मजबूत जीडीपी के बावजूद कृषि क्षेत्र में धीमी ग्रोथ, ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुस्ती का संकेत

वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की जीडीपी वृद्धि 7.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है, लेकिन दूसरे अग्रिम आंकड़े बताते हैं कि यह वृद्धि संतुलित नहीं है। विनिर्माण और सेवा क्षेत्र तेज़ी से बढ़ रहे हैं, जबकि कृषि महज 2.4 प्रतिशत की दर से बढ़ी है। अक्टूबर–दिसंबर तिमाही में कृषि वृद्धि घटकर 1.4 प्रतिशत रह गई, जिससे ग्रामीण मांग पर दबाव बढ़ा है

मजबूत जीडीपी के बावजूद कृषि क्षेत्र में धीमी ग्रोथ, ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुस्ती का संकेत

वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की अर्थव्यवस्था 7.6 प्रतिशत की मजबूत दर से बढ़ने का अनुमान है, जबकि पुरानी सीरीज के आंकड़ों के अनुसार यह वृद्धि 7.4 फीसदी थी। जीडीपी के दूसरे अग्रिम अनुमानों से स्पष्ट है कि यह वृद्धि संतुलित नहीं है। विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में तेजी आई है लेकिन कृषि क्षेत्र पिछड़ रहा है। ये आंकड़े अर्थव्यवस्था में एक असंतुलन की ओर इशारा करते हैं। जीडीपी वृद्धि मजबूत हो रही है, लेकिन कृषि अर्थव्यवस्था और उसके साथ जुड़ी ग्रामीण मांग धीमी गति से बढ़ रही है।

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में कृषि, पशुपालन, वानिकी और मत्स्य क्षेत्र की वास्तविक वृद्धि दर केवल 2.4 प्रतिशत रही। यह कुल जीडीपी वृद्धि दर का लगभग एक-तिहाई है और विनिर्माण तथा सेवा क्षेत्र में दर्ज वृद्धि से काफी कम है।

अक्टूबर–दिसंबर तिमाही, जो आमतौर पर खपत के लिहाज से सबसे अहम मानी जाती है, में यह अंतर और स्पष्ट दिखा। जहां कुल जीडीपी 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ी, वहीं कृषि क्षेत्र की वृद्धि घटकर लगभग 1.4 प्रतिशत रह गई। इसका सीधा असर त्योहारी सीजन की ग्रामीण मांग पर पड़ा।

यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जीडीपी में हिस्सेदारी घटने के बावजूद कृषि अब भी देश के 40 प्रतिशत से अधिक कार्यबल को रोजगार देती है। कृषि क्षेत्र में 2 प्रतिशत से कम तिमाही वृद्धि का अर्थ है कि ग्रामीण परिवारों की वास्तविक आय में बहुत मामूली बढ़ोतरी हुई। इसका सीधा असर बड़े पैमाने पर बिकने वाले उपभोक्ता उत्पादों और सेवाओं की मांग पर पड़ता है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुस्ती

वित्त वर्ष 2025-26 में कृषि क्षेत्र की 2.4 प्रतिशत वृद्धि केवल ग्रामीण अर्थव्यवसथा में लगातार बनी हुई सुस्ती को दर्शाती है। तुलना करें तो विनिर्माण क्षेत्र में 11.5 प्रतिशत, सेवा क्षेत्र में 9.0 प्रतिशत और कुल सकल मूल्य वर्धन (GVA) में 7.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है

संशोधित जीडीपी श्रृंखला के तहत लगातार दूसरे वर्ष कृषि और बाकी अर्थव्यवस्था के बीच का अंतर बढ़ा है। मौसम की अनिश्चितता और फसल चक्र के प्रभाव को समायोजित करने के बाद भी अर्थशास्त्रियों का कहना है कि कृषि उत्पादन वृद्धि जनसंख्या वृद्धि से थोड़ा-बहुत ही अधिक है, जिससे प्रति व्यक्ति कृषि आय लगभग स्थिर बनी हुई है।

हालांकि अधिकारियों ने संकेत दिया है कि रबी उत्पादन के अंतिम अनुमान आने के बाद आंकड़ों में ऊपर की ओर संशोधन संभव है, लेकिन व्यापक रुझान यह बताता है कि तेज वृद्धि के दौर में कृषि अब स्थिरता प्रदान करने वाली ताकत नहीं रह गई है।

खपत बढ़ी, लेकिन कृषि से नहीं

वित्त वर्ष 2025-26 में निजी अंतिम उपभोग व्यय (PFCE) में 7.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जो घरेलू खर्च में सुधार का संकेत है। हालांकि इस उपभोग की संरचना अब अधिक शहरी केंद्रित दिखाई देती है।

नई जीडीपी श्रृंखला के तहत उपभोग अब जीडीपी का 56.7 प्रतिशत है, जो पूर्व आधार वर्षों की तुलना में कम है। विश्लेषकों का मानना है कि यह कृषि और असंगठित क्षेत्र में कमजोर आय वृद्धि को दर्शाता है, जबकि वेतनभोगी शहरी परिवार सेवा क्षेत्र की वृद्धि और आसान ऋण उपलब्धता से लाभान्वित हो रहे हैं।

