बिट्स पिलानी, हैदराबाद के शोधकर्ताओं ने एक इंटीग्रेटेड और कम ऊर्जा खपत वाली ऐसी तकनीक विकसित की है, जो बायोफार्मास्युटिकल उद्योग से निकलने वाले अपशिष्ट जल (वेस्टवॉटर) का उपचार कर उसे दोबारा इस्तेमाल योग्य बनाती है। साथ ही बायोगैस के रूप में ऊर्जा भी प्राप्त होती है।
शोधकर्ताओं ने तीन चरणों वाली एक नई उपचार प्रणाली विकसित की है, जिसमें ऊर्जा की अधिक खपत वाली पारंपरिक स्टरलाइजेशन प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसकी जगह पल्स्ड इलेक्ट्रिक फील्ड (PEF) तकनीक का उपयोग किया गया है, जिससे पानी को दोबारा उपयोग योग्य बनाया जा सकता है और बायोगैस भी प्राप्त होती है।
बिट्स के शोधकर्ताओं ने इस तकनीक का प्रयोगशाला स्तर पर सफलतापूर्वक प्रदर्शन किया है। अब शोध दल हैदराबाद की जीनोम वैली स्थित भारत की प्रमुख वैक्सीन निर्माता कंपनी बायोलॉजिकल ई लिमिटेड के साथ मिलकर इसे औद्योगिक स्तर पर लागू करने की दिशा में काम कर रहा है।
इस नए सिस्टम में रासायनिक और भाप (स्टीम) आधारित पारंपरिक स्टरलाइजेशन की जगह पल्स्ड इलेक्ट्रिक फील्ड (PEF) तकनीक का उपयोग किया जाता है। इससे बायोफार्मास्युटिकल फर्मेंटेशन अपशिष्ट जल को सुरक्षित रूप से कीटाणुरहित किया जा सकता है और साथ ही दोबारा इस्तेमाल योग्य पानी तथा मीथेन समृद्ध बायोगैस प्राप्त होती है।
इस तकनीक का उपयोग अन्य दवा एवं वैक्सीन निर्माण इकाइयों के साथ-साथ अधिक प्रदूषित औद्योगिक अपशिष्ट जल के उपचार में भी किया जा सकता है। इससे उद्योगों को जल संरक्षण, ऊर्जा और पर्यावरण अनुकूल समाधान मिलेंगे।
यह परियोजना भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के 'वाटर टेक्नोलॉजी इनिशिएटिव' के तहत संचालित 'ऑप्टिमम वाटर यूज इन इंडस्ट्रियल सेक्टर्स' कार्यक्रम से समर्थित है। इस तकनीक के मुख्य डिसइन्फेक्शन सिस्टम के लिए भारतीय पेटेंट का आवेदन भी किया जा चुका है।
यह शोध BITS एनवायरमेंटल साइंस एंड टेक्नोलॉजी (BEST) प्रयोगशाला की टीम ने किया है। टीम का नेतृत्व पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रोफेसर शंकर गणेश पलानी, इलेक्ट्रिकल एवं इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर मिथुन मंडल तथा शोधार्थी रवींद्र ज्ञानाबा कुलाल ने किया।
प्रो. शंकर गणेश पलानी के अनुसार, "बायोफार्मास्युटिकल फर्मेंटेशन अपशिष्ट जल के पारंपरिक उपचार में भारी मात्रा में रसायनों और ताप ऊर्जा की आवश्यकता होती है। हमारी एकीकृत तकनीक यह साबित करती है कि केवल विद्युत पल्स की मदद से इस जटिल अपशिष्ट जल को सुरक्षित रूप से कीटाणुरहित किया जा सकता है। साथ ही पुन: उपयोग योग्य पानी और स्वच्छ ऊर्जा जैसे मूल्यवान संसाधनों की भी प्राप्ति संभव है। हमें उम्मीद है कि यह तकनीक उद्योगों के पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने और अपशिष्ट जल प्रबंधन को अधिक टिकाऊ बनाने में मदद करेगी।"
