भारतीय कृषि में समावेशी विकास का मार्ग बन सकता है वेज कोड 2019
वेज कोड 2019 के न्यूनतम वेतन के प्रावधान से खासकर कम मजदूरी वाले राज्यों में कृषि मजदूरी में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। यह कोड कृषि श्रमिकों के लिए बेहतर आय और समानता का वादा करता है, लेकिन इससे छोटे किसानों के लिए लागत बढ़ने, उत्पादन पर दबाव और रोजगार घटने का जोखिम भी है। इसलिए उत्पादकता वृद्धि, मशीनीकरण, सामाजिक सुरक्षा और मूल्य समर्थन से जुड़े संतुलित क्रियान्वयन की आवश्यकता है
21 नवंबर 2025 से लागू हुई चारों श्रम संहिताएं (लेबर कोड) भारत के श्रम कानूनों की संरचना को नए सिरे से गढ़ेंगी। वेज कोड 2019 का उद्देश्य सबके लिए यूनिवर्सल न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित करना है, ताकि श्रमिकों को सम्मानजनक जीवन स्तर मिल सके। यह संहिता पूरी अर्थव्यवस्था पर लागू होती है, लेकिन इसका सबसे बड़ा प्रभाव कृषि क्षेत्र पर पड़ेगा, जो अनौपचारिक, मौसमी और अधिकांशतः कम पारिश्रमिक पाने वाले श्रमिकों के साथ सबसे बड़ा नियोक्ता है। यह लेख मजदूरी के आंकड़ों, आर्थिक सिद्धांत और नीतिगत विश्लेषण के आधार पर खेती में इस संहिता के अमल से होने वाले संभावित लाभ और लागत का आकलन करता है। वर्तमान परिस्थितियों से जुड़ी मजदूरी तय करने से अनुपालन की लागत बढ़ सकती है, संरचनात्मक बदलाव तेज हो सकते हैं और छोटे किसानों की आर्थिक व्यवहार्यता के लिए खतरा पैदा हो सकता है।
अनुशंसित मजदूरी बनाम कृषि की वास्तविकताएं
मजदूरी (वेज) संबंधी सिफारिशें राज्य और पेशे के अनुसार अलग-अलग हैं। बहुत कम राज्यों ने कृषि के लिए अलग से दरें तय की हैं। पंजाब में यह 457 रुपये प्रतिदिन (भोजन के बिना) या 411 रुपये प्रतिदिन (कार्यस्थल पर भोजन के साथ) है। पश्चिम बंगाल में यह 330 रुपये (अकुशल), 363 रुपये (अर्ध-कुशल) और 400 रुपये (कुशल) प्रतिदिन है (कार्यस्थल पर भोजन के बिना)। यहां तक कि अकुशल श्रमिकों के लिए कम न्यूनतम मजदूरी वाले राज्यों में भी बड़ा अंतर दिखता है - राजस्थान में यह 285 रुपये प्रतिदिन, जबकि कर्नाटक में 543 रुपये प्रतिदिन है, जो 90 प्रतिशत से भी अधिक है।
क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करने के लिए नई वेतन संहिता (कोड) में जीवन स्तर से जुड़ा एक राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन (फ्लोर वेज) तय किया गया है। राज्य या उद्योग विशिष्ट दरें इस फ्लोर से ऊपर होनी चाहिए और यदि पहले से अधिक हैं तो वे इससे नीचे नहीं लाई जा सकतीं। जिन राज्यों में कृषि के लिए अलग से वेतन सिफारिशें नहीं हैं, वहां हमने कृषि के लिए केंद्र द्वारा तय न्यूनतम वेतन की तुलना वास्तविक मजदूरी से की है।
वर्तमान में अकुशल श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी 465 रुपये प्रति दिन है। वर्ष 2023-24 में खेती से जुड़े कार्यों के लिए औसत कृषि मजदूरी पुरुषों के लिए 420 रुपये प्रति दिन और महिलाओं के लिए 360 रुपये प्रति दिन थी। इस प्रकार मौजूदा औसत मजदूरी अनुशंसित न्यूनतम से 10 से 23 प्रतिशत कम है। यहां तक कि 2023-24 के बेंचमार्क भी अंतर दर्शाते हैं - 1 अप्रैल 2024 को क्षेत्र ‘सी’ में अकुशल श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी 449 रुपये थी, जबकि पुरुषों की वास्तविक मजदूरी 420 रुपये रही, यानी 6.5 प्रतिशत कम। चूंकि अधिकांश कृषि श्रम अकुशल है, इसलिए इस कोड का प्रभाव निकट अवधि में करोड़ों मजदूरों की मजदूरी में बढ़ोतरी के रूप में सामने आएगा।
कम मजदूरी वाले राज्यों की चुनौती
वास्तविक कृषि मजदूरी राज्यों के बीच काफी भिन्न है। केरल में 912 रुपये प्रति दिन और तमिलनाडु में 699 रुपये प्रति दिन की मजदूरी राष्ट्रीय न्यूनतम से अधिक है। यह आमतौर पर कृषि में उच्च उत्पादकता (लगभग 1.5 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष) से जुड़ी है। इसलिए इन राज्यों में मजदूरी पर प्रभाव सीमित रहेगा, हालांकि अनुपालन जरूरी होगा। दूसरी ओर कई राज्य काफी पीछे हैं - छत्तीसगढ़ 303 रुपये, गुजरात 307 रुपये, झारखंड 308 रुपये, मध्य प्रदेश 341 रुपये, उत्तर प्रदेश 351 रुपये, बिहार 377 रुपये और ओडिशा 389 रुपये प्रति दिन। इन राज्यों में कम उत्पादकता के कारण मजदूरी कम है और महिलाओं की मजदूरी अक्सर 200 रुपये प्रति दिन से भी कम रहती है। कानूनन न्यूनतम वेतन उन नियोक्ताओं के लिए श्रम की लागत सबसे अधिक बढ़ाएगा, जहां पहले से मजदूरी कम है।
