कॉटन में कैसे आएगी आत्मनिर्भरता: 16 माह में 21 हजार करोड़ रुपये की 76 लाख गांठों का आयात
पिछले 16 महीनों में भारत ने 21 हजार करोड़ रुपये मूल्य की 76 लाख गांठ कॉटन का आयात किया है, जिसमें बड़ी हिस्सेदारी देश में उत्पादित होने वाली मीडियम और स्मॉल लिंट कॉटन की है। आयात शुल्क समाप्त करने के चलते आयात में तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इससे कपास किसानों, एमएसपी व्यवस्था और कॉटन कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया की वित्तीय स्थिति पर गंभीर दबाव बन गया है।
पिछले 16 महीनों में कपास के मोर्चे पर देश ने दो बड़े घटनाक्रम देखे। पहला, पिछले साल (2025-26) के बजट में कॉटन मिशन लॉन्च किया गया, ताकि देश में कपास का उत्पादन बढ़ाया जा सके, जिसमें पिछले दस वर्षों में करीब 25 फीसदी की गिरावट आई है। वहीं अक्टूबर 2024 से जनवरी 2026 के दौरान देश में 21 हजार करोड़ रुपये मूल्य की 76 लाख गांठ (170 किलो प्रति गांठ) कॉटन का आयात किया गया।
इसमें 43 लाख गांठ कॉटन का आयात पिछले कॉटन वर्ष (अक्टूबर 2024 से सितंबर 2025) में हुआ, जबकि 33 लाख गांठ कॉटन का आयात चालू कॉटन वर्ष के पहले चार महीनों (अक्टूबर 2025 से जनवरी 2026) में ही हो चुका है।
ये आंकड़े चिंताजनक इसलिए हैं क्योंकि सरकार द्वारा 19 अगस्त 2025 से 31 दिसंबर 2025 के बीच आयात शुल्क समाप्त करने के बाद आयात में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई। सरकार के पहले नोटिफिकेशन में 19 अगस्त से 30 सितंबर 2025 तक शुल्क मुक्त कॉटन आयात की अनुमति दी गई थी। लेकिन इसके दस दिन बाद ही शुल्क मुक्त आयात की अवधि 31 दिसंबर 2025 तक बढ़ा दी गई। इसका नतीजा यह हुआ कि जरूरत से कहीं अधिक कॉटन का आयात हुआ।
वहीं 2 फरवरी को घोषित भारत-अमेरिका व्यापार समझौते (ट्रेड डील) और उसके बाद जारी अंतरिम फ्रेमवर्क के मुताबिक अमेरिका से कॉटन आयात पर शुल्क में रियायत की बड़ी संभावना है, और यह शुल्क मुक्त भी हो सकता है। केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के बयानों में भी इसके स्पष्ट संकेत मिले हैं।
उद्योग सूत्रों से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, 16 माह में हुए 76 लाख गांठ कॉटन आयात में 18,350 करोड़ रुपये की 12,03,500 टन मीडियम और स्मॉल लिंट कॉटन शामिल है, जिसका उत्पादन भारत में होता है। वहीं 2,650 करोड़ रुपये की 88,500 टन एक्स्ट्रा लॉन्ग लिंट कॉटन है, जिसका देश में उत्पादन नहीं होता और जिसकी आवश्यकता आयात से ही पूरी होती है। एक्स्ट्रा लॉन्ग लिंट कॉटन का आयात अभी भी शुल्क मुक्त है।
जहां तक देश में कॉटन के उत्पादन और खपत की बात है, वर्ष 2025-26 में 292 लाख गांठ उत्पादन का सरकारी अनुमान जारी किया गया है। उद्योग के मुताबिक देश में कॉटन की खपत 315 से 330 लाख गांठ के बीच रहती है। कॉटन एसोसिएशन के अनुसार, 2013-14 में देश में कॉटन का उत्पादन 398 लाख गांठ तक पहुंच गया था। उसके बाद से प्रति हेक्टेयर उत्पादकता घटने से उत्पादन में गिरावट आई है। साथ ही 2025-26 में कपास का रकबा भी घटा है, जिसकी वजह फसल में बीमारी और कीमतों में गिरावट रही।
