उत्तराखंड में गांधी के रचनात्मक कार्यक्रम की वापसी क्यों जरूरी?

महात्मा गांधी का रचनात्मक कार्यक्रम केवल चरखा और खादी तक सीमित नहीं था, बल्कि ग्राम स्वराज, स्थानीय रोजगार, विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था और सामुदायिक भागीदारी की व्यापक अवधारणा पर आधारित था। उत्तराखंड के संदर्भ में गांधी के इसी विचार को समझने की जरूरत है। गांधी से हिमालय तक की यह यात्रा गांधी के रचनात्मक विचारों को उत्तराखंड की आज की वास्तविकताओं के अनुरूप नए रूप में गढ़ने की यात्रा हो सकती है।

उत्तराखंड में गांधी के रचनात्मक कार्यक्रम की वापसी क्यों जरूरी?

देश की आजादी के वक्त कौन बड़ा, कौन छोटा, इस बहस में अगर न भी जाएं, तो भी यह स्पष्ट है कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय आंदोलन के वैचारिक ध्वजवाहक तो निःसंदेह थे। पूरे राष्ट्रीय आंदोलन को अगर गहराई से देखा जाए, तो महात्मा गांधी ने रचनात्मक कार्यों के माध्यम से जनता को जागृत किया। उनका अहिंसा का सिद्धांत निहत्थे, गरीब और कुपोषित लोगों के लिए एक संबल बना और उन्होंने उस ताकतवर अंग्रेजी सत्ता को देश से जाने के लिए मजबूर कर दिया, जिसके राज में कहा जाता था कि उसके साम्राज्य में सूरज भी नहीं डूबता।

देश आजाद हुआ और पश्चिम से शिक्षा प्राप्त पंडित जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री बने। राष्ट्रीय आंदोलन में अपनी भूमिका निभाने वाले अनेक लोगों के सामने दो तरह के विकल्प थे। वे सरकार के आसपास रहकर, चुनाव लड़कर और विशाल लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बनकर देश की सेवा कर सकते थे, या महात्मा गांधी के साथ गांवों में जाकर रचनात्मक कार्य करते हुए देश सेवा कर सकते थे।

निःसंदेह, तब तक अधिकांश भारतीयों को सत्ता के स्वाद का पता भी नहीं था और महात्मा गांधी का करिश्मा भी इतना अधिक था कि सत्ता-सुख की इच्छा रखते हुए भी अनेक लोग गांधी मार्ग पर चले गए।

गांधी के बाद भुला दिए गए सर्वोदय कार्यकर्ता

बदकिस्मती से, देश की आजादी के मात्र छह महीने के भीतर, 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई। देश पूरी तरह नेहरुमय हो गया। जो लोग गांधी मार्ग पर गए थे, उनका कोई संरक्षक दिल्ली, अर्थात सत्ता के केंद्र में, नहीं बचा। हालांकि, बीच-बीच में आचार्य कृपलानी, जे. सी. कुमारप्पा और विनोबा भावे ने गांधी दर्शन को जीवित रखने के लिए केंद्रीय सत्ता का दरवाजा खटखटाया, लेकिन उस वक्त की प्राथमिकताएं कुछ और थीं।

देश को ऊर्जा, भोजन, दवाई, उच्च शिक्षा, रोजगार आदि की व्यवस्था करनी थी। सरकार बड़े बांध, बड़ी सड़कें, नहरें, आईआईटी और आईआईएम बनाने में व्यस्त हो गई। गांधी मार्ग पर गए सर्वोदय के कार्यकर्ता लगभग भुला दिए गए।

लेकिन चीन के साथ युद्ध के बाद, नेहरू जी के स्वास्थ्य के कमजोर रहने के दौरान और फिर उनकी मृत्यु के पश्चात सर्वोदय कार्यकर्ताओं ने फिर से सिर उठाना शुरू किया। सन् 1961 में उत्तराखंड में सर्वोदय समूह का उदय हुआ। इस समूह ने लोगों को प्राकृतिक संसाधनों पर उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया और सरकारी नीतियों के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन शुरू हुए। पर्वतीय क्षेत्र के लोगों में भारत सरकार और उसकी नीतियों के प्रति असंतोष स्पष्ट रूप से उभरने लगा।

संस्थाएं मजबूत हुईं, विचार कमजोर पड़ने लगा

समय के साथ सर्वोदय संस्थाएं मजबूत होने लगीं और इनमें से बहुत-सी सर्वशक्तिमान गैर-सरकारी संस्थाओं में परिवर्तित हो गईं। कुछ संस्थाओं का नाम और कागजी काम तो गांधीवादी-सर्वोदय रहा, लेकिन अंदर से उनके भीतर गांधी सिद्धांतों के विपरीत जातिवाद, साम्प्रदायिकता, हिंसा और पूंजीवाद का भाव आने लगा। अगर पहली पीढ़ी के कार्यकर्ताओं में यह भाव नहीं भी आया, तो निःसंदेह उनकी दूसरी पीढ़ी, जो इन्हीं गांधीवादी आश्रमों और संस्थाओं में पली-बढ़ी थी, वह भी साम्प्रदायिक और जातिवादी हो गई।

