फसल 70 प्रतिशत खराब, रिकॉर्ड में शून्य: राजस्थान में फसल बीमा पर बड़ा सवाल
राजस्थान में फसल बीमा गड़बड़ियों की जांच का ऐलान, किसानों की मांग - पूरा नेटवर्क हो बेनकाब
राजस्थान विधानसभा में कृषि मंत्री डॉ. किरोड़ीलाल मीणा द्वारा फसल बीमा योजना में गड़बड़ियों की एसओजी जांच की घोषणा ने वर्षों से संघर्ष कर रहे किसानों की लड़ाई को एक तरह से वैधता दी है। मंत्री का यह कहना कि राज्य में फसल बीमा योजना में गड़बड़ी कर संगठित अपराध किया जा रहा है और इसके पीछे माफिया सक्रिय है, केवल एक बयान नहीं बल्कि उस पीड़ा की स्वीकारोक्ति है जिसे किसान लंबे समय से झेलते आ रहे हैं।
कृषि मंत्री ने विधानसभा में श्रीगंगानगर जिले का उदाहरण देते हुए बताया कि जहां वास्तव में 70 प्रतिशत तक फसल खराब थी, वहां बीमा कंपनी के सर्वेयर ने मिलीभगत कर नुकसान शून्य प्रतिशत दिखा दिया। इस हेराफेरी के चलते किसानों को करीब 128 करोड़ रुपये का बीमा क्लेम नहीं मिला। मंत्री के अनुसार सर्वेयर ने स्वयं हस्ताक्षर कर रिपोर्ट तैयार की और नुकसान को कागजों में गायब कर दिया।
मंत्री ने बताया कि बीमा कंपनी प्रथम दृष्टया हमारी नजर में डिफॉल्टर है और इसलिए हमने केंद्र सरकार को पत्र लिखा है कि इस मामले में शामिल कंपनी को टेंडर नहीं दिया जाए। इस कंपनी को राजस्थान में काम नहीं मिलना चाहिए।
इस मामले की एफआईआर (नंबर 0210) श्रीगंगानगर जिले के रावला पुलिस थाने में क्षेमा जनरल इंश्योरेंस लिमिटेड के खिलाफ दर्ज कराई गई है। एफआईआर में सर्वे कंपनी का भी जिक्र है। एफआईआर के अनुसार जिस नुकसान को शून्य प्रतिशत दिखाया गया है, वह खराबा रबी 2023-24 में रावला क्षेत्र के गांवों में हुआ था। आरोप है कि सर्वेयर ने किसानों और सरकारी कर्मचारियों के हस्ताक्षर स्वयं कर दिए।
लंबी है आंदोलन की पृष्ठभूमि
राज्य के विभिन्न जिलों में फसल बीमा को लेकर किसान आंदोलित होते रहे हैं। श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जिलों में किसानों ने बीमा क्लेम के लिए वर्षों तक संघर्ष किया है। कभी तहसील मुख्यालयों पर धरने, कभी जिला स्तर तक प्रदर्शन—किसानों की यह लड़ाई एक-दो मौसम की नहीं बल्कि लगभग एक दशक की है। इसके बावजूद लंबे समय तक उनकी शिकायतों को या तो नजरअंदाज किया गया या यह कहकर खारिज कर दिया गया कि रिकॉर्ड में नुकसान नहीं है। अब विधानसभा में मंत्री के बयान से स्पष्ट हो गया है कि रिकॉर्ड ही संदिग्ध थे।

हनुमानगढ़ में फसल बीमा क्लेम देने की मांग को लेकर प्रदर्शन के मौके पर सभा का दृश्य। फाइल फोटो
किसान महापंचायत का सवाल
किसान महा पंचायत के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामपाल जाट ने एसओजी जांच की घोषणा का स्वागत करते हुए कहा कि यह सिर्फ पहला कदम है। जांच इस सवाल तक सीमित नहीं रहनी चाहिए कि गड़बड़ी हुई या नहीं, बल्कि यह भी सामने आना चाहिए कि इसमें कौन-कौन शामिल था।
रामपाल जाट का कहना है कि अगर किसी क्षेत्र में 70 प्रतिशत तक खराबा था और उसे शून्य दिखा दिया गया तो इसके लिए केवल बीमा कंपनी ही नहीं बल्कि उन सरकारी विभागों की भूमिका भी जांच के दायरे में आनी चाहिए, जिनका काम क्रॉप कटिंग करना और उसकी रिपोर्ट तैयार करना है। बीमा कंपनी क्लेम क्रॉप कटिंग के आधार पर देती है और यह प्रक्रिया कृषि व राजस्व विभाग की संयुक्त जिम्मेदारी होती है। जाट कहते हैं कि अगर वास्तव में नुकसान हुआ था तो क्रॉप कटिंग रिपोर्ट में वह क्यों नहीं दिखा—यह सवाल अब जांच का केंद्र होना चाहिए।
हनुमानगढ़ की कहानी: सिस्टम पर सवाल
हनुमानगढ़ में पिछले करीब एक दशक से किसानों को बीमा क्लेम दिलाने के लिए आंदोलन कर रहे अखिल भारतीय किसान संघ के जिला महासचिव मंगेज चौधरी का कहना है कि इतनी बड़ी गड़बड़ी अकेले किसी कंपनी के बूते की बात नहीं हो सकती। इसमें प्रभावशाली लोग, अफसर और नेता सभी शामिल हो सकते हैं।
चौधरी सवाल उठाते हैं कि जब क्रॉप कटिंग के समय पटवारी और कृषि पर्यवेक्षक मौके पर मौजूद रहते हैं, जिला कलेक्टर और उपखंड अधिकारी इसकी मॉनिटरिंग करते हैं, फिर जिला स्तरीय शिकायत निवारण समिति, राज्य स्तरीय समिति और राष्ट्रीय समिति हर महीने बैठकें करती हैं, तो इसके बावजूद घोटाले कैसे हो रहे हैं? और अगर हो रहे हैं तो ये संस्थाएं अपनी जिम्मेदारी क्यों नहीं निभा रहीं?
