राजस्थान: हनुमानगढ़ में एथेनॉल फैक्ट्री के खिलाफ आंदोलन जारी, एमओयू निरस्त करने और मुकदमे वापसी की मांग

राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले की टिब्बी तहसील में प्रस्तावित एथेनॉल फैक्ट्री के विरोध में किसानों का आंदोलन जारी है। संगरिया की धान मंडी में हुई किसान महापंचायत में साफ कहा गया कि जब तक सरकार और कंपनी के बीच हुआ एमओयू औपचारिक रूप से निरस्त नहीं होता और किसानों पर दर्ज मुकदमे वापस नहीं लिए जाते, आंदोलन जारी रहेगा।

राजस्थान: हनुमानगढ़ में एथेनॉल फैक्ट्री के खिलाफ आंदोलन जारी, एमओयू निरस्त करने और मुकदमे वापसी की मांग

राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले की टिब्बी तहसील के राठीखेड़ा गांव में प्रस्तावित एथेनॉल फैक्ट्री के खिलाफ उठा किसान आंदोलन थमने का नाम नहीं ले रहा है। बुधवार को जिले के संगरिया की धान मंडी में आयोजित किसान महापंचायत में किसानों ने दो टूक शब्दों में कहा कि जब तक एथेनॉल फैक्ट्री को लेकर सरकार और कंपनी के बीच हुआ एमओयू औपचारिक रूप से निरस्त नहीं किया जाता और आंदोलन के दौरान किसानों पर दर्ज मुकदमे वापस नहीं लिए जाते, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। किसानों ने 11 फरवरी 2025 को टिब्बी तहसील के तलवाड़ा झील गांव में अगली किसान पंचायत के आयोजन का एलान कर यह संकेत दे दिया है कि वे इस संघर्ष को अल्पकालिक दबाव नहीं, बल्कि दीर्घकालिक लड़ाई के रूप में देख रहे हैं।

संगरिया की नई धान मंडी में हुई इस महापंचायत में हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर जिलों के किसानों के साथ-साथ पंजाब और हरियाणा से आए किसानों की भी भागीदारी रही। पंजाब के किसान नेताओं ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि एथेनॉल फैक्ट्रियों को पहले विकास और रोजगार के रूप में पेश किया जाता है, लेकिन कुछ वर्षों में इसके दुष्परिणाम किसानों को जल संकट, प्रदूषण और भूमि की गिरती गुणवत्ता के रूप में झेलने पड़ते हैं।

महापंचायत की शुरुआत 7 जनवरी 1970 के किसान आंदोलन में शहीद हुए किसानों को श्रद्धांजलि अर्पित कर की गई। सभास्थल पर प्रतीकात्मक किसान शहीद स्मारक बनाया गया, जहां लगातार श्रद्धासुमन अर्पित किए जाते रहे। इस मौके पर ‘शहीद किसान अमर रहें’ और ‘शहीदों का बलिदान हर किसान याद रखेगा’ जैसे नारों ने यह स्पष्ट किया कि आंदोलन को केवल वर्तमान की चिंता नहीं, बल्कि ऐतिहासिक संघर्षों की निरंतरता के रूप में देखा जा रहा है।

इस मौके पर पूर्व माकपा विधायक बलवान पूनिया ने कहा कि यह प्रचार किया जा रहा है कि कंपनी फैक्ट्री लगाने के फैसले से पीछे हट गई है, लेकिन न तो सरकार और न ही प्रशासन ने अब तक एमओयू निरस्त करने को लेकर कोई लिखित आदेश जारी किया है। उन्होंने कहा कि किसान केवल लिखित फैसले पर ही भरोसा करेंगे।

भारतीय किसान यूनियन (एकता उगराहां) के अध्यक्ष जोगिंदर सिंह उगराहां ने कहा कि किसानों को सरकार के आश्वासनों पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि देश भर में किसान अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं और हर जगह किसानों के साथ अन्याय हो रहा है।

टिब्बी की ‘फैक्ट्री हटाओ, क्षेत्र बचाओ संघर्ष समिति’ के नेता महंगा सिंह सिद्धू ने कहा कि आंदोलन की केवल दो ही मांगें हैं—एमओयू का निरस्तीकरण और किसानों पर दर्ज मुकदमों की वापसी। उन्होंने स्पष्ट किया कि इन मांगों से कम कुछ भी स्वीकार नहीं किया जाएगा।

संघर्ष समिति के नेता मदन दुर्गेसर ने कहा कि यह लड़ाई आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए है और विकास के नाम पर जमीन, पानी और पर्यावरण को दांव पर नहीं लगाया जा सकता। भाना सिंह सिद्धू ने कहा कि फैक्ट्री से विकास होने के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन हमारे पानी, हवा और मिट्टी का क्या होगा।

माकपा नेताओं प्रो. ओम जांगू और मंगेज चौधरी ने कहा कि सरकार किसानों के धैर्य की परीक्षा ले रही है। माकपा नेता रामेश्वर वर्मा ने कहा कि अत्यधिक उपजाऊ भूमि पर यह फैक्ट्री किसी भी सूरत में नहीं लगने दी जाएगी। किसान नेता अभिमन्यु कोहाड़ और अशोक चौधरी ने भी आंदोलन को निर्णायक मोड़ तक ले जाने की बात कही।

इस बीच, जिला प्रशासन ने आंदोलन को शांत करने के लिए कई कदम उठाने की जानकारी दी है। प्रशासन के अनुसार संघर्ष समिति की मांगों को राज्य सरकार तक भेजा गया है और पांच सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया है। समिति के तकनीकी सदस्यों ने 4 जनवरी को संघर्ष समिति के प्रतिनिधियों से मुलाकात कर उनकी आशंकाओं पर चर्चा की और भूजल के नमूने भी एकत्र किए।

प्रशासन ने यह भी स्पष्ट किया कि आंदोलन के दौरान दर्ज मामलों की जांच सीआईडी-सीबी, जयपुर द्वारा की जा रही है और फिलहाल जिला पुलिस स्तर पर कोई जांच या कार्रवाई नहीं चल रही है। पूर्व में गिरफ्तार सभी व्यक्तियों को जमानत मिल चुकी है।

हालांकि प्रशासन के प्रयास अपनी जगह हैं, लेकिन किसानों का कहना है कि ये कदम आंदोलन को टालने या समय खींचने की रणनीति प्रतीत होते हैं। माकपा नेता रघुवीर वर्मा ने कहा कि यदि सरकार वास्तव में गंभीर है, तो एमओयू निरस्त करने और मुकदमे वापस लेने का लिखित आदेश जारी किया जाना चाहिए।

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