यह कुछ-कुछ उसी प्रकार हुआ, जैसे कम्युनिस्ट पार्टियों के नेताओं ने अपने बच्चों को सस्ती फीस और छात्रवृत्ति के तहत सोवियत रूस में डॉक्टर बनने के लिए भेजा था, लेकिन उनमें से अनेक आज भाजपा और आरएसएस के साथ खड़े दिखाई देते हैं। और अगर वे भाजपा-आरएसएस के साथ नहीं भी खड़े हैं, तो कम से कम वामपंथियों के साथ और उनके पक्ष में तो खड़े नहीं हैं। अगर ऐसा न होता, तो आज पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में वामपंथियों की स्थिति इतनी कमजोर नहीं होती।

स्पष्ट रहे कि दक्षिणपंथी विचारधारा दीमक की तरह बड़ी-बड़ी संस्थाओं पर कब्जा करके उन्हें और उनके मूल विचार को नष्ट कर चुकी है या कर रही है। आर्य समाज और कुछ सर्वोदय संगठन इसके उदाहरण हैं।

उत्तराखंड आंदोलन और गांधीवादी विकास मॉडल

इसी पृष्ठभूमि में उत्तराखंड के आंदोलन को देखना चाहिए। उत्तराखंड राज्य का आंदोलन निश्चित तौर पर केवल एक छोटी प्रशासनिक इकाई बनाने का आंदोलन नहीं था। यह केंद्रीकृत विकास के मॉडल के खिलाफ स्थानीय, जैविक और विकेंद्रीकृत विकास मॉडल के लिए किया गया आंदोलन था, जिसकी आधारशिला गांधीवादी सर्वोदय विकास मॉडल में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

लेकिन 43 शहादतों से प्राप्त राज्य में पुनः वही केंद्रीकृत विकास का मॉडल थोप दिया गया, जिसके कारण पहाड़ का बड़ा हिस्सा आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पलायन, पानी और बिजली जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए तड़प रहा है। दूसरी तरफ, राज्य का बड़ा हिस्सा धन और संसाधनों को कुछ शहरों में केंद्रित करता जा रहा है।

गांधी का रचनात्मक कार्यक्रम और उत्तराखंड

तो फिर विकल्प क्या है? इसका उत्तर गांधी के रचनात्मक कार्यक्रम में मिलता है। गांधीजी का रचनात्मक कार्यक्रम (Constructive Programme) मूलतः यह विचार देता है कि समाज परिवर्तन केवल सरकार बदलने या आंदोलन करने से नहीं, बल्कि गांव, समुदाय और व्यक्ति के स्तर पर रचनात्मक काम खड़ा करने से होता है।

गांधीजी ने अपने रचनात्मक कार्यक्रम में साम्प्रदायिक एकता, अस्पृश्यता उन्मूलन, नशामुक्ति, खादी, ग्रामोद्योग, स्वच्छता, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, स्वास्थ्य, किसान, श्रमिक, आदिवासी और आर्थिक समानता जैसे विषयों को शामिल किया था।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि गांधी के लिए खादी का मतलब केवल खादी का वस्त्र नहीं था। खादी मूलतः उत्पादन प्रक्रिया के विकेंद्रीकरण, स्थानीय रोजगार और जीवन के लिए आवश्यक सेवाओं एवं वस्तुओं के न्यायपूर्ण वितरण का विचार था।

गांधीवादी मूल विचार में यह स्पष्ट है कि प्रत्येक गांव अपनी आवश्यकताओं के लिए उत्पादन करे और कुछ अतिरिक्त उत्पादन शहरी जरूरतों के लिए भी करे, ताकि उस उत्पादन से प्राप्त आय से गांव के लिए कुछ आवश्यक शहरी सुविधाएं जुटाई जा सकें।

यानी गांधी का सपना केवल चरखा चलाने का नहीं था। वह आत्मनिर्भर गांव, स्थानीय अर्थव्यवस्था, विकेंद्रीकृत उत्पादन, समान वितरण और सम्मानजनक जीवन की व्यवस्था बनाने का सपना था।

