भारतीय कृषि-रसायन कंपनियों के संगठन क्रॉप केयर फेडरेशन ऑफ इंडिया (CCFI) ने सरकार से कृषि-रसायन मॉलीक्यूल के लिए 20 वर्ष की पेटेंट अवधि से आगे डेटा संरक्षण की मांग को स्वीकार नहीं करने का आग्रह किया है। फेडरेशन ने कहा कि इस तरह के कदम से जेनेरिक उत्पादों की बाजार में एंट्री में देरी हो सकती है, किसानों के लिए लागत बढ़ सकती है, घरेलू मैन्युफैक्चरिंग कमजोर हो सकती है और भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है।
मीडिया से बातचीत में CCFI के चेयरमैन दीपक शाह और वाइस-चेयरमैन राजेश अग्रवाल ने कहा कि कुछ ‘साथी उद्योगपति’ ऐसे कृषि-रसायन मॉलीक्यूल के लिए अतिरिक्त डेटा संरक्षण चाहते हैं, जिनका पेटेंट समाप्त हो चुका है, लेकिन उन्हें अभी तक भारत में बाजार में नहीं उतारा गया है।
CCFI के अनुसार, ऐसे मॉलीक्यूल के लिए पांच वर्ष का डेटा संरक्षण, इसके बाद डेटा तैयार करने के लिए दो वर्ष और फिर रेगुलेटरी रजिस्ट्रेशन के लिए दो वर्ष का समय शामिल है। इसका मतलब है कि कुछ मॉलीक्यूल मूल पेटेंट जारी होने के करीब 30 वर्ष बाद प्रभावी रूप से भारत में उपलब्ध हो सकेंगे।
CCFI ने कहा कि यदि इसके बाद पांच वर्ष का अतिरिक्त डेटा संरक्षण दिया जाता है तो प्रभावी एक्सक्लूसिविटी अवधि 35-36 वर्ष तक बढ़ सकती है। इसके बाद ही भारतीय कंपनियां ऐसे मॉलीक्यूल के पंजीकरण के लिए आवेदन कर सकेंगी और पंजीकरण में तीन वर्ष तक लग सकते हैं। इस तरह पूरा समय 37-40 वर्ष तक पहुंच सकता है, जो किसी मॉलीक्यूल का वाणिज्यिक जीवनकाल होता है।
CCFI का तर्क है कि ऐसी व्यवस्था में पंजीकरण हासिल करने के बाद भारतीय निर्माताओं के पास जेनेरिक मॉलीक्यूल के व्यावसायिक लाभ के लिए बहुत कम समय बचेगा। संगठन ने कहा कि इससे भारत के घरेलू कृषि-रसायन उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मकता कमजोर हो सकती है और करीब 45,000 करोड़ रुपये के मैन्युफैक्चरिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए जोखिम पैदा हो सकता है।
फेडरेशन ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि जिन मॉलीक्यूल को बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपनी पेटेंट अवधि के दौरान भारत में बाजार में नहीं उतारा, उनके लिए अतिरिक्त संरक्षण की जरूरत क्यों है।
CCFI के पदाधिकारियों ने कहा, “जब कंपनियां नए मॉलीक्यूल का आविष्कार करती हैं तो वे पूरी दुनिया के लिए डेटा तैयार करती हैं, फिर पेटेंट अवधि के दौरान वे मॉलीक्यूल का पंजीकरण क्यों नहीं करातीं?” उन्होंने कहा कि वर्तमान में भी कई मॉलीक्यूल पेटेंट के तहत हैं, लेकिन उनका भारत में पंजीकरण नहीं कराया गया है।
पहले लागू डेटा एक्सक्लूसिविटी व्यवस्था के अनुभव का उल्लेख करते हुए CCFI ने कहा कि 2007 में तकनीकी उत्पादों के पंजीकरण की प्रक्रिया के दौरान कंपनियों ने तकनीकी उत्पाद के पंजीकरण के लिए जरूरी उच्च शुद्धता वाले तकनीकी नमूने और शेल्फ-लाइफ संबंधी डेटा उपलब्ध नहीं कराया था।
नए मॉलीक्यूल के व्यावसायीकरण पर CCFI के सवाल
CCFI ने दावा किया कि 2010 के बाद से पश्चिमी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को नए कीटनाशक मॉलीक्यूल के लिए दिए गए प्रत्येक 10 पेटेंट में से करीब छह का भारत में व्यावसायिक इस्तेमाल शुरू नहीं हुआ है। फेडरेशन ने सवाल किया कि जिन मॉलीक्यूल को पेटेंट अवधि के दौरान भारतीय किसानों के लिए उपलब्ध ही नहीं कराया गया, उनके लिए एक और एक्सक्लूसिविटी की परत बनाने की जरूरत क्यों है।
