उर्वरक उपलब्धता संकट के समय किसानों का सहारा बन सकते हैं एफओएम और एलएफओएम
वैश्विक स्तर पर उर्वरकों की आपूर्ति में आ रही बाधाओं के बीच फरमेंटेड ऑर्गेनिक मैन्योर (एफओएम) और लिक्विड फरमेंटेड ऑर्गेनिक मैन्योर (एलएफओएम) किसानों के लिए रासायनिक उर्वरकों का टिकाऊ और किफायती विकल्प बनकर उभर रहे हैं। जैविक कचरे को पोषक तत्वों से भरपूर खाद में बदलकर ये मिट्टी का स्वास्थ्य सुधारते हैं, आयातित उर्वरकों पर निर्भरता घटाते हैं, सर्कुलर इकोनॉमी को मजबूत करते हैं और संकट के समय कृषि का लचीलापन बढ़ाते हैं।
संकट के समय कृषि की मजबूती केवल ऊर्जा सुरक्षा पर नहीं, बल्कि पोषक तत्वों की स्थिर और टिकाऊ उपलब्धता पर भी निर्भर करती है। जब भी कृषि में लचीलेपन की चर्चा होती है, तो आमतौर पर ऊर्जा सबसे प्रमुख विषय होती है। ईंधन की उपलब्धता, लॉजिस्टिक्स की निरंतरता और आपूर्ति की स्थिरता पर सबसे अधिक ध्यान दिया जाता है। लेकिन संकट कभी भी केवल एक हिस्से को प्रभावित नहीं करते। वे पूरी मूल्य श्रृंखला की कमजोरियों को उजागर करते हैं।
कृषि क्षेत्र में ऐसे संकटों के दौरान सबसे कम चर्चित कमजोरियों में से एक उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भरता है। भारत का कृषि तंत्र अब भी वैश्विक आपूर्ति झटकों, आयात पर निर्भरता और रासायनिक उर्वरकों की कीमतों में अस्थिरता के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। जब आपूर्ति श्रृंखला बाधित होती है, तो इसका असर तुरंत किसानों पर दिखाई देता है। उन्हें बढ़ती लागत, उर्वरकों की देर से उपलब्धता और ऐसे कठिन निर्णयों का सामना करना पड़ता है, जो फसल उत्पादकता और मिट्टी के स्वास्थ्य दोनों को प्रभावित कर सकते हैं।
इसी कारण अब चर्चा को केवल ऊर्जा तक सीमित रखने के बजाय फरमेंटेड ऑर्गेनिक मैन्योर (एफओएम) और लिक्विड फरमेंटेड ऑर्गेनिक मैन्योर (एलएफओएम) जैसे विकल्पों की ओर बढ़ाने की आवश्यकता है। ऐसे समय में जब रासायनिक उर्वरकों की उपलब्धता दबाव में है, ये जैविक पोषक तत्व आधारित समाधान अधिक स्थिर और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल विकल्प प्रदान करते हैं। पारंपरिक उर्वरकों की आपूर्ति बाधित होने पर भी ये पोषक तत्वों की उपलब्धता सुनिश्चित करते हैं, आयातित रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करते हैं और अधिक आत्मनिर्भर कृषि व्यवस्था को बढ़ावा देते हैं।
एफओएम और एलएफओएम का महत्व केवल रासायनिक उर्वरकों के विकल्प के रूप में नहीं है। इनकी वास्तविक उपयोगिता मिट्टी और कृषि की दीर्घकालिक अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले सकारात्मक प्रभाव में निहित है। जैविक पोषक तत्व मिट्टी के स्वास्थ्य, ऑर्गेनिक कार्बन और दीर्घकालिक उत्पादकता को बेहतर बनाने में मदद करते हैं। इससे उस समस्या का समाधान हो सकता है, जिसे लंबे समय से रासायनिक उर्वरकों पर आधारित खेती ने और गंभीर बना दिया है। किसानों के लिए इसका अर्थ है कि उन्हें ऐसा उर्वरक उपलब्ध होता है जो टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देता है। एफओएम और एलएफओएम का उपयोग करने वाले महाराष्ट्र के एक किसान का दावा है कि उनकी मिट्टी में पोषक तत्वों की मात्रा आसपास के अन्य खेतों की तुलना में 40 प्रतिशत अधिक है।
आज के समय में यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि कृषि की मजबूती का आकलन केवल अल्पकालिक फसल उत्पादन से नहीं किया जा सकता। इसे इस आधार पर भी मापा जाना चाहिए कि किसान मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने, कृषि निवेश पर निर्भरता कम करने और बाजार में तनाव के दौर में भी उत्पादन जारी रखने में कितने सक्षम हैं।
