डब्ल्यूटीओ का खाद्यान्नों की सरकारी खरीद को उत्पादन के 15 फीसदी तक सीमित करने का प्रस्ताव

नवंबर के अंत में विश्व व्यापार संगठन  (डब्ल्यूटीओ) की कृषि पर समझौते (एओए) को लेकर 12वीं मंत्रीस्तरीय सम्मेलन (एमसी 12) बैठक होने वाली है। एमसी12 के एजेंडा के दो प्रस्ताव देश के किसानों के लिए नुकसानदेह साबित हो सकते हैं। इसके एक एजेंडा प्रस्ताव में कहा गया है कि गरीबों के लिए सब्सिडी पर खाद्यान्न मुहैया कराने के लिए बनाये जाने वाले खाद्यान्नों के सार्वजनिक भंडार (पब्लिक स्टॉक होल्डिंग यानी पीएसएच) के लिए सरकारी खरीद के लिए कुल उत्पादन का 15 फीसदी की सीमा तय की जाए

डब्ल्यूटीओ  का खाद्यान्नों की सरकारी खरीद को उत्पादन के 15 फीसदी तक सीमित करने का प्रस्ताव

नवंबर के अंत में विश्व व्यापार संगठन  (डब्ल्यूटीओ) की कृषि पर समझौते (एओए) को लेकर 12वीं मंत्रीस्तरीय सम्मेलन (एमसी 12) बैठक होने वाली है। एमसी12 के एजेंडा के दो प्रस्ताव देश के किसानों के घातक साबित हो सकते हैं। इसके एक एजेंडा प्रस्ताव में कहा गया है कि गरीबों के लिए सब्सिडी पर खाद्यान्न मुहैया कराने के लिए और कम संसाधनों वाले किसानों की आजीविका सुरक्षा के लिए बनाये जाने वाले सार्वजनिक भंडार (पब्लिक स्टॉक होल्डिंग यानी पीएसएच) के लिए सरकारी खरीद को सीमित किया जाए। प्रस्ताव में यह सीमा कुल उत्पादन का 15 फीसदी तय करने की बात कही गई है। पहले से ही फसलों की उचित कीमतों के नहीं मिलने से परेशान और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर फसलों की खरीद की कानूनी गारंटी को लेकर पिछले करीब एक साल से आंदोलित किसानों के लिए यह एक मुश्किल भरी खबर है। वहीं डब्ल्यूटीओ की यह मंत्रीस्तरीय बैठक  सरकार के लिए भी मुश्किलें ले कर आ रही है क्योंकि वह इस मामले में किसी भी तरह की ढील देने की स्थिति में नहीं है।

डब्ल्यूटीओ  के 12वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (एमसी12) की बैठक 30 नवंबर से लेकर 3 दिसंबर  के दौरान  स्विटजरलैंड के जेनेवा में आयोजित की जाएगी । इस बैठक में आने वाले प्रस्तावों के बारे में बात करने पर जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज एंड प्लानिंग में प्रोफेसर डॉ. बिश्वजीत धर ने रूरल वॉयस को बताया कि  एमसी 12 से पहले की चर्चाओं से पता चल रहा है कि कृषि से जुड़े मुद्दों पर वार्ता समिति के चेयरमैन राजदूत ग्लोरिया अब्राहम पेराल्टा द्वारा मसौदे में शामिल दो प्रस्तावों को लेकर भारत के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। पहले प्रस्ताव में कहा गया है कि भारत जैसे विकासशील देश खाद्य सुरक्षा के उद्देश्य के लिए पब्लिक स्टॉक होल्डिंग के तहत पारंपरिक खाद्यान्न फसलों के उत्पादन के 15 फीसदी की सीमा तक ही सरकारी खरीद कर सकते हैं। जबकि दूसरा प्रस्ताव है कि जो देश खाद्य सुरक्षा के लिए पब्लिक स्टॉक होल्डिंग रखते हैं वह इसमें से खाद्यान्न का निर्यात नहीं कर सकते हैं। इन शर्तों का भारत पर प्रतिकूल असर हो सकता है।

