कपास आयात पर बढ़ती निर्भरता से उबरने के लिए तकनीकी और नीतिगत सुधारों की जरूरत: डॉ. आर.एस. परोदा
भारत की कपास आयात पर बढ़ती निर्भरता ने नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक डॉ. आर.एस. परोदा ने कपास उत्पादन में भारत की अग्रणी स्थिति बहाल करने के लिए अगली पीढ़ी की जीएम तकनीकों को अपनाने और विज्ञान-आधारित नियामक ढांचा विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया है।
भारत में कपास आयात पर बढ़ती निर्भरता को लेकर प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक एवं पद्म भूषण डॉ. आर.एस. परोदा ने गहरी चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि कपास उत्पादन में भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता बहाल करने के लिए सरकार को तत्काल तकनीकी और नीतिगत सुधार करने होंगे। उनका मानना है कि अगली पीढ़ी की जीएम (आनुवंशिक रूप से संशोधित) तकनीकों को अपनाने और विज्ञान-आधारित नियामक व्यवस्था विकसित किए बिना भारत कपास क्षेत्र में अपनी खोई हुई वैश्विक नेतृत्व की स्थिति हासिल नहीं कर सकता।
कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सीएआई) के ताजा अनुमान पर प्रतिक्रिया देते हुए ट्रस्ट फॉर एडवांसमेंट ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (टीएएएस) के संस्थापक अध्यक्ष तथा भारतीय विज्ञान कांग्रेस और राष्ट्रीय कृषि विज्ञान अकादमी के पूर्व अध्यक्ष डॉ. परोदा ने सरकार से कपास क्षेत्र की व्यापक समीक्षा करने और उन्नत जैव प्रौद्योगिकी, विज्ञान-आधारित नियमन तथा नवाचार आधारित विकास पर केंद्रित दीर्घकालिक रणनीति अपनाने का आग्रह किया।
आयात 60 लाख गांठ, निर्यात घटकर 15 लाख गांठ
सीएआई के नवीनतम अनुमान के अनुसार, वर्ष 2025-26 में भारत का कपास आयात बढ़कर 60 लाख गांठ (बेल) तक पहुंच सकता है, जबकि निर्यात घटकर 15 लाख गांठ रहने का अनुमान है। वहीं, घरेलू खपत का अनुमान बढ़ाकर 348 लाख गांठ कर दिया गया है। इससे उत्पादन और मांग के बीच बढ़ता अंतर साफ दिखाई देता है और यह संकेत मिलता है कि देश की आयातित कपास पर निर्भरता लगातार बढ़ रही है।
डॉ. परोदा ने कहा कि ये आंकड़े नीति निर्माताओं के लिए एक चेतावनी हैं। उन्होंने कहा कि वर्ष 2014 तक भारत दुनिया का सबसे बड़ा कपास उत्पादक और दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में देश लगातार अपनी वैश्विक बढ़त खोता जा रहा है।
उन्होंने कहा, "जिस फसल में भारत कभी दुनिया का अग्रणी उत्पादक था, उसी में बढ़ती आयात निर्भरता यह बताती है कि विज्ञान-आधारित नियामक सुधारों के माध्यम से अगली पीढ़ी की जीएम तकनीकों को अपनाने और उत्पादकता बढ़ाने वाली दीर्घकालिक नीति बनाने की तत्काल आवश्यकता है।"
डॉ. परोदा ने यह भी कहा कि ऐसे समय में जब देश आत्मनिर्भर भारत की दिशा में आगे बढ़ रहा है, कपास आयात पर बढ़ती निर्भरता भारत को अनावश्यक भू-राजनीतिक और वैश्विक बाजार संबंधी जोखिमों के प्रति संवेदनशील बना सकती है।
डॉ. परोदा के अनुसार, भारत के कपास क्षेत्र की मौजूदा समस्याएं अस्थायी नहीं बल्कि संरचनात्मक हैं। उन्होंने कहा कि दुनिया के अधिकांश कपास उत्पादक देशों ने नई कृषि तकनीकों और जैव प्रौद्योगिकी को तेजी से अपनाया है, जबकि भारतीय किसान पिछले दो दशकों से अधिक समय से नई जीएम तकनीकों से वंचित हैं।
उन्होंने कहा कि इस तकनीकी ठहराव का सीधा असर कपास की उत्पादकता, किसानों की आय और भारतीय कपास की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता पर पड़ा है।
डॉ. परोदा ने कहा कि देश का कपास क्षेत्र लगभग 70 लाख किसानों की आजीविका का आधार है और यह भारत के सबसे बड़े रोजगार सृजन करने वाले वस्त्र उद्योगों को कच्चा माल उपलब्ध कराता है।
उन्होंने कहा, "हमें कपास आयात पर निर्भरता कम कर एक बार फिर आत्मनिर्भर बनना होगा। हमारे पास वैज्ञानिक क्षमता और तकनीकी दक्षता दोनों मौजूद हैं। लेकिन हाल ही में घोषित कपास मिशन में जीएम कपास के विस्तार पर कोई स्पष्ट रणनीति नहीं दिखाई देती, जबकि यह किसानों और भारतीय कृषि दोनों के लिए लाभकारी सिद्ध तकनीक है।"
विज्ञान आधारित नियामक व्यवस्था की जरूरत
डॉ. परोदा ने कहा कि भारत के नियामक ढांचे को वैश्विक सर्वोत्तम मानकों के अनुरूप बनाया जाना चाहिए, ताकि कृषि विकास में सहायक वैज्ञानिक नवाचारों को समय पर अपनाया जा सके।
उन्होंने कहा कि जिन देशों ने कृषि क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व हासिल किया है, उन्होंने मजबूत, पारदर्शी और दूरदर्शी नियामक एवं बौद्धिक संपदा ढांचे के साथ नवाचार को बढ़ावा दिया है। भारत को भी अपने नियामक तंत्र की समीक्षा कर ऐसी विज्ञान-आधारित, पारदर्शी और पूर्वानुमेय व्यवस्था विकसित करनी चाहिए, जिससे वैज्ञानिक रूप से सुरक्षित सिद्ध तकनीकों का लाभ किसानों तक पहुंच सके।
डॉ. परोदा ने याद दिलाया कि भारत ने पहले भी तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बीटी कपास को मंजूरी देकर विज्ञान आधारित निर्णय लेने का उदाहरण पेश किया था। उनके अनुसार, अब समय आ गया है कि अगली पीढ़ी की कपास प्रौद्योगिकियों को भी इसी दृष्टिकोण से अपनाया जाए।

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