ये हैं गड़बड़ी के तरीके
मंगेज चौधरी के अनुसार फसल बीमा में गड़बड़ी के कई तरीके सामने आए हैं। पहला, क्रॉप कटिंग के बाद जब खराबे की रिपोर्ट तैयार हो जाती है तो बीमा कंपनी उस पर आपत्ति लगाकर भुगतान रोक देती है। दूसरा, इससे भी गंभीर तरीका यह है कि किसान द्वारा प्रीमियम भरकर ली गई बीमा पॉलिसी को अलग-अलग बहानों से निरस्त कर दिया जाता है।
चौधरी बताते हैं कि हनुमानगढ़ जिले में 2021 से 2024 के बीच ई-मित्र केंद्रों के माध्यम से ली गई लगभग सभी पॉलिसियों को कंपनी ने बिना ठोस कारण बताए खारिज कर दिया। इन पॉलिसियों पर बनने वाला क्लेम करीब 500 करोड़ रुपये था। इसे क्यों खारिज किया गया, यह आज तक किसानों को नहीं बताया गया। यह भी जांच का बड़ा विषय है।
500 करोड़ से 150 करोड़ तक
चौधरी बताते हैं कि खरीफ 2023 का मामला इस पूरी व्यवस्था की तस्वीर साफ कर देता है। पहले 171 करोड़ रुपये का क्लेम जारी हुआ, लेकिन बाद में कंपनी ने यह कहकर भुगतान रोक दिया कि क्रॉप कटिंग ही गलत हुई है। जबकि पटवारी और कृषि पर्यवेक्षकों के पास खराबे के वीडियो साक्ष्य मौजूद थे। आखिरकार राज्य स्तरीय समिति ने सैटेलाइट आंकड़ों के आधार पर करीब 150 करोड़ रुपये का क्लेम देने का निर्णय किया। यानी जो नुकसान 500–600 करोड़ रुपये तक आंका जा रहा था, उसे 150 करोड़ रुपये में समेट दिया गया। यह भी नुकसान को कम दिखाने और जिम्मेदारी से बचने का एक तरीका माना जा रहा है।
हर मौसम में आंदोलन
हनुमानगढ़ के माकपा नेता रघुवीर वर्मा कहते हैं कि पिछले एक दशक में ऐसा कोई रबी या खरीफ सीजन नहीं गया, जब किसानों को बीमा क्लेम के लिए आंदोलन न करना पड़ा हो। हर बार फसल खराबा हुआ और हर बार किसानों को अपने हक के लिए भटकना पड़ा। आज भी कई मामले लंबित हैं। वर्मा के अनुसार कृषि मंत्री की घोषणा ने कम से कम यह तो साबित कर दिया है कि किसान गलत नहीं थे। सरकार ने आज किसानों को सही ठहराया है। अब जरूरत है कि यह जांच कागजों तक सीमित न रहे।
अब आगे क्या?
श्रीगंगानगर में संयुक्त किसान संघर्ष मोर्चा के प्रवक्ता सुभाष सहगल कहते हैं कि फसल बीमा का क्लेम लेना किसानों के लिए हमेशा एक चुनौती रहा है। अगर सब कुछ नियमों के तहत और पारदर्शिता से होता तो किसानों को आंदोलन न करने पड़ते। आगे निष्पक्ष जांच हो, यह जरूरी है।
रामपाल जाट कहते हैं कि विधानसभा में हुई यह घोषणा किसानों के लंबे संघर्ष का एक पड़ाव भर है। असली परीक्षा अब शुरू होगी। वह पूछते हैं—क्या एसओजी जांच दोषियों तक पहुंचेगी? क्या लंबित बीमा क्लेम का निपटारा होगा? और क्या भविष्य में फसल नुकसान का आकलन पारदर्शी बनेगा?

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