जलवायु सहनशील कृषि अनुसंधान के लिए हैदराबाद विश्वविद्यालय को 2.5 करोड़ रुपये का अनुदान

हैदराबाद विश्वविद्यालय (UoH) को BioE3 नीति के तहत जलवायु सहनशील कृषि के लिए जैव प्रौद्योगिकी आधारित समाधान विकसित करने के उद्देश्य से DBT-BIRAC से 2.5 करोड़ रुपये के दो शोध अनुदान मिले हैं। परियोजनाओं में फॉक्सटेल मिलेट की जलवायु सहनशीलता बढ़ाने के लिए माइक्रोबियल बायो-इनपुट और टमाटर को वायरल रोगों से बचाने के लिए जीन एडिटिंग व पेप्टाइड आधारित उपचार पर काम किया जाएगा।

जलवायु सहनशील कृषि अनुसंधान के लिए हैदराबाद विश्वविद्यालय को 2.5 करोड़ रुपये का अनुदान

हैदराबाद विश्वविद्यालय (UoH) को जलवायु सहनशील कृषि के क्षेत्र में काम करने के लिए दो शोध अनुदान मिले हैं। इन दोनों परियोजनाओं के लिए जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) की BioE3 (बायोटेक्नोलॉजी फॉर इकोनॉमी, एनवायरमेंट एंड एंप्लॉयमेंट) नीति के तहत DBT-BIRAC के माध्यम से कुल 2.5 करोड़ रुपये की फंडिंग दी गई है।

यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ लाइफ साइंसेज के डिपार्टमेंट ऑफ प्लांट साइंसेज के डॉ. एम. मुथामिलारासन दोनों परियोजनाओं में विश्वविद्यालय की ओर से प्रमुख अन्वेषक (Principal Investigator) हैं। इन परियोजनाओं में कई राष्ट्रीय संस्थानों के वैज्ञानिक मिलकर जलवायु-सहनशील खेती के लिए जैव प्रौद्योगिकी आधारित समाधान विकसित करेंगे।

पहली परियोजना के तहत कंगनी (फॉक्सटेल मिलेट) की जलवायु सहनशीलता बढ़ाने के लिए माइक्रोबियल कंसोर्टिया विकसित किए जाएंगे। इस परियोजना को डॉ. मुथामिलारासन प्रमुख अन्वेषक और डॉ. जोगी मधुप्रकाश सह-प्रमुख अन्वेषक के रूप में संचालित कर रहे हैं। दोनों डिपार्टमेंट ऑफ प्लांट साइंसेज से जुड़े हैं।

इस परियोजना के अन्य प्रमुख अन्वेषकों में दिल्ली यूनिवर्सिटी साउथ कैंपस के प्रो. मनोज प्रसाद, तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय, कोयंबटूर के प्रो. के. इयनार, GITAM, हैदराबाद की डॉ. टी. स्वरूपा रानी और KIIT यूनिवर्सिटी, ओडिशा के डॉ. गुलाब आर्या शामिल हैं।

इस परियोजना में पौधों से जुड़े लाभकारी सूक्ष्मजीवों की पहचान, टिकाऊ बायो-इनपुट का विकास, जलवायु सहनशीलता और कम-इनपुट वाली खेती में उनका मूल्यांकन तथा विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में परीक्षण किया जाएगा।

इनसे विकसित होने वाले बायो-इनपुट से फसलों की जलवायु संबंधी तनावों के प्रति सहनशीलता बढ़ने, रासायनिक इनपुट पर किसानों की निर्भरता कम होने, मिट्टी के स्वास्थ्य और पैदावार में सुधार होने तथा भारत की स्वदेशी बायो-मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

दूसरी परियोजना का उद्देश्य जीन एडिटिंग और पेप्टाइड आधारित पत्तियों पर छिड़काव के जरिए टमाटर में वायरल रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित करना है। इस परियोजना के प्रमुख अन्वेषकों में दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रो. मनोज प्रसाद, जो वर्तमान में नई दिल्ली स्थित BRIC-NIPGR के निदेशक के रूप में प्रतिनियुक्ति पर हैं, BRIC-इंस्टीट्यूट ऑफ लाइफ साइंसेज, भुवनेश्वर की डॉ. नमिशा शर्मा और हैदराबाद विश्वविद्याल के डॉ. मुथामिलारासन शामिल हैं।

इस परियोजना में फसल की जलवायु सहनशीलता बढ़ाने के लिए जीनोम एडिटिंग तकनीक को पौधों की सुरक्षा के लिए जैव-आधारित रणनीति के साथ जोड़ा जाएगा। दोनों तकनीकों का विभिन्न स्थानों पर खेत स्तर पर परीक्षण किया जाएगा। इससे टमाटर की उत्पादकता बढ़ाने और रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

परियोजनाओं के बारे में डॉ. मुथामिलारासन ने कहा कि ये दोनों BioE3 परियोजनाएं टमाटर और मिलेट पर उनकी प्रयोगशाला के अब तक के शोध कार्य का स्वाभाविक विस्तार हैं। उन्होंने कहा कि एक परियोजना टमाटर को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाने वाले वायरल रोगों के खिलाफ उसकी सुरक्षा को मजबूत करेगी, जबकि दूसरी कंगनी मिलेट की सहनशीलता का उपयोग करके बदलती जलवायु से फसलों को बेहतर ढंग से निपटने में मदद करेगी।

उन्होंने कहा कि इन दोनों अनुदानों के साथ उनकी प्रयोगशाला के परियोजना पोर्टफोलियो का कुल मूल्य 417.71 लाख रुपये हो गया है। उन्होंने कहा कि यह समर्थन उनके शोध कार्य में जताए गए विश्वास को दर्शाता है और टमाटर तथा मिलेट अनुसंधान के राष्ट्रीय केंद्र के रूप में हैदराबाद विश्वविद्यालय की बढ़ती भूमिका को मजबूत करता है।

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