उत्तराखंड में आज का गांधीवादी रचनात्मक कार्यक्रम

आज उत्तराखंड के संदर्भ में गांधी के इसी रचनात्मक कार्यक्रम को नए सिरे से समझने और लागू करने की जरूरत है। हिमालय की परिस्थितियां मैदानी भारत से अलग हैं। यहां जल, जंगल, जमीन, खेती, पशुपालन, वन-आधारित आजीविका, स्थानीय कारीगरी, महिला श्रम और सामुदायिक संसाधन केवल अर्थव्यवस्था के साधन नहीं हैं, बल्कि पहाड़ के जीवन और संस्कृति के आधार हैं।

इसलिए आज उत्तराखंड में गांधीवादी रचनात्मक कार्यक्रम का अर्थ हो सकता है—ग्राम स्वराज, स्थानीय रोजगार, जल स्रोतों का संरक्षण, जंगल और जमीन पर समुदाय की भागीदारी, महिला शक्ति, नशामुक्ति, स्थानीय उत्पादन, जैविक खेती, छोटे ग्रामीण उद्योग और प्रकृति के साथ संतुलित विकास।

इसे ज्यों का त्यों दोहराने के बजाय ग्राम स्वराज, स्थानीय अर्थव्यवस्था और हिमालयी पर्यावरण के संदर्भ में नए रूप में समझने की आवश्यकता है। पहाड़ की अपनी भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियां हैं। इसलिए यहां रचनात्मक कार्यक्रम का केंद्र गांव, स्थानीय संसाधन, स्थानीय उत्पादन और समुदाय की भागीदारी होना चाहिए। इसके प्रमुख आयाम इस प्रकार हैं।

ग्राम स्वराज: सबसे पहले, ग्राम स्वराज को केवल पंचायत चुनाव या प्रशासनिक विकेंद्रीकरण तक सीमित नहीं रखा जा सकता। हर गांव को सरकारी योजनाओं का केवल लाभार्थी बनाने के बजाय उसे स्थानीय उत्पादन, रोजगार और निर्णय का केंद्र बनाना होगा। खेती, बागवानी, पशुपालन, हस्तशिल्प, स्थानीय खाद्य पदार्थ और छोटे ग्रामीण उद्यमों को आपस में जोड़कर परिवारों की आय बढ़ाई जा सकती है। इससे गांव केवल उपभोग की इकाई न रहकर आर्थिक गतिविधि की इकाई बन सकेगा।

खादी और ग्रामोद्योग: गांधीजी के खादी और ग्रामोद्योग के विचार को भी आज के समय में नए अर्थों में देखने की जरूरत है। उत्तराखंड में इसका विस्तार ऊन, हस्तशिल्प, मंडुवा, झंगोरा, दालों, फलों, मसालों, जड़ी-बूटियों, शहद और वन-आधारित उत्पादों तक किया जा सकता है। केवल उत्पादन पर्याप्त नहीं होगा। गांव या ब्लॉक स्तर पर प्रसंस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और विपणन की व्यवस्था भी विकसित करनी होगी। यही स्थानीय उत्पादन को स्थानीय रोजगार में बदलने का रास्ता है।

जल, जंगल और जमीन: उत्तराखंड में गांधीवादी रचनात्मक कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण आधार जल, जंगल और जमीन का सामुदायिक संरक्षण होना चाहिए। नौले-धारे, चाल-खाल, जल स्रोत, स्प्रिंगशेड, जंगल और चरागाह केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं हैं, बल्कि पहाड़ की अर्थव्यवस्था और जीवन के आधार हैं। इनके संरक्षण को कृषि, पशुपालन और स्थानीय रोजगार से जोड़ना होगा। संरक्षण और आजीविका को अलग-अलग देखने के बजाय दोनों को एक-दूसरे का पूरक बनाना होगा।

महिला शक्ति: इसी क्रम में महिला शक्ति को केंद्र में रखना आवश्यक है। उत्तराखंड के गांवों की अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भूमिका पहले से ही अत्यंत महत्वपूर्ण है। स्वयं सहायता समूहों को केवल बचत और ऋण तक सीमित रखने के बजाय उन्हें उत्पादन, प्रसंस्करण, विपणन और स्थानीय उद्यमों से जोड़ा जा सकता है। इससे महिलाएं सरकारी योजनाओं की लाभार्थी भर न रहकर स्थानीय अर्थव्यवस्था की निर्माता बन सकती हैं।

नशामुक्ति: गांधीजी के रचनात्मक कार्यक्रम में नशामुक्ति का विशेष स्थान था। आज उत्तराखंड में इसे युवाओं के भविष्य से जोड़ते हुए नए रूप में आगे बढ़ाने की जरूरत है। नशामुक्ति केवल शराब या अन्य नशे के विरुद्ध अभियान नहीं हो सकती। इसे खेल, संस्कृति, रचनात्मक गतिविधियों, परामर्श, परिवार और समुदाय की भागीदारी से जोड़कर स्वस्थ और संस्कारवान समाज के निर्माण का अभियान बनाया जाना चाहिए।

