भू-आधार से आगे: क्या भारत का लैंड स्टैक किसान के लिए अधिक उपयोगी साबित हो सकता है?

भारत का लैंड स्टैक भू-आधार और इंटरऑपरेबल जीआईएस प्रणालियों के जरिए डिजिटाइज्ड भूमि रिकॉर्ड से आगे बढ़ रहा है। अगली चुनौती भूमि की डिजिटल पहचान को पानी, सिंचाई, बुनियादी ढांचे और ग्रामीण सेवाओं से जोड़ना है।

भू-आधार से आगे: क्या भारत का लैंड स्टैक किसान के लिए अधिक उपयोगी साबित हो सकता है?

जमीन सिर्फ एक बाउंड्री नहीं
किसान के लिए जमीन शायद ही सिर्फ नक्शे पर खींची गई एक सीमा होती है। यह मिट्टी, पानी, पहुंच, आजीविका और अक्सर परिवार की सबसे महत्वपूर्ण संपत्ति होती है। इसकी उत्पादकता कई चीजों पर निर्भर करती है। एक बोरवेल सिंचाई उपलब्ध करा सकता है। पास से कोई नहर गुजर सकती है। खेत तक जाने वाली सड़क बाजार तक पहुंच उपलब्ध कराती है। भंडारण का शेड उपज की सुरक्षा करता है। पंप, बिजली कनेक्शन या जल निकासी की नाली जमीन को उत्पादक बनाने के लिए जरूरी हो सकती है। फिर भी इन सभी चीजों से जुड़ी जानकारी अलग-अलग सरकारी कार्यालयों और अलग-अलग रिकॉर्ड में दर्ज होती है।

परस्पर निर्भरता की पुरानी समझ

भारत में जमीन, पानी और खाद्य उत्पादन के बीच संबंध कोई नई अवधारणा नहीं है। भगवद्गीता इस संबंध को सरलता से व्यक्त करती है:
अन्नाद् भवन्ति भूतानि पर्जन्याद् अन्न-सम्भवः
— भगवद्गीता, 3.14
“जीव-जगत भोजन पर निर्भर है और भोजन वर्षा तथा परस्पर जुड़े पारिस्थितिक तंत्रों से उत्पन्न होता है।”

भाषा प्राचीन है, लेकिन यह संबंध आज भी हर किसान के लिए परिचित है। जमीन को पानी, खाद्य उत्पादन और उसे बनाए रखने वाली व्यापक व्यवस्थाओं से अलग करके नहीं समझा जा सकता। भारत का उभरता हुआ लैंड स्टैक इस परस्पर निर्भरता को आधुनिक रूप में सामने लाने का अवसर देता है। इसकी शुरुआत उन जानकारियों को जोड़ने से हो सकती है, जो आज अलग-अलग सरकारी कार्यालयों और अलग-अलग रिकॉर्ड में मौजूद हैं।

हर भूखंड की डिजिटल पहचान

डिजिटल इंडिया लैंड रिकॉर्ड्स मॉडर्नाइजेशन प्रोग्राम (DILRMP) के तहत भारत ने भूमि रिकॉर्ड और भू-नक्शों को डिजिटल बनाने में काफी प्रगति की है। अब 2026-31 के लिए DILRMP 3.0 जीआईएस आधारित लैंड स्टैक की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसका उद्देश्य भूमि के नक्शों, स्वामित्व संबंधी जानकारी, पंजीकरण और जमीन से जुड़े अन्य रिकॉर्ड को एक ऐसे डिजिटल इकोसिस्टम में लाना है, जिसमें अलग-अलग प्रणालियां आपस में काम कर सकें।
इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यूनिक लैंड पार्सल आइडेंटिफिकेशन नंबर (ULPIN) है, जिसे आमतौर पर भू-आधार कहा जाता है। यह भौगोलिक स्थिति के आधार पर प्रत्येक भूखंड को 14 अंकों की एक विशिष्ट पहचान देता है। भूमि संसाधन विभाग के अनुसार, अगस्त 2026 तक 40 करोड़ से अधिक भूखंडों को ULPIN मिल चुका था।
यह एक महत्वपूर्ण आधार है। लेकिन इससे अगला सवाल भी उठता है। जब हम किसी जमीन की विश्वसनीय पहचान कर सकते हैं, तो यह पहचान किसान के लिए और कितनी उपयोगी बनाई जा सकती है?

