जीनोम एडिटेड प्लांट्स को बॉयोसेफ्टी रेगुलेशन से छूट की मंजूरी, नई प्रजातियां विकसित करने की प्रक्रिया होगी तेज

अधिसूचना के मुताबिक जीनोम एडिटेड प्लांट्स को जेनेटिकली इंजीनियर्ड आर्गनिज्म या सेल्स रुल्स,1989 से छूट देने की सिफारिश उक्त मंत्रालयों और विभागों ने की थी। इसलिए केंद्र सरकार ने एसडीएन1 और एसडीएन2 श्रेणियों के तहत आने वाले प्लांट्स को उपर दिये गये रुल्स के रूल 7 से 11 तक छूट देने का फैसला लिया है। इन प्लांट्स से तैयार होने वाली किस्मों पर फसलों की नई प्रजातियों के लिए लागू होने वाले नियम-कानून लागू होंगे

जीनोम एडिटेड प्लांट्स को बॉयोसेफ्टी रेगुलेशन से छूट की मंजूरी, नई प्रजातियां विकसित करने की प्रक्रिया होगी तेज

एक ही पौधे के जीन को एडिट कर तैयार किये जाने वाले पौधों (प्लांट्स) की प्रक्रिया एसडीएन1 और एसडीएन2 को बॉयोसेफ्टी गाइडलाइन से छूट दे दी गई है। इस संबंध में आज यानी 30 मार्च, 2022 को पर्यावरण, वन एवं जलवायु मंत्रालय ने अधिसूचना जारी कर दी। यह फैसला करीब एक साल से अटका हुआ था। मंत्रालय के अधिकारियों ने इस बारे में राज्यों की राय मांगते हुए सितंबर, 2021 में राज्यों को पत्र लिख दिया था। लेकिन अधिकांश संबंधित विभाग और वैज्ञानिक इस तरह की प्रक्रिया के पक्ष में नहीं थे। इस संबंध में जारी अधिसूचना में कहा गया है कि डिपार्टमेंट ऑफ बायोटेक्नोलॉजी, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय, डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च एंड एजुकेशन और कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने जीनोम एडिटिंग से तैयार एसडीएन1 और एसडीएन2 प्लांट्स के लिए बॉयोसेफ्टी गाइडलाइंस से छूट की सिफारिश की थी। इस तकनीक में एक ही पौधे के जीन्स का इस्तेमाल किया जाता है और इसमें कोई बाहरी जीन शामिल नहीं होता है, इसलिए यह जेनेटिकली इंजीनियर्ड –मोडिफाइड (जीएम) तकनीक से अलग है। इसी को आधार बनाकर इस तकनीक को बॉयोसेफ्टी गाइडलाइन से छूट देने की बात की जा रही थी। करीब दो सप्ताह पहले कृषि मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने रूरल वॉयस को बताया था कि कृषि मंत्रालय ने इसके पक्ष में अपनी राय दे दी है।

अधिसूचना के मुताबिक जीनोम एडिटेड प्लांट्स को जेनेटिकली इंजीनियर्ड आर्गनिज्म या सेल्स रुल्स, 1989 से छूट देने की सिफारिश उक्त मंत्रालयों और विभागों ने की थी। इसलिए केंद्र सरकार ने एसडीएन1 और एसडीएन2 श्रेणियों के तहत आने वाले प्लांट्स को उपर दिये गये रुल्स के रूल 7 से 11 तक छूट देने का फैसला लिया है। इन प्लांट्स से तैयार होने वाली किस्मों पर फसलों की नई प्रजातियों के लिए लागू होने वाले नियम-कानून लागू होंगे।

इस मुद्दे पर रूरल वॉयस ने 29 सितंबर, 2021 को एक विस्तृत खबर की थी जिसका लिंक यहां दिया गया है https://www.ruralvoice.in/national/consent-from-states-for-trials-of-genome-edited-plants-may-create-hurdles-in-benefiting-from-new-technology.html

असल में जीनोम एडिटिंग की इस तकनीक में एक ही प्लांट के परिवार के जींस को एडिट किया जाता है और उसी फैमिली के प्लांट के अधिक उत्पादकता, बीमारी से लड़ने में सक्षम, तापमान में परिवर्तन के बावजूद उत्पादन में सक्षम गुणों को लेकर एक नई किस्म तैयार करना संभव है। साथ ही इसके जरिये बेहतर टारगेटेड अप्रोच का फायदा लिया जा सकता है। इस तकनीक का फायदा यह है कि इसके जरिये नई वेरायटी विकसित करने की प्रक्रिया बहुत छोटी हो जाती है जिसे वैज्ञानिक एक्सीलरेट कहते हैं। यानी किसी भी फसल की किस्म को बहुत कम समय में तैयार किया जा सकेगा। जीनोम एडिटेड टेक्नोलॉजी पर अमेरिका और ब्रिटेन में भी बॉयोसेफ्टी रेगुलेशन लागू नहीं हैं।

