खाद्य तेलों का सस्ता आयात: खरीफ की कटाई और रबी बुवाई से पहले किसानों को झटका, कैसे आएगी आत्मनिर्भरता?

खाद्य तेलों के आयात पर शुल्क में कटौती ने देश के तिलहन किसानों के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। सरकार ने खरीफ तिलहन की नई फसल आने से पहले आयात शुल्क में कटौती कर दी है।

खाद्य तेलों का सस्ता आयात: खरीफ की कटाई और रबी बुवाई से पहले किसानों को झटका, कैसे आएगी आत्मनिर्भरता?

एक ओर सरकार खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता पर जोर दे रही है, जबकि दूसरी ओर आयात शुल्क में कटौती जैसे कदम उठाकर घरेलू बाजार में आयातित खाद्य तेलों की उपलब्धता बढ़ा रही है। ऐसे में देश के किसानों को तिलहन उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन कैसे मिलेगा

केंद्र सरकार ने 23 सितंबर को प्रमुख आयातित कच्चे खाद्य तेलों पर मूल सीमा शुल्क (BCD) में कटौती की है। कच्चे सूरजमुखी तेल पर मूल सीमा शुल्क 10 प्रतिशत से घटाकर शून्य कर दिया गया है। वहीं, कच्चे सोयाबीन तेल और कच्चे पाम तेल पर मूल सीमा शुल्क 10 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया गया है। यह शुल्क कटौती 24 सितंबर से लागू होगी।

सरकार ने इसी तरह रिफाइंड खाद्य तेलों पर मूल सीमा शुल्क में भी कमी की है। हालांकि, कच्चे और रिफाइंड खाद्य तेलों के बीच आयात शुल्क का अंतर 19.25 प्रतिशत बनाए रखा गया है। सरकार का तर्क है कि इससे घरेलू रिफाइनिंग उद्योग को संरक्षण मिलेगा और उपभोक्ताओं को अपेक्षाकृत सस्ता खाद्य तेल उपलब्ध कराया जा सकेगा।

उद्योग संगठन सॉल्वेंट एक्सट्रेक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) के कार्यकारी निदेशक डॉ. बी.वी. मेहता ने खाद्य तेलों पर आयात शुल्क घटाने के सरकार के फैसले को एक संतुलित कदम बताया, जिससे त्योहारी सीजन से पहले बढ़ती कीमतों से निपटने में मदद मिलेगी। 

लेकिन इसका किसानों पर क्या असर होगा, यह देखना भी जरूरी है। 

फैसले की टाइमिंग अहम

यह फैसला ऐसे समय लिया गया है, खरीफ तिलहन की आवक शुरू होने वाली है। सोयाबीन की शुरुआती फसल की कटाई शुरू हो चुकी है और अक्टूबर में नई फसल मंडियों में आनी शुरू हो जाएगी। मूंगफली की फसल भी जल्द बाजार में आ जाएगी। ऐसे में खाद्य तेलों के आयात को सस्ता करने का फैसला घरेलू तिलहन किसानों के लिए कीमतों के मोर्चे पर नई चुनौती खड़ी कर सकता है। इस फैसले से सरसों उगाने वाले किसानों को भी झटका लगा सकता है जो त्योहारी सीजन में बेहतर दाम मिलने के इंतजार में उपज को रोके हुए थे। रबी सीजन की शुरुआत से पहले कीमतों की स्थिति किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत होती है। उसी के आधार पर वे बुवाई का निर्णय लेते हैं। 

मध्यप्रदेश के किसान नेता केदार सिरोही ने रूरल वॉयस को बताया कि पिछले साल किसानों के विरोध-प्रदर्शन के बाद सरकार को खाद्य तेलों पर आयात शुल्क बढ़ाना पडा था। लेकिन इस साल नई उपज मंडियों में आने से पहले ही सरकार ने आयात शुल्क में भारी कटौती कर दी। यह किसानों के हितों पर बड़ी चोट है। देश के किसानों को दाम नहीं मिल रहा है और विश्व व्यापारियों के लिए भारत का बाजार खोल दिया गया है।   

इस साल सोयाबीन उत्पादक क्षेत्रों में मौसम की मार के चलते उपज खराब हुई है। सिरोही बताते हैं कि उत्पादन प्रभावित होने से मंडियों में सोयाबीन के दाम ऊंचे रहने की संभावना थी। लेकिन खाद्य तेलों पर आयात शुल्क में कटौती से घरेलू बाजार में दाम गिर सकते हैं। मध्यप्रदेश की मंडियों में पहले ही सोयाबीन की कीमतें 5000 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास हैं, जबकि केंद्र सरकार ने 2026-27 के लिए सोयाबीन का एमएसपी 5708 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। 

