Genome Editing: फसल सुधार में भारतीय वैज्ञानिकों ने की नए अध्याय की शुरूआत
कटक में ICAR-सेंट्रल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट (CRRI) के शोधकर्ताओं ने जीनोम एडिटिंग के लिए TnpB नाम के एक छोटे प्रोटीन को अपनाया है। TnpB को Cas9 का छोटा विकल्प कह सकते हैं।
दशकों से किसान ऐसे बीज चाहते हैं जो कम उर्वरक, कम कीटनाशक और कम पानी में ज्यादा पैदावार दें। दुनियाभर के वैज्ञानिक अलग-अलग ब्रीडिंग और बायोटेक्नोलॉजी टूल्स का इस्तेमाल करके फसलों की ऐसी किस्में बनाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसा ही एक टूल है जीनोम एडिटिंग, जो फसलों को बेहतर बनाने के सबसे सशक्त तरीकों में से एक बन गया है।
सदियों से पौधों के डीएनए में प्राकृतिक रूप से होने वाले छोटे-छोटे बदलाव (म्यूटेशन) बेहतर स्वाद या कीड़ों के प्रति रेजिस्टेंस जैसे गुण पैदा करते हैं। शुरुआती किसानों ने डीएनए में इन बदलावों से पौधों के बीज बचाए और धीरे-धीरे उन फसलों को आकार दिया जिन पर हम आज भरोसा करते हैं।
समझ बढ़ने के साथ किसानों और ब्रीडर्स ने फायदेमंद गुणों वाले दो अलग तरह के पौधों की क्रॉस-ब्रीडिंग शुरू कर दी ताकि फसल की किस्म को तेजी से बेहतर बनाया जा सके। उदाहरण के लिए, एक तरह का चावल सूखा सहने की क्षमता रखता है जबकि दूसरा अधिक पैदावार देता है। उन्हें क्रॉस करके ब्रीडर ऐसा पौधा बना सकते हैं जिसमें सूखा सहने की क्षमता और ज्यादा पैदावार दोनों गुण हों।
20वीं सदी के मध्य में वैज्ञानिकों ने म्यूटेशन ब्रीडिंग शुरू की। इसमें बीजों को रेडिएशन या केमिकल के संपर्क में लाकर डीएनए में रैंडम बदलाव किया जाता है और फिर फायदेमंद म्यूटेंट को चुना जाता है। इस तकनीक से दुनिया भर में 3,000 से ज्यादा बेहतर फसल किस्में तैयार हुई हैं।

उसके बाद जेनेटिक मॉडिफिकेशन (जीएम) आया, जिसमें वैज्ञानिक एक बाहरी जीन को पौधे में डालकर उसमें कीटरोधी, खर-पतवाररोधी या बेहतर पोषण जैसे उपयोगी गुण जोड़ सकते हैं। भारत की एकमात्र कमर्शियल जीएम फसल बीटी कॉटन में ऐसा गुण विकसित किया गया जो इसे कीड़ों से बचाता है।
जीनोम एडिटिंग ब्रीडिंग का सबसे एडवांस तरीका है। इसकी क्रिस्पर-कैस (CRISPR-Cas) टेक्नोलॉजी को नोबेल पुरस्कार मिल चुका है। यह पौधों के डीएनए को काटने और बदलने के लिए मॉलिक्यूलर कैंची की तरह काम करती है। एक बार डीएनए में जरूरी बदलाव हो जाने के बाद, क्रिस्पर कैंची की जरूरत नहीं रहती और उन्हें हटाया जा सकता है। इससे पौधे में कोई बाहरी जीन नहीं बचता।
स्वदेशी ब्रीडिंग टूल
Cas9 और Cas12a जैसे क्रिस्पर टूल को विदेशों में पेटेंट हासिल है। इनके कमर्शियल प्रयोग में भारतीय वैज्ञानिकों को दिक्कत आती है। भारत में हुई एक खोज इस कमी को दूर करने और फसल सुधार के नए दरवाजे खोलने में मदद कर सकती है। कटक में ICAR-सेंट्रल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट (CRRI) के शोधकर्ताओं ने जीनोम एडिटिंग के लिए TnpB नाम के एक छोटे प्रोटीन को अपनाया है। TnpB को Cas9 का छोटा विकल्प कह सकते हैं।
इसे समझने के लिए एक कैंची की कल्पना करें। Cas9 जैसे पारंपरिक टूल शक्तिशाली होते हैं। लेकिन यह एक धागे को काटने के लिए बड़ी गार्डन कैंची का इस्तेमाल करने जैसा है। इसके उलट, TnpB छोटी, हल्की कैंची की तरह है। Cas9 के 1300 की तुलना में TnpB में लगभग 400 अमीनो एसिड होते हैं - यानी लगभग एक-तिहाई साइज। TnpB एक समय में एक से ज्यादा जीन एडिट कर सकता है। इसके शोध नतीजे अंतरराष्ट्रीय प्लांट बायोटेक्नोलॉजी जर्नल में प्रकाशित हुए। ICAR को TnpB का पेटेंट मिला है। पेटेंट अधिकार भारत में होने से भारतीय शोधकर्ता जीनोम एडिटिंग और फसल सुधार के लिए इसका आसानी से इस्तेमाल कर सकेंगे।
सालों से ज्यादातर जीनोम एडिटिंग इनोवेशन यूरोप, अमेरिका और चीन में होते रहे हैं। लेकिन CRRI के TnpB टूल ने भारत को नेक्स्ट-जेन जीनोम एडिटिंग में सबसे आगे ला दिया है। CRRI टीम इसे बेहतर बनाने पर काम कर रही है। यह टूल फसलों की अच्छी किस्में तेजी से डेवलप करने में मदद कर सकता है।
(कुतुबुद्दीन मोल्ला कटक स्थित आईसीएआर-नेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट के क्रॉप इंप्रूवमेंट डिवीजन में वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं)

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