जीरा फसल को रोग से बचा रही है केले पौधे की तकनीक

सीआईएसएच लखनऊ की एक प्रयोगशाला मेंकेले के विल्ट रोग प्रबंधन के नमुने के लिए बनाई गई एक क्रॉप टेक्नीक आईसीएआर-फ्यूसिकॉन्ट राजस्थान के दूर दराज इलाको में जीरा मे विल्ट रोग के प्रभाव को कम करने के लिए प्रभावी है।

जीरा फसल को रोग से बचा रही है  केले  पौधे की तकनीक

लखनऊ

तकनीक की परिभाषा रिसर्च औऱ डवलपमेंट के इर्द गिर्द घूमती है इस तरह एक्सट्रोपोलेशन और सुधार करके लाभ के दायरे को बढ़ाया जा सकता है। सीआईएसएच लखनऊ स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आई सीएआर) की विशेष प्रयोगशाला है। जहा पर केले के विल्ट रोग प्रबंधन के नमुने के लिए बनाई गई  एक क्रॉप टेक्नीक आईसीएआर-फ्यूसिकॉन्ट के जरिए पाया गया कि यह तकनीक राजस्थान के दूर दराज इलाको में जीरा मे विल्ट रोग के प्रभाव को कम करने में काफी कारगर तकनीक है।

राजस्थान में हजारों लोग जीरे की खेती पर निर्भर हैं, जो कम लागत और उच्च रिटर्न उपज के साथ उगाई जाने वाली कम दिन  की फसल से अच्छा लाभ कमा लेते  है। क्योकि यह रेगिस्तानी इलाको में कम पानी में जीरा की फसल अ्च्छी उपज दे जाती है। मगर राजस्थान और गुजरात की  इस अहम फसल  जीरा केी खेती करने वाले  किसानों के  लिए विल्ट रोग  की गंभीर समस्या है जिसके हर साल किसानों का काफी नुकसान उठाना पड़ता है। 

सेंट्रल इंस्टीट्यूट फॉर सबट्रॉपिकल हॉर्टिकल्चर (सीआईएसएच) के निदेशक शैलेंद्र राजन के अनुसार, जीरा विल्ट रोग से किसानों को भारी आर्थिक नुकसान होता है,इस रोग के कारण  कई जगहों पर जीरा की पूरी फसल बरबाद हो  जाती है। 

उन्होंने कहा कि शोधकर्ताओं ने राजस्थान में यह परीक्षण करने के लिए क्षेत्र प्रयोग किए कि इस तकनीक क्या जोधपुर जिले में केले की फसल तकनीक फ्यूसिकॉन्ट  को जीरे के विल्ट रोग को नियंत्रित कर सकती है। इसके लिए वहा के कृषि वैज्ञानिकों ने नवंबर साल 2020 में बुवाई के समय फ्यूसिकॉन्ट को बीज उपचार औऱ इसके बाद सिंचाई के पानी में इसका इस्तेमाल किया औऱ  इसके बेहतर परिणाम मिले, जिसके बाद में अन्य संगठनों से जुड़े कृषि वैज्ञानिकों की रुचि जगाई।

जीरा भारतीय मसाला निर्यात का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। गुजरात और राजस्थान के विभिन्न हिस्सों में रेतीली मिट्टी पर विल्ट की समस्या मौजूद है। जैसे, शोधकर्ता और किसान लंबे समय से इस रोग के लिए एक प्रभावी नियंत्रण उपाय की खोज कर रहे थे लेकिन बहुत कम सफलता मिली है।

इस बीच, बाड़मेर जिले के राजस्थान के प्रमुख जीरा उत्पादक क्षेत्रों में से एक गुडमलानी में एक कार्यशाला भी आयोजित की गई, जिसमें किसानों को नई तकनीक से परिचित कराया गया। इस तकनीक के आविष्कारक डॉ दामोदरन और राजन ने भी उत्पादकों को संबोधित किया।

अजमेर स्थित नेशनल रिसर्च सेंटर फॉर सीड स्पाइसेस के अनुसार, इस तकनीक के जरिए कम कीटनाशकों इस्तेमाल से  कारण उच्च गुणवत्ता वाले हेल्दी जीरा के उत्पादन में सहायता मिलेगी ।फिलहाल अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीटनाशक मुक्त जीरे की काफी मांग है।अक्सर यूरोपीय और अमेरिकी बाजारों में कीटनाशक के उपयोग के कारण खेप को अस्वीकार कर दिया जा सकता है अगर भारत उच्चतम गुणवत्ता वाले जीरे का उत्पादन करता है। तो जीरा उत्पादन करने वाले किसानों को अच्छा लाभ कमा सकते है।

इस बीच, बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए खंडेलवाल जैव उर्वरक को प्रौद्योगिकी का लाइसेंस दिया गया है ताकि किसानों के एक बड़े समूह को लाभ हो सके।