खेत से सीबीजी प्लांट तक किसानों की भागीदारी जरूरी, बायो एनर्जी कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने दिया जोर

बायो एनर्जी कार्यक्रम में किसानों को पराली और कृषि अवशेषों की वैल्यू चेन से जोड़कर आय और रोजगार बढ़ाने पर जोर दिया गया। विशेषज्ञों ने गांव स्तर पर कलेक्शन सेंटर, उचित मूल्य, मजबूत लॉजिस्टिक्स और टिकाऊ फीडस्टॉक की जरूरत बताई।

खेत से सीबीजी प्लांट तक किसानों की भागीदारी जरूरी, बायो एनर्जी कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने दिया जोर

उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में गुरुवार को आयोजित बायो एनर्जी पर एक कार्यक्रम में पराली और कृषि अवशेषों से ग्रीन एनर्जी के साथ किसानों की आय बढ़ाने पर जोर दिया गया। कार्यक्रम में मौजूद नीति निर्माताओं, वैज्ञानिकों तथा इंडस्ट्री के प्रतिनिधियों ने खेत से कंप्रेस्ड बायो गैस (सीबीजी) प्लांट तक मजबूत सप्लाई चेन, बेहतर पराली गुणवत्ता, उचित मूल्य और गांव स्तर पर कलेक्शन सेंटर जरूरत बताई, ताकि किसानों की आय बढ़े और उद्योग को लगातार बायोमास की आपूर्ति हो सके। किसानों से एग्रीगेटर और उद्यमी बनने की अपील भी की गई।

इस कार्यक्रम का आयोजन इंडियन फेडरेशन ऑफ ग्रीन एनर्जी (IFGE) और रूरल वॉयस ने मिलकर किया जिसका विषय था ‘हरित ऊर्जा तथा किसानों के लिए आमदनी के अवसरों को बढ़ावा’ (Fuelling Green Energy and Income Opportunities for Farmers)। यह तीन दिवसीय इंडिया बायोएनर्जी एंड टेक एक्सपो 2026 का हिस्सा था। 

परिचर्चा के दो सत्र थे जिनमें उत्तर प्रदेश गोसेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता, उत्तर प्रदेश सरकार में कृषि विस्तार की डायरेक्टर डॉ. कनीज फातिमा, कृषि विभाग के ज्वाइंट डायरेक्टर बलराम वर्मा, प्राज इंडस्ट्रीज के वाइस प्रेसिडेंट तुषार पाटिल, आईसीएआर-इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मिलेज रिसर्च, हैदराबाद के प्रधान वैज्ञानिक डॉ ए वी उमानाथ, सुपर एग्रीगेटर कंपनी फार्मवाट इनोवेशंस के सह-संस्थापक और सीओओ सचिन साकल्ले, पंजाब रिन्यूएबल एनर्जी सिस्टम्स प्रा. लि. के सीएमडी लेफ्टिनेंट कर्नल (रि.) मोनीश आहूजा, मैपसेट्स इंडिया के सीईओ निखिल चंद्र ने अपने विचार व्यक्त किए। इनके अलावा उत्तर प्रदेश के शामली जिले के प्रगतिशील किसान उमेश कुमार तथा मनीष भारती ने किसानों के मुद्दे रखे। कार्यक्रम का संचालन रूरल वॉयस के एडिटर-इन-चीफ हरवीर सिंह ने किया।

गोसेवा आयोग प्रमुख का खेतों में गोबर गैस की स्लरी छिड़कने का सुझाव

उत्तर प्रदेश गोसेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता ने किसानों से मवेशी पालने, गोबर गैस के प्लांट लगाने तथा खेतों में गोबर गैस की स्लरी छिड़कने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि मिट्टी में जितना अधिक जीवाश्म होगा, उत्पादन उतना अधिक होगा। उन्होंने दावा किया कि खेती के लिए जो जीवाणु चाहिए वह गोमूत्र और गोबर में होता है। खेती में रसायनों का प्रयोग कम करने का सुझाव देते हुए उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश की मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन की मात्रा अब सिर्फ 0.2% रह गई है जो हरित क्रांति से पहले डेढ़ से दो प्रतिशत तक थी। उन्होंने कहा कि जैव-उपायों को अपनाने से अन्नदाता किसान, ऊर्जादाता भी बन सकता है।