उनका कहना है कि खाद्यान्नों की सरकारी खरीद की सीमा तय करने का भारत के मुख्य उद्देश्यों पर गंभीर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। सरकार घरेलू खाद्य सुरक्षा और संसाधनों की कमी और कम आय वर्ग वाले किसानों को आजीविका को समर्थन देने के उद्देश्य से खाद्यान्नों की सरकारी खरीद करती है। खाद्यान्नों की खरीद की सीमा की शर्त का सीधा अर्थ है इन उद्देश्यों पर प्रतिकूल असर पड़ना। साल 2019-20 में भारत में 11.84 करोड़ टन चावल का उत्पादन हुआ। जिसमें से सरकार ने 520 लाख टन की खरीद की। सरकार द्वारा डब्ल्यूटीओ में दी गई जानकारी मुताबिक उसने 334 लाख टन चावल राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून की जरूरत को पूरा करने के लिए जारी किया। इस तरह से देखा जाए तो गरीबों के लिए सब्सिडी पर 340 लाख टन से अधिक चावल की जरूरत है लेकिन डब्ल्यूटीओ के प्रस्ताव के तहत भारत को लेकर 180 लाख टन चावल की ही सरकारी खऱीद करनी चाहिए।

खाद्य मंत्रालय के आंकड़ों  मुताबिक सरकार ने  2020-21 में 598.7 लाख टन चावल की खरीद की थी। कृषि मंत्रालय के मुताबिक 2020-21 में देश का चावल का उत्पादन 12.22 करोड़ टन रहा था। इस पर डब्ल्यूटीओ के प्रस्ताव की 15 फीसदी की शर्त लागू होने का मतलब है केवल 183 लाख टन चावल की सरकारी खरीद होना।

खाद्य मंत्रालय के मुताबिक इस साल 2021-22 में सरकार  ने 433.44 लाख टन गेहूं की सरकारी खरीद की है । वहीं कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 2020-21 में देश में गेहूं का उत्पादन 10.95 करोड़ टन रहा। ऐसे में अगर कुल उत्पादन के 15 फीसदी की डब्ल्यूटीओ के प्रस्ताव की शर्त लागू होती है सरकार केवल 165 लाख टन गेहूं की ही सरकारी खरीद कर पाती। इस तरह की शर्त के साथ किसानों से उनके खाद्यान्न उत्पादन की एमएसपी पर खरीद कैसे संभव होगी। वहीं डब्ल्यूटीओ की शर्त के आधार पर तो देश में राशन के तहत वितरित किये जाने वाले खाद्यान्न की जरूरत के स्तर से भी कम है। इस तरह से यह प्रस्ताव पूरी तरह से अव्यवहारिक है और घरेलू किसानों के हितों खिलाफ है। लेकिन अब देखना अहम होगा कि सरकार इस मुद्दे पर डब्ल्यूटीओ में क्या रुख अपनाती है। 

वहीं दूसरे प्रस्ताव में भारत ने खुद अपने लिए मुसीबत खड़ी की है। डॉ. धर कहते हैं कि दूसरा प्रस्ताव जी-33, विकासशील देशों के समूह का है जिसमें भारत ने अतीत में एक प्रमुख भूमिका निभाई है। वह कहता है कि खाद्य सुरक्षा स्टॉक को बनाए रखने वाले देशों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इस स्टॉक का उपयोग निर्यात को बढ़ावा देने के लिए नहीं किया जाएगा। पिछले दो वर्षों से भारत से खाद्यान्न के निर्यात में वृद्धि हुई है। अगर एमसी12 के इस प्रस्ताव से प्रेरणा लेते हुए पीएसएच के संबंध में एक स्थायी समाधान खोजता है तो यह भारत के लिए एक गंभीर चुनौती खड़ी कर सकता है।