स्वच्छ और स्वस्थ गांव: इसी तरह स्वच्छ गांव और स्वस्थ गांव भी रचनात्मक कार्यक्रम का हिस्सा होना चाहिए। स्वच्छता, सुरक्षित पेयजल, कचरा प्रबंधन, पोषण, स्थानीय औषधीय पौधों और प्राथमिक स्वास्थ्य जागरूकता को सरकारी कार्यक्रमों के बजाय सामुदायिक जिम्मेदारी का विषय बनाया जा सकता है।

बुनियादी शिक्षा: गांधीजी की बुनियादी शिक्षा की अवधारणा को भी उत्तराखंड की परिस्थितियों में पुनर्जीवित किया जा सकता है। विद्यालय केवल परीक्षा और प्रमाणपत्र प्राप्त करने के केंद्र न रहें, बल्कि वे गांव और प्रकृति से जुड़ें। स्कूल गार्डन, स्थानीय जल स्रोत, जंगल, जैव विविधता, कृषि, हस्तशिल्प और स्थानीय ज्ञान को शिक्षा का हिस्सा बनाया जा सकता है। इससे शिक्षा और जीवन के बीच की दूरी कम होगी।

किसान: इसी प्रकार छोटे किसान को केवल उत्पादक मानने के बजाय ग्रामीण उद्यमी के रूप में देखने की जरूरत है। किसानों को एफपीओ, सहकारी संस्थाओं और सामूहिक विपणन से जोड़कर प्रसंस्करण, भंडारण और सीधे बाजार तक पहुंच की व्यवस्था विकसित की जा सकती है। इससे स्थानीय उत्पाद का अधिक मूल्य गांव में ही रह सकेगा।

युवाओं की भूमिका: इस पूरे प्रयास में युवाओं की भूमिका निर्णायक होगी। प्रत्येक गांव और विद्यालय में युवा स्वयंसेवकों की छोटी-छोटी टोलियां बनाई जा सकती हैं, जो जल स्रोतों की निगरानी, वृक्षारोपण, जैव विविधता संरक्षण, स्वच्छता, नशामुक्ति, डिजिटल साक्षरता और स्थानीय इतिहास-संस्कृति के संरक्षण जैसे कार्यों में भाग लें। इससे युवाओं का गांव से संबंध केवल रोजगार पाने या गांव छोड़कर जाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वे गांव के भविष्य के निर्माण में भागीदार बनेंगे।

सेवा से स्वराज, ग्राम स्वराज से हिमालयी स्वराज

लेकिन इन सभी प्रयासों का अंतिम उद्देश्य केवल कुछ योजनाएं चलाना नहीं होना चाहिए। आवश्यकता एक ऐसे व्यापक रचनात्मक अभियान की है, जिसमें स्वयंसेवक, महिलाएं, युवा, किसान, शिक्षक, पंचायतें, सामाजिक संस्थाएं और स्थानीय उद्यमी मिलकर काम करें। इसे "सेवा से स्वराज" के विचार से जोड़ा जा सकता है।

गांधीजी के रचनात्मक कार्यक्रम का मूल संदेश यही था कि समाज का परिवर्तन केवल सत्ता और कानून के माध्यम से नहीं होता। वह तब होता है, जब सामान्य नागरिक अपने गांव, अपने समाज और अपने पर्यावरण के निर्माण की जिम्मेदारी स्वयं उठाता है।

उत्तराखंड के संदर्भ में यही गांधीवादी विचार आज ग्राम स्वराज से हिमालयी स्वराज की दिशा में आगे बढ़ सकता है, जहां स्थानीय संसाधनों पर स्थानीय समुदाय की भागीदारी हो, स्थानीय उत्पादन से स्थानीय रोजगार पैदा हो, महिलाएं और युवा विकास के केंद्र में हों और विकास की प्रक्रिया प्रकृति के साथ संघर्ष करने के बजाय उसके साथ संतुलन बनाकर आगे बढ़े।

यही वह रास्ता है, जो उत्तराखंड को केवल एक प्रशासनिक राज्य से आगे बढ़ाकर एक आत्मनिर्भर, न्यायपूर्ण और पर्यावरणीय रूप से सुरक्षित हिमालयी समाज बनाने की दिशा में ले जा सकता है। गांधी से हिमालय तक की यह यात्रा अतीत को दोहराने की नहीं, बल्कि गांधी के रचनात्मक विचारों को उत्तराखंड की आज की वास्तविकताओं के अनुरूप नए रूप में गढ़ने की यात्रा हो सकती है।

(लेखक सामाजिक एवं पर्यावरण कार्यकर्ता तथा उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष हैं)

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