जमीन अकेले काम नहीं करती

आइए उस किसान के बारे में सोचें जो आगामी फसल सीजन की तैयारी कर रहा है। खेत की कानूनी पहचान और उसकी सीमा जानना महत्वपूर्ण है। लेकिन किसान को यह जानने की भी जरूरत हो सकती है कि पानी के स्रोत की स्थिति क्या है, उस भूखंड के लिए कितनी सिंचाई उपलब्ध है, भूजल की स्थिति कैसी है अथवा आसपास का बुनियादी ढांचा काम कर रहा है या नहीं।
आज ऐसी जानकारी अलग-अलग विभागों और प्रणालियों से मिल सकती है। इसका समाधान यह नहीं होना चाहिए कि सारी जानकारी को एक विशाल सरकारी डेटाबेस में डाल दिया जाए। अलग-अलग एजेंसियों की अपनी जिम्मेदारियां होती हैं। भूमि अधिकारी, सिंचाई विभाग, बिजली कंपनियां, बैंक और स्थानीय प्रशासन को अपने रिकॉर्ड पर नियंत्रण छोड़ने की जरूरत नहीं है।
जरूरत इस बात की है कि जब कोई वैध कारण हो, तब ये प्रणालियां आपस में संवाद कर सकें। भू-आधार सिस्टम को बताता है कि हम किस जमीन की बात कर रहे हैं। अगली चुनौती यह है कि जहां उपयोगी हो, उस जमीन को उन प्रणालियों से जुड़ी विश्वसनीय जानकारी के साथ जोड़ा जाए, जो उसे उत्पादक बनाती हैं।

पानी बताता है कि कनेक्शन क्यों जरूरी है

पानी शायद इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है। किसान पानी को विभागीय सीमाओं के आधार पर नहीं देखता। बारिश, भूजल, तालाब, नहरें, जलग्रहण संरचनाएं और सिंचाई प्रणालियां अंततः एक ही खेत पर मिलती हैं। लेकिन इनसे जुड़ी जानकारी का एक जगह मिलना इतना आसान नहीं है।
-क्या हो अगर किसान किसी अधिकृत सेवा के माध्यम से अपनी जमीन और उसे पानी उपलब्ध कराने वाली प्रणालियों से जुड़ी प्रासंगिक जानकारी देख सके?
-क्या हो अगर कृषि ऋण का आकलन करने वाला बैंक किसान से बार-बार वही दस्तावेज हासिल करने को कहने के बजाय अधिकृत भूमि संबंधी जानकारी का सत्यापन कर सके?
-क्या हो अगर सूखे की योजना बनाते समय जमीन, जलग्रहण क्षेत्र (वाटरशेड) और पानी से जुड़ी जानकारी को एक साथ इस्तेमाल कर उन क्षेत्रों की पहचान की जा सके, जहां सबसे अधिक दबाव है?
-और बाढ़ के बाद क्या हो अगर प्रशासन तेजी से यह समझ सके कि कौन से कृषि भूखंड, पहुंच मार्ग और ग्रामीण परिसंपत्तियां प्रभावित हुई हैं?

