वैश्विक अनाज बाजार की तस्वीर बदलने जा रहा है चीन, जानिए कैसे पड़ेगा दुनिया पर असर

चीन ने वर्ष 2030 तक घरेलू अनाज उत्पादन बढ़ाने, आयात पर निर्भरता घटाने, आयात स्रोतों में विविधता लाने और रणनीतिक भंडार मजबूत करने की योजना बनाई है। इससे वैश्विक अनाज व्यापार, कमोडिटी की कीमतों, निवेश और प्रमुख निर्यातक देशों की रणनीतियों में बड़ा बदलाव आ सकता है।

वैश्विक अनाज बाजार की तस्वीर बदलने जा रहा है चीन, जानिए कैसे पड़ेगा दुनिया पर असर
दुनिया के कुल अनाज का लगभग एक-चौथाई हिस्सा उपभोग करने वाला चीन अब अपनी खाद्य सुरक्षा रणनीति में बड़ा बदलाव करने जा रहा है। वर्ष 2030 तक के लिए तैयार नए ग्रेन इंडस्ट्री डेवलपमेंट प्लान के तहत बीजिंग ने घरेलू अनाज उत्पादन बढ़ाने, आयात पर निर्भरता घटाने, आयात स्रोतों में विविधता लाने और रणनीतिक भंडार को मजबूत करने का लक्ष्य तय किया है। यदि यह योजना सफल होती है तो इसका असर केवल चीन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक अनाज व्यापार, कीमतों और कृषि निवेश के पूरे समीकरण को बदल सकता है।
 
चीन की 15वीं पंचवर्षीय योजना के तहत वर्ष 2030 तक वार्षिक अनाज उत्पादन बढ़ाकर 72.5 करोड़ टन करने का लक्ष्य रखा गया है। वर्ष 2025 में उत्पादन 71.49 करोड़ टन रहने रहा है। इस लिहाज से उत्पादन में वृद्धि भले ही सीमित दिखाई दे, लेकिन सरकार का जोर कृषि उत्पादकता बढ़ाने पर है। इसके लिए उन्नत बीज प्रौद्योगिकी, आधुनिक खेती, कृषि मशीनीकरण, सिंचाई सुविधाओं का विस्तार और कृषि इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया जाएगा।
 
हालांकि सबसे बड़ा बदलाव चीन की आयात नीति में देखने को मिलेगा। बीजिंग चाहता है कि विदेशी अनाज पर उसकी निर्भरता एक नियंत्रित सीमा के भीतर रहे। इसके लिए वह किसी एक देश या क्षेत्र पर अधिक निर्भर रहने के बजाय दक्षिण अमेरिका, ब्लैक सी क्षेत्र, दक्षिण-पूर्व एशिया और मध्य एशिया जैसे नए स्रोतों से खरीद बढ़ाएगा। इसका उद्देश्य भू-राजनीतिक तनाव, व्यापारिक विवाद और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे रणनीतिक समुद्री मार्गों में संभावित व्यवधानों से खाद्य आपूर्ति को सुरक्षित रखना है।
 
इंटरनेशनल ग्रेन्स काउंसिल के अनुसार यह बदलाव केवल चीन तक सीमित नहीं है। कोविड महामारी और हाल के वर्षों में वैश्विक भू-राजनीतिक संकटों के बाद कई आयातक देश अब ऐसी रणनीति अपना रहे हैं जिसमें जरूरत पड़ने से पहले ही पर्याप्त भंडारण और विविध स्रोतों से खरीद सुनिश्चित की जा रही है। चीन भी इसी दिशा में आगे बढ़ रहा है।
 
विश्लेषकों का मानना है कि भविष्य में चीन का आयात पहले की तरह लगातार बढ़ने के बजाय अधिक रणनीतिक होगा। सरकार घरेलू उत्पादन में कमी आने या अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनुकूल कीमत मिलने पर ही बड़े पैमाने पर खरीद करेगी। इससे चीन की वार्षिक आयात मांग में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है।
 
हालांकि इस महत्वाकांक्षी योजना के सामने कई बड़ी चुनौतियां भी हैं। चीन के पास सीमित कृषि योग्य भूमि है, तेजी से बढ़ता शहरीकरण खेती योग्य क्षेत्र को कम कर रहा है, जबकि जल संकट और जलवायु परिवर्तन से उत्पादन पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। विशेष रूप से धान और मक्का जैसी फसलों के लिए पानी की पर्याप्त उपलब्धता एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। इसके अलावा सिंचाई और कृषि इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित करने से उत्पादन लागत भी बढ़ने की आशंका है।
 
सोयाबीन के मामले में चीन की आत्मनिर्भरता की राह और भी कठिन दिखाई देती है। सरकार ने पशु आहार में सोयाबीन की खपत कम करने, वैकल्पिक प्रोटीन और अन्य फीड सामग्री को बढ़ावा देने जैसे कई प्रयास किए हैं। इसके बावजूद घरेलू उत्पादन से मांग पूरी नहीं हो पा रही है और चीन का सोयाबीन आयात लगातार रिकॉर्ड स्तर पर बना हुआ है। माना जा रहा है कि निकट भविष्य में चीन पूरी तरह आयात से मुक्त नहीं हो पाएगा।
 
नई योजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रणनीतिक अनाज भंडार को बढ़ाना भी है। बड़े भंडार से सरकार आपूर्ति संकट या कीमतों में अचानक आई तेजी के समय बाजार को स्थिर रखने में सक्षम होगी। हालांकि इतने बड़े भंडार का निर्माण और रखरखाव काफी महंगा है। भंडारण, फाइनेंसिंग, नियमित रोटेशन और गुणवत्ता बनाए रखने की लागत बहुत अधिक होती है। इसलिए विश्लेषकों का कहना है कि भंडार केवल अल्पकालिक संकट से निपटने का साधन हो सकते हैं, वे लंबे समय तक आयात का विकल्प नहीं बन सकते।
 
यदि चीन अपनी रणनीति में सफल रहता है तो इसका सबसे अधिक असर अमेरिका, ब्राजील और अर्जेंटीना जैसे प्रमुख कृषि निर्यातकों पर पड़ सकता है। विशेष रूप से मक्का, गेहूं, जौ और ज्वार के निर्यातकों को चीन से कम और अधिक अस्थिर मांग का सामना करना पड़ सकता है। जिन देशों ने चीन की बढ़ती मांग को ध्यान में रखकर उत्पादन क्षमता और निर्यात इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास किया है, उन्हें भविष्य में अधिक मूल्य अस्थिरता और जोखिम झेलना पड़ सकता है।
 
यदि चीन की आयात मांग अपेक्षाकृत धीमी होती है तो अफ्रीका, एशिया और मध्य-पूर्व के आयात निर्भर देशों के लिए वैश्विक बाजार में अधिक अनाज उपलब्ध हो सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि चीन वैश्विक कृषि बाजार से बाहर नहीं होगा, बल्कि उसका प्रभाव अब बढ़ती खपत के बजाय रणनीतिक सरकारी नीतियों और नियंत्रित आयात के माध्यम से दिखाई देगा। आने वाले वर्षों में वैश्विक अनाज बाजार में केवल उत्पादन और मांग नहीं, बल्कि भू-राजनीति, आपूर्ति श्रृंखला और सरकारी फैसले भी कीमतों और व्यापार की दिशा तय करेंगे।

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