मिट्टी लैब्स को आइसोमेट्रिक से मिले धान में मीथेन उत्सर्जन घटाने के 97 हजार प्रमाणपत्र
मिट्टी लैब्स को आइसोमेट्रिक से धान की खेती में मीथेन उत्सर्जन घटाने के 97 हजार से अधिक प्रमाणपत्र मिले हैं। चार राज्यों के एक लाख से अधिक किसान इस पहल से जुड़े हैं। इससे जल संरक्षण और पर्यावरण अनुकूल खेती को बढ़ावा मिलेगा।
मिट्टी लैब्स को धान की खेती से होने वाले मीथेन उत्सर्जन में कमी लाने के लिए 97 हजार से अधिक कार्बन प्रमाणपत्र मिले हैं। जलवायु प्रमाणन कंपनी आइसोमेट्रिक ने अपने सुपरपॉल्यूटेंट कार्यक्रम के तहत पहली बार धान में मीथेन उत्सर्जन घटाने के लिए ये प्रमाणपत्र जारी किए हैं। ये प्रमाणपत्र दक्षिण भारत में संचालित परियोजनाओं से संबंधित हैं और इन्हें गूगल तथा सेल्सफोर्स सहित विभिन्न कंपनियों को उपलब्ध कराया जाएगा।
इस उपलब्धि को कृषि क्षेत्र से मीथेन उत्सर्जन घटाने के प्रयासों को बड़े स्तर पर आगे बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। प्रत्येक प्रमाणपत्र एक टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर उत्सर्जन में कमी को दर्शाता है। इनका स्वतंत्र रूप से आइसोमेट्रिक के राइस मीथेन रिडक्शन प्रोटोकॉल के तहत सत्यापन किया गया है।
यह उपलब्धि ऐसे समय में आई है, जब वायुमंडल में मीथेन की मात्रा लगातार बढ़ रही है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्लूएमओ) के अनुसार, वर्ष 2025 में वायुमंडल में मीथेन की सांद्रता अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई। अब तक वैश्विक तापवृद्धि में मीथेन का योगदान लगभग एक-तिहाई रहा है। इसलिए जलवायु परिवर्तन की गति को कम करने के लिए इसके उत्सर्जन में कटौती को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
धान की खेती मीथेन उत्सर्जन के बड़े स्रोतों में से एक है। इससे हर वर्ष लगभग एक अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है। यह मात्रा दुनिया के विमानन उद्योग से होने वाले कुल उत्सर्जन के लगभग बराबर है। इसका अधिकांश हिस्सा उन खेतों से निकलता है, जहां पूरी फसल अवधि के दौरान पानी भरा रहता है। ऐसी जलभराव वाली और ऑक्सीजन की कमी वाली मिट्टी में मीथेन बनाने वाले सूक्ष्मजीव तेजी से सक्रिय होते हैं।
मिट्टी लैब्स इस समस्या से निपटने के लिए वैकल्पिक गीली और सूखी सिंचाई पद्धति (Alternate Wetting and Drying-AWD) को बढ़ावा दे रही है। इसमें पूरी फसल अवधि के दौरान खेतों में लगातार पानी भरा रखने के बजाय निश्चित अंतराल पर खेतों को सुखाया और फिर पानी भरा जाता है। कंपनी के अनुसार, इस पद्धति से फसल की पैदावार प्रभावित किए बिना मीथेन उत्सर्जन में 50 प्रतिशत तक और पानी की खपत में 40 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है।
कंपनी की इन परियोजनाओं से तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और ओडिशा के एक लाख से अधिक किसान जुड़े हैं। कार्बन प्रमाणपत्रों की बिक्री से प्राप्त राशि का इस्तेमाल इन परियोजनाओं के वित्तपोषण और स्थानीय समुदायों में रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए किया जाएगा। वर्ष 2027 की शुरुआत से इस राशि का एक हिस्सा सीधे भाग लेने वाले किसानों को देने की भी योजना है।
मीथेन जैसी अत्यधिक प्रभावशाली ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने वाली परियोजनाओं में कंपनियों की रुचि भी बढ़ रही है। कम अवधि में मीथेन का तापमान बढ़ाने वाला प्रभाव कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में काफी अधिक होता है। गूगल और सेल्सफोर्स ने मिट्टी लैब्स के साथ मिलकर उत्सर्जन में कुल 15 लाख टन कमी लाने के लिए समझौते किए हैं।
प्रमाणन की इस प्रक्रिया में आइसोमेट्रिक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित सर्टिफाई मंच की मदद ली गई। यह मंच आंकड़ों के सत्यापन और गणना की प्रक्रिया को स्वचालित बनाता है। प्रमाणपत्रों से जुड़े साक्ष्य और गणनाओं का विवरण आइसोमेट्रिक की सार्वजनिक रजिस्ट्री पर उपलब्ध कराया गया है।
मिट्टी लैब्स के अनुसार, इस प्रमाणन से धान की खेती में मीथेन उत्सर्जन घटाने वाली परियोजनाओं की मांग बढ़ेगी और उसके कार्यक्रमों का विस्तार करने में मदद मिलेगी। कंपनी उपग्रह तकनीक, एआई और खेत स्तर पर किए जाने वाले कार्यों के माध्यम से जलवायु अनुकूल धान उत्पादन को बढ़ावा देती है।

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