सिस्टम को आपस में संवाद करना होगा

इन संभावनाओं के लिए केवल डिजिटलीकरण पर्याप्त नहीं है। इसके लिए इंटरऑपरेबिलिटी यानी अलग-अलग डिजिटल प्रणालियों की इस क्षमता की जरूरत है कि वे अपनी जिम्मेदारियों और नियंत्रण को बनाए रखते हुए उपयोगी जानकारी का आपस में आदान-प्रदान कर सकें।
इस दिशा में पहले से कुछ संकेत दिखाई दे रहे हैं। भूमि संसाधन विभाग ने अपने लैंड स्टैक विजन को औपचारिक ऋण तक आसान पहुंच से जोड़ा है। विभाग जलग्रहण विकास के लिए एकीकृत जीआईएस और मैनेजमेंट-इन्फॉर्मेशन सिस्टम की संभावनाओं पर भी विचार कर रहा है। विभाग ने टिकाऊ भूमि और जल प्रबंधन को कृषि उत्पादकता और ग्रामीण आजीविका के लिए महत्वपूर्ण बताया है। इसलिए अवसर किसान के लिए एक और नया पोर्टल बनाने का नहीं है। अवसर यह है कि मौजूदा प्रणालियों को अधिक प्रभावी तरीके से एक साथ काम करने योग्य बनाया जाए।

किसान को केंद्र में रखने की जरूरत

तकनीक अकेले भारत की ग्रामीण भूमि और जल संबंधी चुनौतियों का समाधान नहीं कर सकती। डिजिटल रिकॉर्ड गलत हो सकता है। किसी नक्शे में सुधार की जरूरत हो सकती है। कनेक्टिविटी अलग-अलग क्षेत्रों में अलग हो सकती है। किसानों के पास गलत जानकारी को चुनौती देने के स्पष्ट तरीके होने चाहिए। सेवाओं की पहुंच स्थानीय भाषाओं में होनी चाहिए और यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि हर किसान जटिल डिजिटल सेवा का इस्तेमाल करने में सहज है। डिजिटल प्रणालियों को प्रशासनिक बोझ कम करना चाहिए, न कि उसका और अधिक हिस्सा किसान पर डाल देना चाहिए।

यह मापना जरूरी है कि क्या आसान हुआ

लैंड स्टैक की सफलता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कितने रिकॉर्ड डिजिटल हुए या कितने भूखंडों को पहचान संख्या मिली।
-यह भी देखा जाना चाहिए कि विश्वसनीय जानकारी का इस्तेमाल करना कितना आसान हुआ।
-क्या किसान सरकारी कार्यालयों के कम चक्कर लगाकर कोई सेवा हासिल कर सकता है?
-क्या एक बार सत्यापित जानकारी को बार-बार जमा कराने के बजाय दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है?
-क्या स्थानीय परिस्थितियों की बेहतर समझ के आधार पर भूमि और जल संबंधी फैसले लिए जा सकते हैं?
-क्या सूखा, बाढ़ या बुनियादी ढांचे की खराबी से ग्रामीण आजीविका प्रभावित होने पर संस्थाएं तेजी से प्रतिक्रिया दे सकती हैं?
यही व्यावहारिक कसौटियां हैं।

बेहतर रिकॉर्ड से बेहतर ग्रामीण सेवाओं की ओर

भारत ने भूखंडों को एक स्थायी डिजिटल पहचान देकर पहले ही एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। अब इससे आगे बढ़ने का अवसर है। भू-आधार यह बता सकता है कि हम किस जमीन की बात कर रहे हैं। एक कनेक्टेड लैंड स्टैक यह समझने में मदद कर सकता है कि उस जमीन को उत्पादक बनाए रखने के लिए किन चीजों की जरूरत है। किसान के लिए यहीं से डिजिटल भूमि सुधार बेहतर रिकॉर्ड बनाने से आगे बढ़कर बेहतर ग्रामीण सेवाओं की दिशा में कदम रख सकता है।

अपूर्व पाठक न्यूजीलैंड में रहने वाले आर्किटेक्ट और डिजाइन-गवर्नेंस विशेषज्ञ हैं। उन्हें भारत, न्यूजीलैंड और खाड़ी देशों में काम करने का अनुभव है। वे पर्यावरण के लिए डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, फेडरेटेड गवर्नेंस, इंफ्रास्ट्रक्चर रेजिलिएंस और स्थायी परिसंपत्ति पहचान जैसे विषयों पर लिखते हैं। उनके लेख Indian Masterminds, Governance Now और Policy Circle में प्रकाशित हो चुके हैं।
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