देश के किसानों की मुश्किल केवल प्रस्तावित ट्रेड डील के तहत अमेरिका से सस्ते कॉटन आयात की नहीं है। बांग्लादेश के साथ करीब चार अरब डॉलर के निर्यात कारोबार पर भी संकट मंडरा रहा है। भारत बांग्लादेश को करीब तीन अरब डॉलर का यार्न और एक अरब डॉलर की कॉटन निर्यात करता है। लेकिन बांग्लादेश और अमेरिका के बीच हुए व्यापार समझौते के बाद संभावना है कि अमेरिका वहां कॉटन निर्यात बढ़ाएगा और बांग्लादेश के टेक्सटाइल उत्पादों को अमेरिका में शुल्क रियायत मिलेगी, जो शून्य भी हो सकती है। ऐसी स्थिति में भारत को झटका लगना तय है।
इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया के साथ हुए व्यापार समझौते में वहां से तीन लाख टन उच्च गुणवत्ता वाली लॉन्ग स्टेपल कॉटन का शुल्क मुक्त आयात करने का प्रावधान है।
किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) सुनिश्चित करने के लिए सरकार की अधिकृत एजेंसी कॉटन कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (सीसीआई) कपास की खरीद करती है। पिछले साल के एमएसपी के आधार पर कॉटन की लागत 59,700 रुपये प्रति कैंडी बैठी थी। पिछले सीजन के स्टॉक की करीब 94 लाख कैंडी कॉटन की बिक्री सीसीआई लगभग पूरी कर चुका है। आयात शुल्क समाप्त होने के बाद कीमतें घटकर 52 से 53 हजार रुपये प्रति कैंडी रह गईं, जो इससे पहले करीब 60 हजार रुपये प्रति कैंडी थीं।
चालू सीजन के एमएसपी के आधार पर सीसीआई के लिए कॉटन की लागत 61,900 रुपये प्रति कैंडी आ रही है। सीसीआई किसानों से कपास (बिनौला सहित) खरीदती है, जिसमें जिनिंग के बाद 33.9 फीसदी आउटटर्न और करीब 2,300 रुपये प्रति कैंडी का खर्च आता है। ऐसे में 2025-26 सीजन के लिए तय एमएसपी के आधार पर कॉटन की लागत 61,900 रुपये प्रति कैंडी बैठती है, जबकि बाजार में भाव 52 से 54 हजार रुपये प्रति कैंडी के आसपास हैं। इससे स्पष्ट है कि पिछले साल नुकसान झेल चुकी सीसीआई को इस वर्ष भी घाटे में बिक्री करनी पड़ सकती है।
भारत-अमेरिका ट्रेड डील की घोषणा के बाद अमेरिकी कॉटन के दाम में 1,500 से 1,800 रुपये प्रति कैंडी की बढ़ोतरी हो चुकी है। बाजार विश्लेषकों का कहना है कि भारत को अमेरिकी कॉटन के शुल्क मुक्त निर्यात की संभावनाओं के चलते यह तेजी आई है। फिलहाल अफ्रीका से आयातित कॉटन की कीमत करीब 61 हजार रुपये प्रति कैंडी है, जबकि अमेरिका से शुल्क मुक्त आयात की स्थिति में यह लागत लगभग 57 हजार रुपये प्रति कैंडी होगी।
कॉटन ट्रेड विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका से आयात की स्थिति में भारतीय सूत एवं कपड़ा उद्योग को अमेरिकी कॉटन का कीमत निर्धारण सीसीआई की बिक्री कीमत और अफ्रीका एवं ब्राजील से आयातित कॉटन की शुल्क युक्त कीमत के आसपास ही करना होगा। इसका सीधा लाभ अमेरिकी बहुराष्ट्रीय निर्यातक कंपनियों को मिलेगा और संभव है कि इसका केवल एक छोटा हिस्सा ही अमेरिकी किसानों तक पहुंचे।
अमेरिका से कॉटन निर्यात करने वाली प्रमुख कंपनियों में एडीएम, बुंगे, कारगिल और लुई ड्राइफस शामिल हैं, जिन्हें कमोडिटी ट्रेडिंग की एबीसीडी कंपनियां भी कहा जाता है।
यह जरूरी नहीं कि अमेरिका से शुल्क मुक्त आयात का बहुत बड़ा लाभ भारतीय टेक्सटाइल उद्योग को मिले। लेकिन सस्ता आयात देश के कपास किसानों के लिए गंभीर चुनौती जरूर खड़ी करेगा। जिस तरह चालू सीजन में बड़ी संख्या में किसानों को एमएसपी से कम कीमत पर अपनी फसल बेचनी पड़ी, वह आने वाले कठिन दिनों का संकेत है।

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