परिणामस्वरूप, कुल मिलाकर उपभोग में सुधार दिखता है, लेकिन यह ग्रामीण भारत तक गहराई से नहीं पहुंच पा रहा, जिससे व्यापक मांग वृद्धि को स्थायी आधार नहीं मिल रहा।

नई जीडीपी श्रृंखला से अंतर स्पष्ट

जीडीपी का आधार वर्ष 2022–23 करने से यह अंतर और स्पष्ट हो गया है। संशोधित ढांचे के तहत सकल स्थिर पूंजी निर्माण (GFCF) जीडीपी का 31.7 प्रतिशत हो गया है, जो निवेश-आधारित वृद्धि के बढ़ते महत्व को दर्शाता है।

उच्च निवेश दीर्घकालीन क्षमता निर्माण के लिए सकारात्मक है, लेकिन आंकड़े संकेत देते हैं कि पूंजी निर्माण कृषि आय वृद्धि से कहीं आगे निकल रहा है। इतिहास बताता है कि जब निवेश वृद्धि ग्रामीण आय वृद्धि के साथ संतुलित नहीं होती, तो सुधार असमान और अस्थिर हो सकता है।

विनिर्माण और सेवाएं

कृषि से इतर, वित्त वर्ष 2025-26 के अनुमान वृद्धि के प्रमुख स्रोतों में बदलाव का संकेत देते हैं। विनिर्माण 11.5 प्रतिशत की वृद्धि के साथ सबसे मजबूत क्षेत्र बनकर उभरा, और वर्ष के अधिकांश समय दोहरे अंकों में बढ़ता रहा। इसके विपरीत निर्माण क्षेत्र की वृद्धि 7.1 प्रतिशत पर धीमी रही, जो किफायती आवास और श्रम-प्रधान गतिविधियों में सुस्ती को दर्शाती है। इसका सीधा असर ग्रामीण और प्रवासी रोजगार पर पड़ता है।

सेवा क्षेत्र 9 प्रतिशत की वृद्धि के साथ स्थिरता प्रदान करता रहा, जिसमें व्यापार, परिवहन, वित्त और रियल एस्टेट प्रमुख रहे। हालांकि सार्वजनिक प्रशासन और रक्षा क्षेत्र में अपेक्षाकृत धीमी वृद्धि दर्ज की गई, जो संभवतः राज्यों के स्तर पर सीमित खर्च को दर्शाती है। यह खर्च परंपरागत रूप से ग्रामीण मांग को समर्थन देता रहा है।

कृषि वृद्धि क्यों अहम 

हालांकि जीडीपी में कृषि की हिस्सेदारी घटी है, लेकिन उसका व्यापक आर्थिक महत्व अब भी बड़ा है। कमजोर कृषि वृद्धि ग्रामीण उपभोग को सीमित करती है। जिससे शुरुआती स्तर के विनिर्मित उत्पादों की मांग घटाती है तथा क्षेत्रीय और आय असमानता को बढ़ाती है।

वित्त वर्ष 2025-26 के आंकड़े बताते हैं कि ऊंची जीडीपी वृद्धि के साथ ग्रामीण ठहराव सह-अस्तित्व में रह सकता है, लेकिन यह स्थिति लंबे समय में अस्थिर हो सकती है।

भावी संकेत

अधिकांश अनुमान वित्त वर्ष 2026-27 में 7 से 7.5 प्रतिशत वृद्धि दर का संकेत देते हैं। लेकिन इस वृद्धि का टिकाऊपन काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या कृषि क्षेत्र में सार्थक सुधार होता है।

यदि कृषि वृद्धि में 1 से 1.5 प्रतिशत अंकों की तेजी आती है, तो इसका ग्रामीण आय और उपभोग पर बड़ा प्रभाव पड़ सकता है। इसके विपरीत, यदि कृषि वृद्धि 3 प्रतिशत से नीचे ही बनी रहती है, तो मांग सीमित रहेगी और वृद्धि मुख्य रूप से विनिर्माण और सेवाओं पर निर्भर रहेगी।

दूसरे अग्रिम अनुमान यह पुष्टि करते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत गति से बढ़ रही है, लेकिन यह वृद्धि संतुलित नहीं है। कृषि अब भी विकास श्रृंखला की सबसे कमजोर कड़ी बनी हुई है, जो ग्रोथ की पहुंच और स्थायित्व दोनों को सीमित करती है।

वित्त वर्ष 2027 में प्रवेश करते समय चुनौती केवल तेज वृद्धि की नहीं, बल्कि संतुलित और समावेशी वृद्धि सुनिश्चित करने की है। यदि कृषि आय और ग्रामीण मांग में ग्रोथ नहीं आती, तो ऊंची जीडीपी वृद्धि शहर केंद्रित, पूंजी-प्रधान और आधार स्तर पर कमजोर बनी रह सकती है। 

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