मृदा स्वास्थ्य सुधारने की जरूरतः डॉ. कनीज फातिमा

उत्तर प्रदेश सरकार में कृषि विस्तार की डायरेक्टर डॉ. कनीज फातिमा ने कहा कि देश की कुल खेती योग्य भूमि में उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 11% लेकिन खाद्यान्न उत्पादन में 21% है। राज्य धान, गेहूं, गन्ना और आलू उत्पादन में पहले स्थान पर है लेकिन मृदा स्वास्थ्य के मामले में बहुत नीचे पहुंच गया है। यह रसायनों के इस्तेमाल की वजह से हुआ है। रसायनों के कारण मिट्टी में रहने वाले मित्र कीट और माइक्रो आर्गनिज्म बहुत कम रह गए हैं। अब इनका प्रयोगशाला में संवर्धन किया जा रहा है और वहां से वापस खेतों में डाला जा रहा है। 

गांव स्तर पर पराली कलेक्शन सेंटर स्थापित करने के सुझाव का उन्होंने स्वागत किया। उन्होंने एफपीओ गठन की प्रक्रिया आसान बनाने के सुझाव पर भी विचार करने का आश्वासन दिया। उन्होंने कहा कि किसानों तक योजनाओं को पहुंचाने के लिए उत्तर प्रदेश में मजबूत व्यवस्था है। पूरे राज्य में करीब 2600 एटीएम/बीटीएम हैं जो किसानों की मदद कर रहे हैं। उन्होंने किसानों को सलाह दी कि अगर उन्हें किसी तरह की समस्या आती है तो वे जिला कृषि अधिकारी तथा अन्य अधिकारियों से संपर्क कर सकते हैं। अगर समस्या का समाधान नहीं होता है तो किसान सीधे उनसे भी संपर्क कर सकते हैं।

सप्लाई चेन से जुड़ें किसानः बलराम वर्मा

उत्तर प्रदेश सरकार में कृषि विभाग के ज्वाइंट डायरेक्टर बलराम वर्मा ने कहा कि इस वर्ष 260 लाख टन धान की पराली निकलने का अनुमान है जिसमें से लगभग 72 लाख तक का फीड स्टॉक के तौर पर इस्तेमाल करने का लक्ष्य रखा गया है। उत्तर प्रदेश सरकार एफपीओ और कस्टम हायरिंग सेंटर के माध्यम से ‘खेत से स्वच्छ ईंधन की ओर’ कार्यक्रम को बढ़ा रही है। इस पूरी सप्लाई चेन में बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर निकलेंगे। इस सप्लाई चेन में किसान, एफपीओ, एग्रीगेटर, सुपर एग्रीगेटर, सीबीजी प्लेटफार्म और अंत में ईंधन तथा जैव उर्वरक हैं। उन्होंने किसानों से इस सप्लाई चेन से जुड़कर इसका लाभ उठाने की अपील की। 

उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश में अभी 40 सीबीजी प्लांट हैं और करीब 200 प्लांट निर्माण के विभिन्न चरणों में हैं। हर विकासखंड स्तर पर एक एग्रीगेटर स्थापित किया जा रहा है। सभी 826 ब्लॉक में कस्टम हायरिंग सेंटर स्थापित किए जा रहे हैं। राज्य में 1 सितंबर से 15 नवंबर तक जागरूकता अभियान चलाया जाएगा जिसमें किसानों को पराली जलाने के नुकसान और सीबीजी के फायदे बताए जाएंगे ताकि हर खेत ऊर्जा का घर बन सके।