CCFI ने भारत में पंजीकृत कृषि-रसायन मॉलीक्यूल की संख्या कम होने के दावों को भी संदर्भ के साथ देखने की जरूरत बताई। जहां कुछ उद्योग हितधारक भारत में सिर्फ 392 पंजीकृत मॉलीक्यूल का उल्लेख करते हैं, वहीं CCFI ने कहा कि दुनियाभर में 1,000 से अधिक मॉलीक्यूल पंजीकृत हैं। संगठन के अनुसार, ब्राजील जैसे देशों में भी पंजीकृत मॉलीक्यूल की संख्या 300 से कम है। CCFI चेयरमैन ने कहा कि भारत में पंजीकृत मॉलीक्यूल की संख्या एक वर्ष या उससे कुछ अधिक समय में बढ़कर 415 तक पहुंच सकती है।
फेडरेशन ने यह भी कहा कि भारत एक प्रमुख कृषि-रसायन निर्माता और दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कीटनाशक निर्यातक है। ऐसे में उसे तैयार कृषि-रसायन फॉर्मुलेशन के आयात पर निर्भर नहीं होना चाहिए।
आयात और घरेलू मैन्युफैक्चरिंग
CCFI ने उद्योग के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि डेटा एक्सक्लूसिविटी की पिछली अवधि के दौरान कृषि-रसायनों के आयात में तेज वृद्धि हुई थी। फेडरेशन के अनुसार, 2007-17 के दौरान आयात 547 प्रतिशत बढ़ा, जबकि डेटा एक्सक्लूसिविटी अवधि समाप्त होने के बाद 2017-24 के दौरान आयात में केवल 17 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
CCFI ने कहा कि बाद की अवधि में घरेलू उत्पादन और मैन्युफैक्चरिंग क्षमता में भी मजबूती आई। संगठन के अनुसार, इससे संकेत मिलता है कि डेटा एक्सक्लूसिविटी के अभाव ने भारत के कृषि-रसायन उद्योग के विस्तार को बाधित नहीं किया।
फेडरेशन ने हाल के वर्षों में नए कीटनाशक मॉलीक्यूल के पंजीकरण का भी उल्लेख किया। उसने कहा कि पिछले दो वर्षों में भारत में 36 नए कीटनाशक मॉलीक्यूल पंजीकृत किए गए, जो एक रिकॉर्ड है। CCFI ने कहा कि यह संख्या मलेशिया, ब्राजील और थाईलैंड जैसे उन कई देशों से अधिक है, जहां डेटा विशिष्टता की व्यवस्था लागू है।
CCFI के अनुसार, भारत वर्तमान में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कृषि-रसायन निर्यातक है और 160 से अधिक देशों को निर्यात करता है। फेडरेशन ने यह भी कहा कि वैश्विक कृषि-रसायन बाजार का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा जेनेरिक उत्पादों का है और दुनिया के शीर्ष 10 सबसे अधिक बिकने वाले कृषि-रसायन भी जेनेरिक हैं।
संसदीय समिति की आपत्तियां
अतिरिक्त डेटा संरक्षण के विरोध में CCFI ने संसदीय समितियों की टिप्पणियों का भी हवाला दिया। उसने 38वीं रसायन एवं उर्वरक संबंधी स्थायी समिति का उल्लेख किया, जिसने 2021 में 20 वर्ष की पेटेंट एकाधिकार अवधि से आगे संरक्षण बढ़ाने की उपयुक्तता पर सवाल उठाया था।
CCFI के अनुसार, समिति ने कहा था कि मौजूदा 20 वर्ष की पेटेंट अवधि अपने आप में पर्याप्त लंबी है तथा संरक्षण को और बढ़ाने से पुरानी तकनीकों के इस्तेमाल को बढ़ावा मिल सकता है।
फेडरेशन का तर्क है कि अतिरिक्त डेटा संरक्षण से बाजार में नए एकाधिकार पैदा हो सकते हैं और अंततः कृषि-रसायनों की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिसका सीधा असर भारतीय किसानों पर पड़ेगा।