इस सप्ताह भारत आ रहे ट्रंप के व्यापार प्रतिनिधि, द्विपक्षीय व्यापार समझौते को लेकर क्या हैं संभावनाएं?
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) जैमीसन ग्रीयर की भारत यात्रा के बीच एक नई रिपोर्ट ने भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा रेसिप्रोकल टैरिफ को निरस्त किए जाने के बाद वाशिंगटन की प्रमुख व्यापारिक रियायतें कमजोर पड़ गई हैं। ऐसे में भारत को यह फैसला करना है कि वह नए सेक्शन 301 टैरिफ के दबाव में बातचीत जारी रखे या समझौते पर पुनर्विचार करे।
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) जैमीसन ग्रीयर 23-24 जून को भारत दौरे पर आ रहे हैं। इस बीच ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) की एक नई रिपोर्ट ने प्रस्तावित भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट का कहना है कि भारत को दी गई अमेरिका की प्रमुख टैरिफ रियायत का कानूनी आधार अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद लगभग समाप्त हो चुका है। 24 जुलाई को अस्थायी सेक्शन 122 टैरिफ की अवधि खत्म होने और सेक्शन 301 के तहत नई जांच की संभावना के बीच भारत के सामने यह महत्वपूर्ण सवाल है कि वह वार्ता जारी रखे या अमेरिका के साथ अपने व्यापारिक संबंधों की शर्तों का पुनर्मूल्यांकन करे।
भारत-अमेरिका BTA वार्ता
भारत और अमेरिका ने 13 फरवरी 2025 को औपचारिक रूप से द्विपक्षीय व्यापार समझौता (BTA) वार्ता शुरू की थी। इस समझौते की रूपरेखा पहली बार 6 फरवरी 2026 को जारी भारत-अमेरिका संयुक्त बयान में सामने आई।
अमेरिका ने भारतीय निर्यात पर लगाए गए 25% रेसिप्रोकल टैरिफ को घटाकर 18% करने का वादा किया था। इसके बदले भारत ने अमेरिकी औद्योगिक और कृषि उत्पादों पर शुल्क में कटौती, अमेरिकी मेडिकल उपकरणों और कृषि उत्पादों को बेहतर बाजार पहुंच, सीमा-पार डेटा प्रवाह को आसान बनाने, डिजिटल व्यापार प्रतिबद्धताओं को स्वीकार करने, अमेरिकी आर्थिक और सुरक्षा प्राथमिकताओं के साथ अधिक तालमेल बैठाने तथा अगले पांच वर्षों में 500 अरब डॉलर तक के अमेरिकी उत्पाद खरीदने की इच्छा जताई थी। लेकिन समझौते के अंतिम रूप लेने से पहले ही अमेरिकी प्रस्ताव की बुनियाद कमजोर पड़ गई।
सुप्रीम कोर्ट ने पलटा रेसिप्रोकल टैरिफ फैसला
20 फरवरी 2026 को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए रेसिप्रोकल टैरिफ, इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) के तहत दी गई शक्तियों से परे थे। इस फैसले ने पूरे रेसिप्रोकल टैरिफ ढांचे को कानूनी रूप से अमान्य कर दिया। परिणामस्वरूप भारत को 25% से 18% टैरिफ पर लाने की अमेरिकी पेशकश भी प्रभावी रूप से समाप्त हो गई।
सेक्शन 122: एक अस्थायी समाधान
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के कुछ घंटों बाद ही अमेरिका ने 1974 के ट्रेड एक्ट के सेक्शन 122 के तहत भारत समेत सभी व्यापारिक साझेदार देशों के आयात पर अस्थायी 10% टैरिफ लगा दिया। यह व्यवस्था कांग्रेस की मंजूरी के बिना अधिकतम 150 दिनों तक लागू रह सकती है और इसकी अवधि 24 जुलाई 2026 को समाप्त होनी है।
रेसिप्रोकल टैरिफ समाप्त होने और सेक्शन 122 लागू होने का प्रभाव काफी महत्वपूर्ण रहा। जिन देशों ने नए व्यापार समझौतों के तहत बड़ी रियायतें देने पर सहमति जताई थी, वे अचानक उन्हीं टैरिफ शर्तों के अधीन आ गए जो बिना किसी समझौते वाले देशों पर लागू थीं। इस प्रकार समझौते का प्रमुख लाभ समाप्त हो गया। इसी कारण 15 मार्च को अमेरिका के साथ व्यापारिक समझौते से मलेशिया हट गया। अब भारत भी इसी तरह की दुविधा का सामना कर रहा है।