लागत से जुड़े प्रभाव
मजदूरी में बढ़ोतरी को कृषि की समग्र आर्थिक वास्तविकताओं के अनुरूप करना होगा। बिहार में धान उत्पादन की परिचालन लागत में मजदूरी की हिस्सेदारी लगभग 37%, झारखंड में 28% और ओडिशा में 27% है। गेहूं के मामले में यह हिस्सेदारी बिहार और गुजरात में 18% तथा उत्तर प्रदेश में 14% है। छत्तीसगढ़ में, जहां पुरुष मजदूरों की मजदूरी 303 रुपये प्रतिदिन है, यदि इसे 465 रुपये किया जाता है तो मजदूरी लागत में 53% से अधिक की वृद्धि होगी। चूंकि धान में श्रम की हिस्सेदारी 19% है, इससे वहां के किसानों पर गंभीर दबाव पड़ेगा। इससे सीमांत और छोटे किसानों की स्थिति विशेष रूप से प्रभावित होगी, जो पारिवारिक और किराये के मजदूरों पर निर्भर हैं। उनके मुनाफे सीमित हैं और अतिरिक्त लागत वहन करने के लिए पर्याप्त पूंजी भी नहीं है। उत्पादन मूल्य में आनुपातिक बढ़ोतरी के बिना लागत बढ़ने से उत्पादक (किसान) का सरप्लस घटेगा और उत्पादन में कमी का जोखिम बढ़ेगा।
मशीनीकरण की दिशा में तेजी
तत्काल लागत बढ़ने के बावजूद, यह कोड संरचनात्मक बदलाव की प्रक्रिया को तेज कर सकता है। श्रम लागत बढ़ने से पूंजी को श्रम पर तरजीह मिलती है। इससे उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में मशीनीकरण को बढ़ावा मिल सकता है। कृषि मशीनीकरण पर उप-मिशन और कस्टम हायरिंग सेंटर जैसी योजनाएं इस प्रक्रिया को सुगम बनाती हैं। सीड ड्रिल, भूमि समतल करने वाले उपकरण और हार्वेस्टर के अधिक उपयोग से दक्षता बढ़ सकती है, प्रति इकाई श्रम की आवश्यकता घट सकती है और पूंजी-श्रम प्रतिस्थापन की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। हालांकि, यदि सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त मजबूत नहीं हुई तो अकुशल श्रमिकों के रोजगार पर प्रतिकूल असर पड़ने का जोखिम भी बना रहेगा।
नीति में समन्वय की जरूरत
वेतन सुधारों को अन्य श्रम संहिताओं और कृषि नीति के साथ इंटीग्रेट किया जाना चाहिए। वेज कोड को सामाजिक सुरक्षा संहिता से जोड़ने से पेंशन, बीमा और ग्रेच्युटी के माध्यम से श्रमिक कल्याण में सुधार हो सकता है, जिससे औपचारिकीकरण की प्रक्रिया तेज होगी। ग्रामीण रोजगार योजनाएं पहले से ही ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक मजदूरी को समर्थन दे रही हैं। नकारात्मक प्रभावों से बचने के लिए मजदूरी को न्यूनतम वेतन मानकों के अनुरूप रखा जाना चाहिए। सुधारों से किसानों पर बढ़ने वाली लागत को उत्पादकता वृद्धि और बेहतर मूल्य प्राप्ति के जरिए संतुलित करना आवश्यक है। किसान संगठनों और आपूर्ति शृंखलाओं को मजबूत करना इसमें सहायक होगा।
वेज कोड समानता और दक्षता के बीच के संतुलन को दर्शाता है। एक ओर श्रम का औपचारिकीकरण, ग्रामीण गरीबी में कमी और महिलाओं सहित सबसे कमजोर श्रमिकों की आजीविका में सुधार है, तो दूसरी ओर किसानों के लिए बढ़ती लागत, उत्पादन में संभावित गिरावट और सामाजिक सुरक्षा जाल के अभाव में विस्थापन का जोखिम। इसका परिणाम नीति-निर्माण पर निर्भर करेगा- अधिक संवेदनशील राज्यों के लिए क्रमिक बदलाव, सामाजिक सुरक्षा को सुदृढ़ करना, सस्ते मशीनीकरण को बढ़ावा देना और कम श्रम-आधारित, मूल्यवर्धित फसलों की ओर विविधीकरण, साथ ही अधिक मजदूरी को संभव बनाने के लिए फार्म-गेट मूल्य समर्थन। यदि सावधानीपूर्वक और संतुलित ढंग से लागू किया जाए, तो यह संहिता भारतीय कृषि को अधिक आधुनिक और न्यायसंगत दिशा में ले जा सकती है। इसलिए इस परिवर्तन को लागू करने के लिए एक संवेदनशील और समग्र नीतिगत ढांचे की आवश्यकता है।
(डॉ. नवीन पी. सिंह आईसीएआर-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चरल इकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी रिसर्च (एनआईएपी), नई दिल्ली में प्रधान वैज्ञानिक और डॉ. बालाजी एसजे इसी संस्थान में वैज्ञानिक हैं)

Join the RuralVoice whatsapp group