एफओएम और एलएफओएम इसी लचीलेपन को मजबूत करते हैं क्योंकि ये कचरे को उपयोगी संसाधन में बदलने की क्षमता प्रदान करते हैं। सीमित संसाधनों वाले माहौल में इसका महत्व और बढ़ जाता है। जैविक कचरे को उपयोगी कृषि इनपुट में बदलना सर्कुलर इकोनॉमी को मजबूत करता है, अपशिष्ट को कम करता है और ग्रामीण तथा औद्योगिक सतत विकास का एक अधिक एकीकृत मॉडल तैयार करता है। यह दृष्टिकोण कचरे को अंतिम उत्पाद मानने के बजाय उसे एक ऐसे संसाधन के रूप में देखता है, जिसे दोबारा उत्पादन चक्र में शामिल किया जा सकता है।
अब कई एकीकृत कंपनियां अपशिष्ट प्रबंधन, संसाधन पुनर्प्राप्ति और कृषि उत्पादकता को एक ही प्रणाली से जोड़कर इस बदलाव को गति दे रही हैं। रेफेक्स ग्रुप जैसी कंपनियां जैविक कचरे को एफओएम और एलएफओएम जैसे उत्पादों में बदलकर कृषि के लिए अधिक टिकाऊ पोषक तत्व आपूर्ति श्रृंखला तैयार करने में योगदान दे रही हैं। पर्यावरण प्रबंधन को खेत स्तर के उपयोग से जोड़ने वाला यह मॉडल सर्कुलर इकोनॉमी के साथ-साथ कृषि की दीर्घकालिक मजबूती को भी समर्थन देता है।
एफओएम और एलएफओएम का महत्व केवल खेती तक सीमित नहीं है। यह टिकाऊ विकास, आयात पर निर्भरता कम करने और अधिक मजबूत घरेलू प्रणालियों जैसे व्यापक राष्ट्रीय लक्ष्यों से भी सीधे जुड़ा हुआ है।
कृषि में संसाधनों के पुनः उपयोग के महत्व पर टिप्पणी करते हुए रेफेक्स रिन्यूएबल्स एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड के सीईओ कल्पेश कुमार ने कहा, “कृषि में स्थिरता का अगला चरण केवल इस बात से तय नहीं होगा कि हम कितना उत्पादन करते हैं, बल्कि इस बात से तय होगा कि उपलब्ध संसाधनों का हम कितनी कुशलता से उपयोग करते हैं। कचरे को उपयोगी संसाधनों में बदलना लीनियर खपत से सर्कुलर इकोनॉमी की ओर सोच में बदलाव का प्रतीक है और यह बदलाव कृषि अर्थव्यवस्था तथा दीर्घकालिक लचीलेपन दोनों को मजबूत करने की क्षमता रखता है।”
भारत के लिए इसका रणनीतिक महत्व भी है। यदि देश दीर्घकालिक खाद्य और कृषि सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहता है, तो कृषि आवश्यक पोषक तत्वों के लिए बाहरी अनिश्चितताओं पर निर्भर नहीं रह सकती। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध, टिकाऊ पोषक तत्व आधारित विकल्प इस समस्या का समाधान बन सकते हैं। अब समय आ गया है कि भारत रासायनिक उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भरता कम करते हुए जैविक खाद जैसे स्थानीय विकल्पों को बढ़ावा दे।
किसानों के लिए भी इसका महत्व स्पष्ट है। ऐसे किफायती जैविक पोषक तत्व, जो मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार करें और आयातित रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटाएं, दीर्घकालिक कृषि उत्पादकता की मजबूत नींव तैयार करते हैं। संकट के समय इस प्रकार का सहयोग केवल उपयोगी नहीं, बल्कि आवश्यक बन जाता है।
संकट की तैयारी केवल बिजली, ईंधन या लॉजिस्टिक्स तक सीमित नहीं हो सकती। यह उन कृषि प्रणालियों की सुरक्षा से भी जुड़ी है, जो करोड़ों लोगों की आजीविका और देश की स्थिरता का आधार हैं। यदि उद्योग और संस्थान वास्तव में कृषि की मजबूती सुनिश्चित करना चाहते हैं, तो ऊर्जा के विकल्पों के साथ-साथ उन पोषक तत्वों पर भी ध्यान देना होगा, जो भारतीय कृषि को उत्पादक और टिकाऊ बनाए रखते हैं।
एफओएम और एलएफओएम इसी व्यापक समाधान का हिस्सा हैं। ये अनिश्चित परिस्थितियों में भी पोषक तत्वों की उपलब्धता सुनिश्चित करते हैं, आयातित रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करते हैं, मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार करते हैं, किसानों को अधिक टिकाऊ और किफायती विकल्प उपलब्ध कराते हैं और साथ ही कचरे को उपयोगी संसाधन में बदलकर सर्कुलर इकोनॉमी को भी मजबूत बनाते हैं।

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