24 जुलाई की समयसीमा नजदीक आने के साथ सेक्शन 122 टैरिफ समाप्त होने वाला है। इसका व्यापार प्रवाह पर सीमित असर पड़ेगा क्योंकि यह सभी देशों पर समान रूप से लागू है और प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति को नहीं बदलता।
हालांकि इसका कानूनी महत्व अधिक है। इसके समाप्त होने के बाद अधिकांश अमेरिकी आयात फिर से विश्व व्यापार संगठन (WTO) के 'मोस्ट फेवर्ड नेशन' (MFN) टैरिफ ढांचे में लौट आएंगे। इससे 2 अप्रैल 2025 के तथाकथित "लिबरेशन डे" पर शुरू किए गए व्यापक टैरिफ ढांचे का अंत हो जाएगा।
कुछ अपवाद बने रहेंगे। स्टील, एल्युमीनियम और कुछ अन्य उत्पादों पर सेक्शन 232 के तहत लगाए गए शुल्क जारी रहेंगे तथा नए सेक्शन 301 टैरिफ भी लगाए जा सकते हैं। इसके बावजूद अधिकांश आयात अप्रैल 2025 से पहले की सामान्य टैरिफ व्यवस्था में लौट जाएंगे।
वाशिंगटन का नया हथियार बना सेक्शन 301
सेक्शन 122 को कभी भी रेसिप्रोकल टैरिफ व्यवस्था का स्थायी विकल्प नहीं माना गया था। इसलिए देशो पर दबाव बनाए रखने और व्यापारिक साझेदारों को वार्ता से पीछे हटने से रोकने के लिए अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय ने 11 और 12 मार्च को लगभग 60 अर्थव्यवस्थाओं के खिलाफ दो सेक्शन 301 जांच शुरू की। एक जांच अतिरिक्त औद्योगिक क्षमता से जुड़ी थी, जबकि दूसरी वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में कथित जबरन श्रम के उपयोग से संबंधित थी। भारत दोनों जांचों में शामिल है।
3 जून को USTR ने जबरन श्रम से संबंधित जांच के निष्कर्ष जारी किए और भारत सहित 54 देशों से आयात पर अतिरिक्त 12.5% टैरिफ लगाने का प्रस्ताव रखा। हालांकि यह प्रस्ताव अभी अंतिम नहीं है, लेकिन आने वाले हफ्तों में निर्णय होने की संभावना है। इससे भारत के सामने दो विकल्प हैं - नए सेक्शन 301 टैरिफ के दबाव में वार्ता जारी रखे या वाशिंगटन के अगले कदम का इंतजार करे।
BTA की कमजोर होती बुनियाद
प्रस्तावित BTA अब न तो संतुलित दिखता है और न ही स्थिर। अमेरिका चाहता है कि भारत कृषि, ऊर्जा, रक्षा उपकरण, विमानन, डिजिटल सेवाओं और उन्नत प्रौद्योगिकियों में स्थायी बाजार पहुंच दे। साथ ही भारत पांच वर्षों में 500 अरब डॉलर तक के अमेरिकी उत्पाद खरीदे, डिजिटल नियमों को शिथिल करे और अमेरिकी आर्थिक एवं सुरक्षा लक्ष्यों के साथ अधिक तालमेल स्थापित करे।
इसके बदले अमेरिका की मुख्य पेशकश केवल 25% से 18% तक टैरिफ में कटौती थी, जिसका कानूनी आधार सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद समाप्त हो गया। अब अमेरिका उसी दबाव को सेक्शन 301 टैरिफ के माध्यम से फिर से स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।
भारत के लिए इसका अर्थ यह हो सकता है कि यदि वह BTA पर हस्ताक्षर नहीं करता तो 25% टैरिफ झेलना पड़े, जबकि समझौते पर हस्ताक्षर करने पर यह 18% तक कम हो सकता है। इसी तरह की व्यवस्था यूरोपीय संघ, जापान और दक्षिण कोरिया को भी प्रस्तावित की जा सकती है।
भारत के सामने विकल्प