इंडस्ट्री किसानों से लंबे समय तक खरीद का समझौता करेंः तुषार पाटिल

प्राज इंडस्ट्रीज के वाइस प्रेसिडेंट तुषार पाटिल ने कहा, इंडस्ट्री यह देखती है कि कच्चा माल कितनी मात्रा में उपलब्ध है, उसकी कितनी और कितने दिनों तक आपूर्ति संभव है और उसकी क्वालिटी कैसी है। क्वालिटी का महत्व बताते हुए उन्होंने कहा कि एक टन पराली से 110 किलो गैस प्राप्त की जा सकती है लेकिन अगर पराली की क्वालिटी खराब हो तो 70 किलो गैस ही मिलेगी। उन्होंने कहा कि किसान अगर कार्बन क्रेडिट से अधिक कमाना चाहता है तो उसे पूरे सिस्टम को समझना होगा। इंडस्ट्री के स्तर पर भी उन्होंने कुछ सुझाव दिए। उन्होंने कहा कि इंडस्ट्री किसानों से लंबे समय तक पराली खरीदने का समझौता करे तभी किसानों में भरोसा जागेगा। उन्होंने राज्य सरकार को किसानों को बायो एनर्जी से संबंधित तकनीकी जानकारी उपलब्ध कराने का भी आग्रह किया।

किसान खुद एग्रीगेटर बनेंः सचिन साकल्ले

सुपर एग्रीगेटर कंपनी फार्मवाट इनोवेशंस के सह-संस्थापक और सीओओ सचिन साकल्ले ने कहा कि अभी वैल्यू चेन में किसान शामिल नहीं हैं। वे सिर्फ इतना चाहते हैं कि उनके खेत से कोई पराली लेकर चला जाए। जरूरत है कि किसान खुद एग्रीगेटर बने। अगर वह अकेले नहीं कर सकता तो फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी (एफपीसी) बनाकर यह काम करे। क्रॉप रेसिड्यू को वह एकत्र करे और उचित समय पर उसे बेचे। इस सप्लाई चेन में युवा मशीन ऑपरेटर, स्पेयर पार्ट्स की बिक्री करने वाले या मशीन रिपेयरिंग का काम कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि फर्मेंटेड ऑर्गेनिक मैन्योर (एफओएम) को भी बिजनेस के अवसर के तौर पर लिया जा सकता है। 

गांव स्तर पर पराली कलेक्शन होः उमेश कुमार

उत्तर प्रदेश के शामली जिले के प्रगतिशील किसान उमेश कुमार ने कहा कि किसान अपने खेत को प्रयोगशाला नहीं बना सकता, उसे परिवार भी चलाना है। हमें इस बात पर विचार करने की जरूरत है कि पशुपालन आधा क्यों रह गया, गाय पालन क्यों कम हो गया। उन्होंने बताया कि धान की पराली पिछले वर्ष एक से डेढ़ हजार रुपए प्रति एकड़ की दर से खरीदी गई इसलिए उनके इलाके में किसी किसान में पराली नहीं जलाई, लेकिन ज्यादातर खरीदार पंजाब और हरियाणा से आए थे। उन्होंने सुझाव दिया कि कलेक्शन सेंटर अगर गांव में हो तो किसान पराली नहीं जलाएगा। उन्होंने एफपीओ बनाने की प्रक्रिया सरल करने तथा इसके लिए तमाम मंजूरियों को सिंगल विंडो करने की मांग भी की। 