खाद्य तेलों का बढ़ता आयात

भारत अपनी खाद्य तेलों की लगभग दो-तिहाई मांग आयात से पूरी करता है। इसमें मुख्य रूप से पाम तेल, सोयाबीन तेल और सूरजमुखी तेल शामिल हैं। इनका आयात मुख्य रूप से मलेशिया, इंडोनेशिया, अर्जेंटीना, रूस और यूक्रेन से किया जाता है।

खाद्य तेलों के आयात पर निर्भरता घटाने की कोशिशों को इस साल बड़ा झटका लग सकता है। चालू तेल वर्ष 2025-26 में नवंबर से अगस्त तक पहले 10 महीनों में भारत का खाद्य तेल आयात करीब 4.6 प्रतिशत बढ़ा है। यह वृद्धि मुख्य रूप से पाम तेल और सोयाबीन तेल के आयात में बढ़ोतरी के कारण हुई।

सॉल्वेंट एक्सट्रेक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SEA) के आंकड़ों के मुताबिक, तेल वर्ष 2025-26 में नवंबर से अगस्त के दौरान भारत ने 136.20 लाख टन खाद्य तेल का आयात किया, जबकि पिछले वर्ष की समान अवधि में यह आयात 130.25 लाख टन था। कच्चे पाम तेल और RBD पामोलीन समेत पाम तेल का आयात इस अवधि में बढ़कर 65.34 लाख टन हो गया, जो पिछले वर्ष की समान अवधि में 61.47 लाख टन था।

चालू तेल वर्ष के पहले 10 महीनों में सोयाबीन तेल का आयात 44.64 लाख टन से बढ़कर 45.61 लाख टन और सूरजमुखी तेल का आयात 24 लाख टन से बढ़कर 25.15 लाख टन हो गया। इस तरह न केवल पाम तेल, बल्कि सोयाबीन और सूरजमुखी जैसे खाद्य तेलों का आयात भी बढ़ा है।

सोयाबीन तेल आयात रिकॉर्ड स्तर पर

चालू तेल वर्ष 2025-26 में भारत का सोयाबीन तेल आयात 58-60 लाख टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच सकता है। रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण सूरजमुखी तेल की आपूर्ति बाधाओं और पाम तेल की उपलब्धता में कमी के चलते सोयाबीन तेल भारतीय खरीदारों के लिए अपेक्षाकृत अधिक फायदेमंद हो गया है।

इंडोनेशिया में बायोडीजल उत्पादन के लिए पाम तेल की बढ़ती खपत से निर्यात के लिए इसकी उपलब्धता घट रही है। इससे पाम तेल की कीमतें बढ़ रही हैं जबकि सोयाबीन तेल अपेक्षाकृत सस्ता पड़ रहा है। सोयाबीन तेल के आयात में बढ़ोतरी के चलते 2025-26 में भारत का कुल खाद्य तेल आयात बढ़कर रिकॉर्ड 165-170 लाख टन पहुंच सकता है।

भारतीय किसानों के सामने पाम तेल का आयात ही अब एकमात्र चुनौती नहीं है। कुल खाद्य तेल आयात में पाम तेल की हिस्सेदारी लगातार दूसरे साल 50 प्रतिशत से नीचे रहने की संभावना है, जबकि सोयाबीन और सूरजमुखी जैसे सॉफ्ट ऑयल की हिस्सेदारी लगभग 52-53 प्रतिशत रहने का अनुमान है। जब विदेशी तेलों का आयात बढ़ेगा तो देश के किसानों को बेहतर दाम कैसे मिलेगा? 

तिलहन फसलों का रकबा घटा

सरकार ने खाद्य तेलों में आयात निर्भरता कम करने के लिए राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन जैसे कार्यक्रमों के जरिए घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया है। इन कोशिशों के बावजूद चालू खरीफ सीजन में देश में तिलहन फसलों का रकबा नहीं बढ़ पाया। तिलहन फसलों का रकबा लगभग पिछले साल के बराबर 194 लाख हेक्टेयर तक पहुंचा है, जबकि खरीफ सीजन के दौरान देश में तिलहन की बुवाई का सामान्य क्षेत्र 200 लाख हेक्टेयर है। अल नीनो से प्रभावित इस सीजन में देश का बड़ा हिस्सा बारिश की कमी से जूझ रहा है। 

एक ओर जहां सोयाबीन तेल का आयात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है, वहीं देश में सोयाबीन की बुवाई का रकबा सामान्य क्षेत्र 128 लाख हेक्टेयर से घटकर 122 लाख हेक्टेयर रह गया है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि जब तक खाद्य तेलों के सस्ते आयात को बढ़ावा देकर खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता कैसे हासिल की जा सकती है?

  

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