, इन दोनों जीनोम-एडिटेड लाइनों की पहचान वैरिएटल आइडेंटिफिकेशन कमेटी ने मई 2025 में एक वैरायटी के तौर पर की।

चावल की इन दो किस्मों के अलावा, ज्यादा पैदावार और खुशबू के लिए डेवलप की गई चावल की तीन और जीनोम एडिटेड लाइनें एआईसीआरपीआर के तहत फील्ड में जांची जा रही हैं। साथ ही, कम ग्लूकोसाइनोलेट वाली सरसों को एनआईपीजीआर नई दिल्ली ने जीनोम एडिटिंग से विकसित किया है। यह कैनोला की तरह सरसों के तेल की क्वालिटी को बेहतर बनाने के लिए किया गया है। सरसों की जीनोम-एडिटेड लाइन एआईसीआरपी फील्ड टेस्टिंग के आखिरी साल में है। इसके अलावा, 25 से ज्यादा अलग-अलग इंस्टीट्यूट/लैब तिलहन, दालें, अनाज, बाजरा और बागवानी फसलों के गुणों में सुधार पर काम कर रहे हैं। साथ ही, आईजीआईबी नई दिल्ली और सीआरआरआई कटक के भारतीय वैज्ञानिकों ने स्वदेशी जीनोम एडिटिंग टूल डेवलप किए हैं, जिनका इस्तेमाल आने वाले समय में बेहतर गुणों वाली जीनोम एडिटेड फसलों की डिलीवरी में तेजी लाने के लिए किया जा सकता है।

भारतीय खेती के लिए जीनोम एडिटिंग से क्या उम्मीदें हैं?

चावल और गेहूं जैसी मुख्य फसलों की उत्पादकता बढ़ाकर भारत कुल अनाज उत्पादन से समझौता किए बिना इन फसलों का रकबा कम कर सकता है। देश के 146 करोड़ से ज्यादा लोगों की खाद्य सुरक्षा के लिए अनाज उत्पादन से समझौता नहीं किया जा सकता है। इस तरह बचाई गई जमीन को दलहन और तिलहन की तरफ डायवर्सिफाई किया जा सकता है। खेती में वास्तविक आत्मनिर्भरता पाने के लिए इन फसलों की पैदावार को मजबूत करना बहुत जरूरी है। एडवांस जीनोम एडिटिंग, खेती के खास गुणों के लिए बेहतर एलील (जीन के रूप) बनाकर दलहन और तिलहन की उत्पादकता बढ़ाने का एक बेहतर तरीका देती है। इससे इन पारंपरिक रूप से कम पैदावार वाली फसलों में जेनेटिक फायदे तेजी से मिलते हैं।

जीनोम एडिटिंग का इस्तेमाल प्रमुख फसल किस्मों में कीटों और बीमारियों से लड़ने की क्षमता और जलवायु परिवर्तन-रोधी क्षमता विकसित करने के लिए भी किया जा सकता है। इससे कीटनाशकों का इस्तेमाल कम होगा है और पर्यावरण को मदद मिलेगी। सबसे जरूरी बात यह है कि जीनोम एडिटिंग खेती की अनेक समस्याओं का तुरंत समाधान दे सकती है। उदाहरण के लिए, चावल में मौजूदा ब्रीडिंग तरीकों से किसी किस्म की खासियत सुधारने में 8-10 साल लगते हैं, लेकिन जीनोम एडिटिंग उन बेहतर किस्मों को 3-4 साल में डेवलप करने में मदद कर सकती है। इस तरह यह खेती की समस्याओं को न सिर्फ सही और अच्छे से, बल्कि समय पर हल करने में भी मदद करता है।

हर टेक्नोलॉजी को विकसित करने और उसका पूरा लाभ पाने के लिए समय चाहिए। जो बात सच में मायने रखती है, वह है काम करते रहने और उसे बेहतर बनाने की हमारी प्रतिबद्धता। लगातार कोशिश और सकारात्मक सोच के साथ बेहतरीन बनना भी जरूरी हो जाता है। किसी दूसरे ब्रीडिंग टूल की तरह जीनोम एडिटिंग भी आने वाले सालों में बहुत काम की साबित होगी, बशर्ते हम इस समय इसका समर्थन करें और सही दिशा में ले जाएं। सर्वोत्तम ब्रीडिंग टेक्नोलॉजी के लिए मदद न सिर्फ इस देश के युवा शोधकर्ताओं को प्रेरित करेगी, बल्कि बायोलॉजी और कृषि क्षेत्र ग्रेजुएट्स को नौकरी देने वाली एक बड़ी इंडस्ट्री के तौर पर भी उभरेगा।

(सतेन्द्र कुमार मंगरौठिया, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ राइस रिसर्च (आईआईआईआई) हैदराबाद में प्रिंसिपल साइंटिस्ट हैं)

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