अल नीनो से सूखे का खतरा, FAO ने की सर्वाधिक जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान
41 वर्षों के उपग्रह आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर FAO ने उन क्षेत्रों की पहचान की है जहां फसलों और चरागाहों को सूखे से सबसे अधिक नुकसान पहुंच सकता है। भारत समेत कई देशों में खेती, पशुधन और खाद्य सुरक्षा पर सूखे का गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के अनुसार, आने वाले कुछ सप्ताहों में अल नीनो (El Niño) का नया चरण शुरू होने की संभावना है, जिससे दुनिया के कई कृषि क्षेत्रों में सूखे का खतरा बढ़ सकता है। FAO के विशेषज्ञों द्वारा तैयार किए गए नए विश्लेषण में उन क्षेत्रों की पहचान की गई है जहां सूखा फसलों और चरागाहों को सबसे अधिक प्रभावित कर सकता है।
FAO ने अपने एग्रीकल्चरल स्ट्रेस इंडेक्स सिस्टम (ASIS) के तहत 41 वर्षों के उपग्रह आंकड़ों का विश्लेषण किया है। इस अध्ययन में उन क्षेत्रों को चिह्नित किया गया है जहां अतीत में मजबूत और अत्यधिक मजबूत अल नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO) घटनाओं के दौरान गंभीर कृषि सूखा देखा गया था।
दक्षिण एशिया और अफ्रीका में अधिक खतरा
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने इस बार सामान्य से अधिक मजबूत अल नीनो चक्र की संभावना जताई है। FAO के अनुसार, साहेल क्षेत्र, दक्षिणी अफ्रीका, दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व एशिया, मध्य अमेरिका के ड्राई कॉरिडोर और कैरेबियाई देशों में कृषि भूमि और चरागाहों पर सूखे की संभावना 50 प्रतिशत से अधिक है।
दक्षिण एशिया में पाकिस्तान, भारत, म्यांमार, थाईलैंड, कंबोडिया और वियतनाम से लेकर फिलीपींस, इंडोनेशिया और तिमोर-लेस्ते तक कृषि सूखे का जोखिम बढ़ सकता है। भारत में अल नीनो के कारण दक्षिण-पश्चिम मानसून कमजोर पड़ सकता है, जिससे वर्षा आधारित धान और मक्का जैसी फसलों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है।
अतीत में अल नीनो से नुकसान
FAO के अनुसार, 2015-16 और 2023-24 के अल नीनो चक्रों के दौरान कई क्षेत्र गंभीर रूप से प्रभावित हुए थे। अल नीनो अक्सर फसल विफलता, पशुधन हानि, ग्रामीण परिवारों पर बढ़ते कर्ज और भोजन तथा पानी की तलाश में पलायन जैसी समस्याओं को जन्म देता है।
साल 2015-16 के अल नीनो के दौरान 23 देशों में 6 करोड़ से अधिक लोग प्रभावित हुए थे और राहत कार्यों के लिए लगभग 5 अरब डॉलर की मानवीय सहायता की आवश्यकता पड़ी थी।
जलवायु संकट और संघर्ष से बढ़ी चुनौती
FAO के प्राकृतिक संसाधन अधिकारी जॉर्ज अल्वार-बेल्ट्रान ने कहा कि यह अल नीनो पिछले चक्रों जैसा नहीं है। आज पृथ्वी पहले की तुलना में अधिक गर्म है और कई क्षेत्रों में संघर्ष तथा खाद्य असुरक्षा पहले से मौजूद है। ऐसे में इसका सबसे अधिक असर उन समुदायों पर पड़ेगा जिनकी अनुकूलन क्षमता सीमित है।
उन्होंने कहा कि कम और मध्यम आय वाले देशों में कृषि पर पड़ने वाले सूखे के 80 प्रतिशत से अधिक प्रभाव दर्ज किए जाते हैं। कई किसानों के लिए पहले फसल का नुकसान होता है और उसके बाद पशुधन भी प्रभावित होता है, जिससे उनकी पूरी आजीविका खतरे में पड़ जाती है।
दक्षिणी अफ्रीका में गंभीर संकट की आशंका
दक्षिणी अफ्रीका में पिछले अल नीनो चक्र ने एक सदी से अधिक समय का सबसे भीषण सूखा पैदा किया था। इससे 6.1 करोड़ लोग सहायता पर निर्भर हो गए थे और 80 लाख से अधिक लोग खाद्य असुरक्षा की चपेट में आ गए थे।
FAO के आकलन के अनुसार नामीबिया और बोत्सवाना के बड़े हिस्सों में कृषि सूखे की संभावना 50 प्रतिशत से अधिक है। यह खतरा अंगोला, जाम्बिया, जिम्बाब्वे, दक्षिण अफ्रीका, मोजाम्बिक और मेडागास्कर तक फैला हुआ है।
मध्य अमेरिका और कैरेबियाई क्षेत्र
मध्य अमेरिका के ड्राई कॉरिडोर और कैरेबियाई देशों में भी जोखिम काफी अधिक है। 2015-16 के अल नीनो के दौरान इस क्षेत्र में 35 लाख लोग खाद्य असुरक्षा का शिकार हुए थे। हैती में फसल उत्पादन 70 प्रतिशत तक गिर गया था, जिससे कुछ ही महीनों में खाद्य संकट दोगुना हो गया।
वर्तमान पूर्वानुमानों के अनुसार इस क्षेत्र में सामान्य से कम वर्षा होने की संभावना 70 प्रतिशत तक है।
20.2 करोड़ डॉलर की अपील
बढ़ते खतरे को देखते हुए FAO और विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) ने संयुक्त रूप से 20.2 करोड़ डॉलर की अग्रिम कार्रवाई अपील शुरू की है। इसका उद्देश्य 22 उच्च जोखिम वाले देशों में 88 लाख लोगों को संभावित अल नीनो प्रभावों से बचाना है।
इस पहल के तहत किसानों और पशुपालकों को सहायता, अग्रिम नकद सहायता, सूखा-सहिष्णु बीज, पशु चारा, जल संरक्षण उपाय और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करने जैसे कदम उठाए जाएंगे।
समय रहते कार्रवाई जरूरी
FAO का कहना है कि यदि जोखिम वाले क्षेत्रों की समय रहते पहचान कर ली जाए तो किसान बुवाई में बदलाव, सूखा-सहिष्णु फसलों का चयन, पशुओं के लिए चारे का भंडारण और अतिरिक्त जल स्रोतों की व्यवस्था जैसे महत्वपूर्ण निर्णय ले सकते हैं। FAO के प्राकृतिक संसाधन अधिकारी रिक्कार्डो सोल्डान के अनुसार, इस तरह के विस्तृत मानचित्र सरकारों को संसाधनों को अधिक प्रभावी ढंग से लक्षित करने में मदद करेंगे, ताकि सबसे अधिक जोखिम वाले क्षेत्रों को प्राथमिकता के आधार पर सहायता उपलब्ध कराई जा सके।

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