भारत BTA पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर सकता है और सेक्शन 301 के तहत लगाए जाने वाले संभावित टैरिफ का सामना कर सकता है। इससे निर्यात पर असर पड़ सकता है, लेकिन ये शुल्क केवल भारत पर नहीं बल्कि कई अन्य देशों पर भी लागू होंगे। दूसरी ओर भारत उन दीर्घकालिक प्रतिबद्धताओं से बच सकता है जिनकी आर्थिक लागत टैरिफ के प्रभाव से भी अधिक हो सकती है। वित्त वर्ष 2025-26 में उच्च अमेरिकी टैरिफ बाधाओं के बावजूद भारत का अमेरिका को निर्यात पिछले वर्ष की तुलना में अधिक रहा।
20 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट द्वारा रेसिप्रोकल टैरिफ ढांचा निरस्त किए जाने के बाद BTA को जल्दबाजी में पूरा करने का मूल कारण काफी हद तक समाप्त हो गया। अब अमेरिका की ओर से केवल सेक्शन 301 जांचों का दबाव और संभावित टैरिफ राहत का आश्वासन बचा है। रिपोर्ट का तर्क है कि व्यापार समझौतों का उद्देश्य दोनों पक्षों को स्थायी व्यावसायिक लाभ देना होना चाहिए, न कि भविष्य की एकतरफा कार्रवाइयों से बचाव के लिए सुरक्षा शुल्क की तरह काम करना। इसलिए भारत को BTA वार्ता और सेक्शन 301 जांचों को अलग-अलग मुद्दों के रूप में देखना चाहिए।
भारत को लेकर बदलती अमेरिकी सोच
व्यापार वार्ता ऐसे समय हो रही है जब भारत को लेकर अमेरिकी रणनीतिक सोच में व्यापक बदलाव दिखाई दे रहा है। अमेरिका अब भारत को अपनी इंडो-पैसिफिक रणनीति के केंद्रीय स्तंभ के बजाय अमेरिकी वस्तुओं, ऊर्जा, विमानों और रक्षा उपकरणों के लिए एक बड़े बाजार के रूप में देखने लगा है।
इसका सबसे स्पष्ट संकेत 16 जून को मिला, जब पेंटागन ने 'यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड' का नाम बदलकर फिर से 'यूएस पैसिफिक कमांड' कर दिया। 2018 में इसका नाम बदलने का उद्देश्य भारत को एशिया में अमेरिकी रणनीति के केंद्र में रखना और हिंद महासागर के बढ़ते महत्व को स्वीकार करना था। अब इस फैसले को पलटने से संकेत मिलता है कि वाशिंगटन भारत को अपनी क्षेत्रीय सुरक्षा रणनीति का केंद्रीय हिस्सा नहीं मान रहा।
भारत की बदलती भूमिका चीन को लेकर अमेरिकी पुनर्मूल्यांकन से भी जुड़ी है। इंडो-पैसिफिक रणनीति, क्वाड और भारत के साथ बढ़ती साझेदारी इस धारणा पर आधारित थी कि चीन को क्षेत्रीय सहयोगियों के गठबंधन के माध्यम से संतुलित किया जा सकता है। लेकिन यह धारणा अब कमजोर पड़ती दिख रही है।
वर्षों के टैरिफ, तकनीकी प्रतिबंधों, प्रतिबंधात्मक उपायों और सैन्य दबाव के बावजूद चीन ने अपनी आर्थिक, औद्योगिक, तकनीकी और सैन्य क्षमता का विस्तार जारी रखा है। यूक्रेन और पश्चिम एशिया की हालिया घटनाओं ने भी यह धारणा मजबूत की है कि चीन के पास अपने हितों की रक्षा करने के लिए पर्याप्त आर्थिक और भू-राजनीतिक शक्ति है।
वाशिंगटन के लिए संदेश स्पष्ट होता जा रहा है कि चीन को सोवियत संघ की तरह सीमित नहीं किया जा सकता। अमेरिका अब चीन को लगभग बराबरी की शक्ति मानने लगा है, जिससे तथाकथित G2 अवधारणा को बल मिल रहा है।
नतीजतन, अमेरिकी रणनीति अब चीन को रोकने के बजाय प्रतिस्पर्धा, सीमित सहयोग और व्यावहारिक समायोजन की दिशा में बढ़ रही है। रणनीतिक साझेदारी की जगह अब आर्थिक हित ले रहे हैं। अमेरिका की प्राथमिकता कृषि उत्पादों, ऊर्जा, रक्षा उपकरणों, विमानों, डिजिटल सेवाओं और उन्नत प्रौद्योगिकियों के निर्यात को बढ़ाना है। प्रस्तावित BTA इसी बदलाव का प्रतिबिंब है।

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