भारत-यूके व्यापार समझौते से कृषि उत्पाद, प्रोसेस्ड फूड और सी-फूड निर्यात बढ़ाने के अवसर

यूके के साथ व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौता (CETA) भारत के कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों, विशेषकर प्रोसेस्ड फूड, अनाज, फल, सब्जियां, मसाले और समुद्री उत्पादों के निर्यात के लिए बड़े अवसर पैदा कर सकता है। हालांकि इनका लाभ उठाने के लिए भारतीय निर्यातकों को कड़े खाद्य सुरक्षा, ट्रेसबिलिटी और गुणवत्ता मानकों का पालन करना होगा।

भारत-यूके व्यापार समझौते से कृषि उत्पाद, प्रोसेस्ड फूड और सी-फूड निर्यात बढ़ाने के अवसर

भारत और यूनाइटेड किंगडम (यूके) के बीच हुए व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौते (CETA) से भारत के कृषि और संबद्ध क्षेत्रों के निर्यात को प्रोत्साहन मिलने की संभावना है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) की एक रिपोर्ट के अनुसार, विशेष रूप से प्रोसेस्ड फूड, अनाज, फल, सब्जियां, मसाले और समुद्री उत्पादों के निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। हालांकि रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि केवल आयात शुल्क में कमी से निर्यात नहीं बढ़ेगा। इसके लिए भारतीय निर्यातकों को ब्रिटेन के कड़े खाद्य सुरक्षा, ट्रेसबिलिटी, गुणवत्ता परीक्षण और प्रमाणन मानकों को पूरा करना होगा।

रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में यूके ने दुनिया से 928.9 अरब डॉलर का आयात किया, लेकिन इसमें भारत की हिस्सेदारी केवल 15.2 अरब डॉलर यानी 1.6 प्रतिशत रही। वहीं भारत के कुल 445 अरब डॉलर के निर्यात में यूके की हिस्सेदारी केवल 3.4 प्रतिशत थी। इससे स्पष्ट है कि CETA के माध्यम से दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ाने की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं।

GTRI का कहना है कि निर्यात की संभावनाएं केवल शुल्क कटौती पर निर्भर नहीं करतीं। इसके लिए यूके की आयात मांग, भारत की निर्यात क्षमता, मौजूदा बाजार हिस्सेदारी और CETA से मिलने वाले शुल्क लाभ के साथ-साथ खाद्य सुरक्षा, सैनिटरी एवं फाइटोसैनिटरी (SPS) मानकों, प्रमाणन और मजबूत आपूर्ति श्रृंखला की भी अहम भूमिका होगी।

प्रोसेस्ड फूड को सबसे अधिक लाभ

रिपोर्ट के अनुसार, CETA से भारत के प्रोसेस्ड फूड सेक्टर को बड़ा लाभ मिल सकता है। वर्ष 2025 में यूके ने 33.4 अरब डॉलर मूल्य के प्रोसेस्ड फूड का आयात किया, जबकि भारत की हिस्सेदारी केवल 35.4 करोड़ डॉलर यानी 1.1 प्रतिशत रही। दूसरी ओर भारत का वैश्विक प्रोसेस्ड फूड निर्यात 10 अरब डॉलर का है। रिपोर्ट के अनुसार, यदि भारतीय निर्यातक खाद्य सुरक्षा, लेबलिंग और ट्रेसबिलिटी संबंधी ब्रिटिश मानकों का पालन करें तो रेडी-टू-ईट खाद्य पदार्थ, बेकरी, कन्फेक्शनरी, सॉस और एथनिक फूड के निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।

