सेब किसानों पर दोहरी मार, न्यूजीलैंड FTA से पहले AIKS ने सरकार से हस्तक्षेप की मांग उठाई
सेब की गिरती कीमतों और आगामी व्यापार समझौतों के तहत आयात बढ़ने की आशंका के बीच AIKS ने केंद्र और तीन राज्यों से तत्काल बाजार हस्तक्षेप की मांग की है। संगठन ने 19 अक्टूबर को विरोध-प्रदर्शन का आह्वान किया है।
देश के प्रमुख सेब उत्पादक क्षेत्रों में किसानों को गिरती कीमतों और आगामी व्यापार समझौतों के तहत बढ़ते आयात की दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS) ने केंद्र सरकार के साथ जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की सरकारों से सेब उत्पादकों को राहत देने के लिए तत्काल बाजार हस्तक्षेप की मांग की है।
AIKS ने कहा है कि सेब की उपज बाजार में आने के समय किसानों को कीमतों में गिरावट की मार झेलनी पड़ रही है। संगठन ने 20 अक्टूबर 2026 से लागू होने वाले भारत-न्यूजीलैंड मुक्त व्यापार समझौते (FTA) से पहले सरकार से आवश्यक कदम उठाने की मांग की है। साथ ही, AIKS ने 19 अक्टूबर को देशभर में सेब किसानों के विरोध-प्रदर्शन का आह्वान किया है।
अखिल भारतीय किसान सभा के अध्यक्ष राजन क्षीरसागर ने कहा, “सरकार उन महीनों के लिए बाजार को आयात के लिए खोल रही है, जब किसान कोल्ड स्टोरेज में रखे अपने सेब बेचते हैं। छोटे किसानों के लिए न तो बाजार हस्तक्षेप योजना (MIS) है, न फसल बीमा और न ही पर्याप्त भंडारण की व्यवस्था। अगर 20 अक्टूबर से पहले बाजार हस्तक्षेप योजना की घोषणा नहीं की गई, तो पूरा सेब उत्पादक क्षेत्र सड़कों पर उतर आएगा।”
कश्मीर में सेब के दाम में तेज गिरावट
AIKS के मुताबिक, कश्मीर की मंडियों में 15-16 किलोग्राम के सेब के एक कार्टन की कीमत घटकर 700-1,000 रुपये रह गई है, जबकि कुछ सप्ताह पहले यही कार्टन 1,100-1,700 रुपये में बिक रहा था। इस तरह किसानों को लगभग 44-67 रुपये प्रति किलोग्राम का भाव मिल रहा है।
कश्मीर में सालाना करीब 21 लाख टन सेब का उत्पादन होता है, जो देश के कुल सेब उत्पादन का 70 प्रतिशत से अधिक है। लेकिन घाटी में नियंत्रित वातावरण (CA) भंडारण की क्षमता करीब 2.92 लाख टन है, जबकि जरूरत लगभग 6 लाख टन की है। इसके चलते छोटे किसानों को तुड़ाई के तुरंत बाद सेब बेचना पड़ता है।
कश्मीर में 2019 से NAFED द्वारा लागू बाजार हस्तक्षेप योजना (MIS) के तहत ए, बी और सी ग्रेड के सेब के लिए क्रमशः 60, 44 और 24 रुपये प्रति किलोग्राम की दरें थीं, लेकिन इस योजना को दोबारा शुरू नहीं किया गया है।
हिमाचल में भी मुश्किल में किसान
AIKS के अनुसार, हिमाचल प्रदेश के बागवानी विभाग ने इस वर्ष सेब की फसल करीब 2 करोड़ बॉक्स रहने का अनुमान लगाया है, जबकि पिछले वर्ष लगभग 3.5 करोड़ बॉक्स सेब का उत्पादन हुआ था। कमतर गुणवत्ता वाले या छंटाई के बाद बचे सेब के लिए समर्थन मूल्य केवल 12 रुपये प्रति किलोग्राम है और पिछले सीजन के MIS का भुगतान भी लंबित है।
फसल बीमा और मौसम की मार
अखिल भारतीय किसान सभा ने सेब उत्पादकों के लिए फसल बीमा की व्यवस्था पर भी सवाल उठाए हैं। संगठन के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर में फसल बीमा को 2016 में औपचारिक रूप से अपनाया गया था, लेकिन बागवानी फसलों के लिए इसे लागू नहीं किया जा सका। जून 2026 में बीमा कंपनियों द्वारा 30 प्रतिशत से अधिक प्रीमियम की मांग किए जाने के कारण टेंडर रद्द कर दिए गए।