सरकार के इस फैसले के बारे में रूरल वॉयस के साथ बातचीत करते हुए भारतीय कृषि कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के पूर्व डायरेक्टर जनरल (डीजी) और ट्रस्ट फॉर एडवांसमेंट इन एग्रीकल्चरल साइंसेज (तास) के चेयरमैन डॉ. आर. एस. परोदा ने बताया कि जीनोम एडिटेड टेक्नोलॉजी को बॉयोसेफ्टी गाइडलाइन से छूट मिलने से अब नई प्रजातियों का विकास तेजी से हो सकेगा। साथ ही इसका फायदा यह है कि देश में मौजूद बॉयो रिसोर्जेस का इस्तेमाल पब्लिक गुड्स के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा। इस तकनीक की खूबसूरती यह है कि बेहतर उत्पादकता के जीन तो पौधे में डाले ही जा सकते हैं, साथ ही यह देश की खाद्य सुरक्षा और पोषण सुरक्षा में भी बड़ी भूमिका निभाने में सक्षम है, क्योंकि इसके जरिये एक ही पौधे की विभिन्न वेरायटी में उपलब्ध पोषक तत्वों को एक साथ लाया जा सकेगा। वहीं इस तकनीक के जरिये पौधों को जलवायु परिवर्तन और तापमान में होने वाले बदलाव से भी लड़ने में सक्षम बनाना संभव है। उनका कहना है कि पहले ही हमारे पास मोहाली स्थित नेशनल एग्रीकल्चर बॉयोटेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट (नाबी) में केले की एक प्रजाति तैयार है।

इस तकनीक ने नई प्रजातियां विकसित करने की प्रक्रिया को बहुत छोटा कर दिया है। साथ ही यह सटीक परिणाम लाने में सक्षम है। जीन एडिटिंग की इस नई तकनीक को क्रिसपर/कास9 नाम दिया गया है। इसके लिए फ्रांस की वैज्ञानिक डॉ. एमानुअल कारेंपेंटीअर और अमेरिका की वैज्ञानिक डॉ. जेनिफर डुआंडा को 2020 का केमिस्ट्री का नोबल पुरस्कार दिया गया था। इस तकनीक का उपयोग जीन एडिटिंग के जरिये नई प्रजातियों को विकसित करने में किया जा रहा है। अमेरिका और फ्रांस में इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर कई वेरायटी रिलीज की जा चुकी हैं। जो दूसरे देश अपने फायदे के लिए इस तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं उनमें जापान और आस्ट्रेलिया शामिल हैं।

सूत्रों के मुताबिक भारतीय कृषि अनुसांन परिषद (आईसीएआर) ने इस टेक्नोलॉजी का फायदा उठाने के लिए इस पर काम शुरू कर दिया था। साथ ही डिपार्टमेंट ऑफ बॉयोटेक्नोलॉजी ने नेशनल एकेडमी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (नास) के साथ विस्तृत चर्चा के बाद जीनोम एडिटेड प्लांट्स की सेफ्टी असेसमेंट की ड्राफ्ट गाइडलाइंस तैयार की थी। ड्राफ्ट गाइडलाइंस की डीबीटी द्वारा गठित एक एक्सपर्ट कमेटी ने भी समीक्षा की थी। इसके साथ ही रेगुलेटरी कमेटी ऑन जेनेटिक मेनिपुलेशन (आरसीजीएम) ने भी इनको मंजूरी दे दी थी।

पिछले साल मार्च में कृषि शोध से जुड़े संस्थानों ने एक पॉलिसी ब्रीफ भी तैयार किया था। इन संस्थानों में ट्रस्ट फॉर एडवांसमेंट इन एग्रीकल्चरल साइंसेज (तास), नेशनल एकेडमी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (नास), आईसीएआर, बॉयोटेक कंसोर्सियम इंडिया लिमिटेड, टाटा इंस्टीट्यूट फॉर जेनेटिक्स एंड सोसाइटी, नेशनल एग्री-फूट बॉयोटेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट, बॉयोटेक्नोलॉजी इंडस्ट्री रिसर्च असिस्टेंस काउंसिल शामिल हैं। मार्च में इस विषय पर इन संस्थानों ने एक डायलॉग किया था और इस तकनीक को देश में कृषि क्षेत्र के लिए जरूरी बताया था।