अनाज, फल, सब्जियां और मसालों में बड़ी संभावनाएं

GTRI ने अनाज, सब्जियां, फल और मसालों को भी उच्च संभावनाओं वाला क्षेत्र बताया है। भारत ने 2025 में इन उत्पादों का 25.6 अरब डॉलर का वैश्विक निर्यात किया, जबकि यूके ने 23.2 अरब डॉलर का आयात किया। इसके बावजूद भारत की हिस्सेदारी केवल 7.16 करोड़ डॉलर यानी 3.1 प्रतिशत रही। रिपोर्ट का कहना है कि CETA के बाद शुल्क में कमी से भारतीय कृषि उत्पादों की प्रतिस्पर्धा क्षमता बढ़ेगी। हालांकि कुछ संवेदनशील कृषि उत्पादों में ब्रिटेन के SPS नियम और अन्य सुरक्षा उपाय निर्यात वृद्धि में बाधक बन सकते हैं।

समुद्री उत्पादों के निर्यात में अपार अवसर

रिपोर्ट के अनुसार, समुद्री उत्पादों के निर्यात में सबसे अधिक संभावनाएं हैं। यूके ने मछली, मांस और प्रसंस्कृत उत्पादों का 17.2 अरब डॉलर का आयात किया, जबकि भारत की आपूर्ति केवल 12.6 करोड़ डॉलर रही, जो यूके के कुल आयात का मात्र 0.7 प्रतिशत है। इस श्रेणी में भारत का वैश्विक निर्यात 12.8 अरब डॉलर का है। रिपोर्ट के अनुसार, यदि भारतीय निर्यातक SPS मानकों, अवशेष (रेजिड्यू) सीमा और ट्रेसबिलिटी आवश्यकताओं का पालन करें तो समुद्री उत्पाद क्षेत्र को काफी लाभ हो सकता है।

अन्य क्षेत्रों में भी निर्यात की संभावना

कृषि के अलावा रिपोर्ट में परिधान, वस्त्र, चमड़ा, फुटवियर, ऑटोमोबाइल, मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, सिरेमिक और धातु उत्पादों को भी उच्च निर्यात क्षमता वाले क्षेत्र बताया गया है। ऑटोमोबाइल क्षेत्र में भारत की हिस्सेदारी यूके के 92.2 अरब डॉलर के आयात बाजार में केवल 0.4 प्रतिशत है। इसी प्रकार, 106.2 अरब डॉलर के मशीनरी बाजार में भारत की हिस्सेदारी 1.3 प्रतिशत तथा 74.1 अरब डॉलर के दूरसंचार और इलेक्ट्रॉनिक्स बाजार में केवल 2.8 प्रतिशत है। CETA के बाद इन क्षेत्रों में निर्यात बढ़ने की अच्छी संभावना है।

कुछ क्षेत्रों में सीमित लाभ 

रिपोर्ट में रसायन, दवा, प्लास्टिक, रबर उत्पाद और खाद्य तेल को मध्यम संभावनाओं वाला क्षेत्र बताया गया है, जहां शुल्क से अधिक रेगुलेटरी आवश्यकताएं, पर्यावरण मानक और सरकारी खरीद नीतियां प्रभाव डालेंगी। लोहा-इस्पात, पेट्रोलियम, शराब और तंबाकू को कम संभावनाओं वाले क्षेत्रों में रखा गया है। इस्पात पर यूके के सेफगार्ड उपाय, कोटा और कार्बन नियम CETA के लाभ को सीमित कर सकते हैं। पेट्रोलियम व्यापार वैश्विक कीमतों पर निर्भर है, जबकि शराब और तंबाकू उत्पादों में उच्च कर, कड़े नियम और भारतीय ब्रांडों की सीमित मौजूदगी प्रमुख बाधाएं हैं।

GTRI का कहना है कि भारत को क्षेत्रवार निर्यात रणनीति अपनानी होगी। खाद्य उत्पाद निर्यातकों को परीक्षण सुविधाएं, ट्रेसबिलिटी और यूके के सैनिटरी एवं फाइटोसैनिटरी (SPS) मानकों का पालन मजबूत करना होगा। वहीं ऑटोमोबाइल, मशीनरी और इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियों को गुणवत्ता प्रमाणन, तकनीकी मानकों और आपूर्ति श्रृंखला को सुदृढ़ करना होगा।

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