इस साल अगस्त में ओलावृष्टि से कश्मीर घाटी के कई बाग प्रभावित हुए। पिछले साल श्रीनगर-जम्मू राजमार्ग तीन सप्ताह तक बंद रहने के कारण सेब के दाम करीब 40 प्रतिशत तक गिर गए थे और किसानों को लगभग 2,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था। AIKS का कहना है कि इसके बावजूद कोई मुआवजा पैकेज नहीं दिया गया।
न्यूजीलैंड, यूरोप और अमेरिका से आयात की चिंता
AIKS ने मुक्त व्यापार समझौतों के तहत सेब के आयात पर शुल्क में प्रस्तावित कटौती को लेकर भी चिंता जताई है। संगठन के अनुसार, भारत-न्यूजीलैंड FTA 20 अक्टूबर 2026 से लागू होने जा रहा है। इसके तहत न्यूजीलैंड के सेब पर आयात शुल्क 50 प्रतिशत से घटकर 25 प्रतिशत हो जाएगा। 32,500 टन के शुरुआती कोटे को बढ़ाकर 45,000 टन सालाना किया जाना है। आयात अप्रैल से अगस्त के बीच होगा, जिस समय भारतीय किसान भंडारित सेब बेचते हैं।
भारत-यूरोपीय संघ FTA के तहत यूरोपीय संघ के सेब पर शुल्क घटाकर 20 प्रतिशत किया जाएगा और 50,000 टन का शुरुआती कोटा बढ़कर 1 लाख टन तक पहुंच सकता है। फरवरी 2026 में अमेरिका के साथ हुए फ्रेमवर्क के तहत अमेरिकी सेब के लिए 25 प्रतिशत शुल्क पर आयात कोटा तय किया गया है और समझौते पर हस्ताक्षर की तैयारी चल रही है।
AIKS के मुताबिक, 80 रुपये प्रति किलोग्राम का न्यूनतम आयात मूल्य (MIP) भारतीय किसानों को पर्याप्त सुरक्षा नहीं देता है, क्योंकि भंडारण में रखे घरेलू सेब को बाजार में आयातित सेब से सीधी प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है। संगठन ने कहा कि 2023 में अमेरिकी सेब पर आयात शुल्क में ढील के बाद आयात 2022-23 के करीब 50,000 बॉक्स से बढ़कर 2024 के मध्य तक लगभग 22 लाख बॉक्स हो गया था।
प्रमुख मांगें
AIKS ने सरकार से तत्काल बाजार हस्तक्षेप योजना लागू करने की मांग की है। संगठन ने ए, बी और सी ग्रेड के सेब के लिए क्रमशः कम से कम 90, 65 और 50 रुपये प्रति किलोग्राम की दर तय करने की मांग की है। साथ ही, लंबित MIS भुगतान ब्याज सहित जारी करने और हिमाचल प्रदेश तथा उत्तराखंड को भी इस व्यवस्था में शामिल करने की मांग की गई है।
संगठन ने सेब के लिए लागत के C2 पर 50 प्रतिशत जोड़कर वैधानिक न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) तय करने, न्यूजीलैंड, यूरोपीय संघ और अमेरिका के साथ व्यापार समझौतों से सेब को बाहर रखने तथा आयात शुल्क बढ़ाकर 100 प्रतिशत करने की मांग की है।
इसके अलावा AIKS ने सार्वजनिक और सहकारी क्षेत्र में CA भंडारण क्षमता बढ़ाने, पूरी तरह सरकारी वित्त पोषित फसल बीमा योजना लागू करने, ओलावृष्टि से हुए नुकसान के लिए तत्काल राहत देने और सेब ढोने वाले ट्रकों की आवाजाही सुनिश्चित करने की मांग की है।
19 अक्टूबर को विरोध-प्रदर्शन का आह्वान
AIKS ने 19 अक्टूबर 2026 को, भारत-न्यूजीलैंड FTA लागू होने से एक दिन पहले, जिला और ब्लॉक मुख्यालयों पर प्रदर्शन करने तथा जिलाधिकारियों के माध्यम से प्रधानमंत्री को ज्ञापन भेजने की अपील की है। AIKS ने अन्य सेब उत्पादक संगठनों और किसान संगठनों से भी संयुक्त अभियान में शामिल होने का आह्वान किया है।

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