दूसरे सत्र में फीडस्टॉक इकोसिस्टम पर चर्चा

कार्यक्रम के दूसरे सत्र का विषय ‘टिकाऊ जैव ऊर्जा फीडस्टॉक प्रणाली के लिए आगे की राह’ (Way forward for Sustainable Bioenergy Feedstock System) था। पंजाब रिन्यूएबल एनर्जी के सीएमडी लेफ्टिनेंट कर्नल (रि.) मोनीश आहूजा ने कहा कि योजनाएं तो बन जाती हैं लेकिन उनकी आर्थिक व्यवहार्यता नहीं देखी जाती। इसका उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया- 2018 में तय किया गया था कि 5 साल में 5000 सीबीजी प्रोजेक्ट स्थापित किए जाएंगे, लगे सिर्फ 48 प्रोजेक्ट। उसके बाद 5000 प्रोजेक्ट तक के लिए 2028 तक का लक्ष्य तय किया गया, लेकिन अभी तक सिर्फ 200 प्लांट लगे हैं। फंडिंग की समस्या का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि बैंक या कोई भी वित्तीय संस्थान तभी फंड उपलब्ध कराएगा जब प्रोजेक्ट का मॉडल सस्टेनेबल हो। सब्सिडी आधारित बिजनेस मॉडल नहीं चल सकता है। इस उभरते सेक्टर के लिए उन्होंने अलग रेगुलेटर की भी जरूरत बताई।

मीठी ज्वार बायोमास के लिए अच्छा विकल्पः डॉ. उमानाथ

आईआईएमआर के प्रधान वैज्ञानिक डॉ.ए.वी. उमानाथ ने बायो एनर्जी के लिए टिकाऊ और भरोसेमंद बायोमास चाहिए। अभी तक गन्ना, मक्का और चावल का अधिक उपयोग किया गया लेकिन इससे खाद्य सुरक्षा को आने वाले समय में खतरा हो सकता है। इसलिए फीड में विविधता जरूरी है। ज्वार इसका अच्छा विकल्प है। अमेरिका में इससे एथेनॉल उत्पादन किया जा रहा है। भारत में भी मीठी ज्वार से एथेनॉल बनाने को सरकार की मंजूरी मिल चुकी है।

उन्होंने बताया कि मीठी ज्वार की फसल सिर्फ चार महीने में तैयार हो जाती है और किसान साल में इसकी दो फसलें ले सकते हैं। उन्होंने आईआईएमआर द्वारा विकसित ज्वार की अलग-अलग वैरायटी के बारे में बताया जो सीबीजी के लिहाज से अधिक यील्ड वाली हैं। उन्होंने ऐसी किस्में भी बताईं जिनके लिए पानी की जरूरत कम पड़ती है। 

किसान मनीष भारती ने कहा, सरकारी रिपोर्ट बताती है कि ऑर्गेनिक का इस्तेमाल करने पर फसल उत्पादन 30% कम हो जाता है, तो किसान वह फसल क्यों उगाए। अगर सरकार चाहती है कि किसान कार्बनिक की तरफ जाएं तो वह फसल की कीमत 30% प्रीमियम पर तय कर सकती है। किसान को कच्चे माल की लागत जब तक नहीं मिलेगी तब तक वह उस फसल को नहीं अपनाएगा। उन्होंने कहा कि सरकार की योजनाएं तो बहुत हैं लेकिन वे किसान की जरूरतों के मुताबिक नहीं हैं। पॉलिसी और प्रैक्टिकल में बहुत अंतर है।

मैपसेट्स इंडिया के सीईओ निखिल चंद्र ने मशीनरी खरीद के लिए यूपी यंत्र ट्रैकिंग डॉट इन (upyantratracking.in) की लाइव जानकारी दी। 

कार्यक्रम का निष्कर्ष यह रहा कि बायो एनर्जी क्षेत्र में किसानों की भागीदारी बढ़ाने के लिए केवल पराली प्रबंधन पर्याप्त नहीं, बल्कि पूरी वैल्यू चेन को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाना जरूरी है। उचित कीमत, दीर्घकालिक खरीद समझौते, गांव स्तर पर कलेक्शन सेंटर और आसान एफपीओ व्यवस्था से किसान सीधे लाभ उठा सकते हैं। साथ ही, विविध फीडस्टॉक, बेहतर तकनीक और व्यावहारिक नीतियां सीबीजी क्षेत्र को मजबूत आधार दे सकती हैं। 

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