शोधकर्ताओं ने अपनी डिसइन्फेक्शन तकनीक 'वोल्टेज असिस्टेड इनएक्टिवेश ऑफ बैक्टीरिया इन वेस्टवाटर (VAIBaW)' के लिए पेटेंट आवेदन दाखिल किया है। इस शोध के निष्कर्षों पर आधारित शोधपत्र वर्तमान में विशेषज्ञों की समीक्षा (पीयर रिव्यू) के दौर से गुजर रहा है।
क्यों चुनौतीपूर्ण है यह अपशिष्ट जल
बायोफार्मास्युटिकल फर्मेंटेशन अपशिष्ट जल का उपचार औद्योगिक क्षेत्र की सबसे कठिन चुनौतियों में माना जाता है। इसमें लाखों जीवित सूक्ष्मजीव, एंटीबायोटिक के अवशेष तथा एंटीबायोटिक प्रतिरोधी जीन मौजूद होते हैं। जैव-सुरक्षा के जोखिम के कारण उद्योग वर्तमान में पहले रासायनिक उपचार और उसके बाद भाप आधारित ऑटोक्लेविंग का सहारा लेते हैं, जो अत्यधिक ऊर्जा खपत वाली और खर्चीली प्रक्रिया है। इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए बिट्स हैदराबाद की टीम ने बिजली आधारित डिसइन्फेक्शन और जैविक उपचार पर आधारित तीन-चरणों वाली प्रणाली विकसित की है।
तीन चरणों में होता है उपचार
पहला चरण : पल्स्ड इलेक्ट्रिक फील्ड (PEF)
इस चरण में अत्यधिक उच्च वोल्टेज वाले अल्पकालिक विद्युत पल्स का उपयोग किया जाता है, जो इरीवर्सिबल इलेक्ट्रोपोरेशन नामक प्रक्रिया के माध्यम से बैक्टीरिया की कोशिकाओं को नष्ट कर देता है। इस तकनीक में न तो रसायनों की आवश्यकता होती है और न ही गर्मी की। प्रयोगशाला परीक्षणों में इसने वास्तविक बायोफार्मा अपशिष्ट जल में 99.9999 प्रतिशत (6-लॉग रिडक्शन) तक बैक्टीरिया को निष्क्रिय करने में सफलता हासिल की। इसकी स्टरलाइजेशन क्षमता पारंपरिक ऑटोक्लेविंग के बराबर रही, जबकि ऊर्जा की खपत काफी कम रही।
दूसरा चरण : जैविक उपचार
विद्युत आधारित डिसइन्फेक्शन के बाद अपशिष्ट जल को सीक्वेंसिंग बैच रिएक्टर (SBR) में भेजा जाता है, जहां प्राकृतिक सूक्ष्मजीव ऑर्गेनिक प्रदूषकों को हटाते हैं। इस प्रक्रिया से 90 प्रतिशत से अधिक ऑर्गेनिक प्रदूषण समाप्त हो जाता है। इसके बाद मेम्ब्रेन फिल्ट्रेशन किया जाता है जिसके बाद प्राप्त पानी पुन: उपयोग की गुणवत्ता के करीब पहुंच जाता है।
तीसरा चरण : स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन
अंतिम चरण में बची हुई स्लज को शोधकर्ताओं की पेटेंट प्राप्त इंटेलिजेंटली स्टर्ड थर्मोफिलिक एनारोबिक रिएक्टर (iSTAR®) तकनीक के माध्यम से मीथेन-समृद्ध बायोगैस में बदला जाता है। यह बायोगैस उपचार संयंत्र की ऊर्जा जरूरतों का एक हिस्सा पूरा कर सकती है। वहीं उपचारित जल का पुन: उपयोग संभव होने से उद्योग जीरो लिक्विड डिस्चार्ज और अधिक टिकाऊ जल प्रबंधन की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।