चीनी के खुदरा दाम नीचे आए, उद्योग ने कीमतों में अस्थायी उछाल से अत्यधिक मुनाफे से किया इनकार
त्योहारी सीजन से पहले चीनी के खुदरा दाम 11-12% घटे हैं। चीनी उद्योग के संगठन ISMA और NFCSF ने कीमतों में हालिया उछाल के दौरान मिलों को अत्यधिक मुनाफा होने से इनकार किया है। संगठनों के अनुसार, ऊंचे दाम पर सालाना खपत का केवल 2.5% से कम हिस्सा बिका, जबकि मौजूदा सीजन का औसत भाव बहुत कम है।
त्योहारी सीजन से पहले देशभर में चीनी के खुदरा दाम 11-12% घटे हैं। इस बीच चीनी उद्योग ने हाल में आई कीमतों की तेजी से मिलों को असामान्य लाभ होने की धारणा को खारिज किया है। इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) और नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्टरीज (NFCSF) ने कहा है कि कीमतों में तेजी बहुत कम समय के लिए रही और इस दौरान सालाना घरेलू बिक्री का छोटा हिस्सा ही ऊंचे दाम पर बिका।
दोनों संगठनों के अनुसार, अब देश में चीनी का खुदरा औसत मूल्य करीब 57.5 रुपये प्रति किलो रह गया है। 21 सितंबर को उत्तर प्रदेश में चीनी का भाव 55.09 रुपये, दिल्ली में 55 रुपये, महाराष्ट्र में 56.74 रुपये, कर्नाटक में 56.19 रुपये और तमिलनाडु में 57.45 रुपये प्रति किलो था।
संगठनों के अनुसार, एक्स-मिल स्तर पर कीमतों में ज्यादा तेज गिरावट आई है। देशभर में चीनी का औसत एक्स-मिल भाव फिलहाल करीब 4,450 रुपये प्रति क्विंटल है, जो हाल के उच्चतम स्तर से लगभग 30% कम है। उद्योग ने इस गिरावट को इस दावे के समर्थन में इस्तेमाल किया है कि कीमतों में अस्थायी तेजी से चीनी मिलों को बड़ा लाभ नहीं मिला।
उपभोक्ता मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 22 सितंबर को चीनी की औसत खुदरा कीमत 58.02 रुपये और 21 सितंबर को 58.14 रुपये प्रति किलो थी। एक माह पहले दाम 60.74 रुपये प्रति किलो थे। थोक भाव 22 सितंबर को 5309.78 रुपये, 21 सितंबर को 5324.23 रुपये और एक माह पहले 5617.53 रुपये प्रति क्विंटल थे। साल भर पहले थोक भाव 4316 रुपये प्रति क्विंटल और खुदरा भाव 46.48 रुपये प्रति किलो थे।
ISMA और NFCSF के मुताबिक, 17 से 31 अगस्त 2026 के बीच चीनी मिलों ने केवल 7.22 लाख टन (LMT) चीनी बेची, जिसका औसत एक्स-मिल भाव 4,996.98 रुपये प्रति क्विंटल रहा। देश की सालाना घरेलू चीनी खपत करीब 285 लाख टन है। इस लिहाज से उक्त अवधि में हुई बिक्री सालाना खपत के 2.5% से भी कम रही।
इसी आधार पर उद्योग संगठनों का कहना है कि देश की 97.5% से अधिक सालाना जरूरत सामान्य या अपेक्षाकृत कम कीमतों पर पूरी हुई। उनका तर्क है कि इससे यह धारणा खारिज होती है कि चीनी मिलों ने कीमतों में थोड़े समय के लिए आई तेजी से अत्यधिक मुनाफा कमाया।
हालांकि, उद्योग के अपने आंकड़े यह भी बताते हैं कि उस सीमित अवधि में चीनी की कीमत मौजूदा एक्स-मिल भाव से काफी अधिक थी। पूरे चीनी सीजन 2025-26 में सितंबर के मध्य तक देशभर में चीनी का औसत एक्स-मिल भाव केवल करीब 4,100 रुपये प्रति क्विंटल, यानी 41 रुपये प्रति किलो रहा है। ISMA और NFCSF का कहना है कि गन्ना के वैधानिक मूल्य और चीनी उत्पादन से जुड़ी कनवर्जन लागत को शामिल करें तो यह औसत भी उद्योग की कुल लागत से काफी कम है।
गन्ना किसानों को किए गए भुगतान के बारे में उद्योग का कहना है कि चीनी सीजन 2025-26 में मिलों ने अब तक किसानों को करीब 1.12 लाख करोड़ रुपये का भुगतान किया है, जो कुल देय गन्ना भुगतान का लगभग 97.5% है। वहीं, चीनी सीजन 2024-25 के लिए 99.5% से अधिक गन्ना बकाया चुका दिया गया है।
उद्योग संगठनों ने कहा कि त्योहारी सीजन से पहले खुदरा कीमतों में आई गिरावट उपभोक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण है और आने वाले सप्ताहों में कीमतों में और नरमी आ सकती है। इससे त्योहारी सीजन में चीनी और चीनी से बने उत्पादों की लागत को नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है।
दूसरी ओर, उद्योग ने यह भी स्पष्ट किया है कि बहुत कम कीमतें मिलों की तरलता को प्रभावित कर सकती हैं और इसका असर किसानों को समय पर गन्ना भुगतान की क्षमता पर पड़ सकता है। इस तरह उपभोक्ताओं के लिए सस्ती चीनी और मिलों की वित्तीय स्थिति के बीच संतुलन उद्योग के लिए प्रमुख मुद्दा बना हुआ है।
ISMA के महानिदेशक दीपक बल्लानी ने कहा, “खुदरा स्तर पर चीनी की कीमतों में 11-12% और एक्स-मिल स्तर पर उच्चतम स्तर से लगभग 30% की गिरावट त्योहारी सीजन से पहले उपभोक्ताओं के लिए एक स्वागतयोग्य है, और उद्योग ने इसमें सक्रिय रूप से सहयोग किया है। यह हाल में कीमतों में आई तेजी की वास्तविक स्थिति को भी स्पष्ट करता है। उस सीमित अवधि में मुश्किल से 7 लाख टन, यानी भारत की सालाना खपत के 2.5% से भी कम चीनी की बिक्री हुई, जबकि शेष 97.5% चीनी सामान्य या अपेक्षाकृत कम कीमतों पर उपलब्ध कराई गई है।
“वास्तव में, मौजूदा सीजन में अब तक करीब 41 रुपये प्रति किलो का औसत एक्स-मिल भाव, वैधानिक गन्ना मूल्य और प्रसंस्करण लागत को शामिल करने के बाद भी उत्पादन लागत से काफी नीचे है। उद्योग लगातार खाद्य महंगाई को स्थिर रखने में भूमिका निभाता रहा है और लंबे समय में चीनी की कीमतों में वृद्धि लगभग सभी अन्य प्रमुख खाद्य वस्तुओं की तुलना में कम रही है।
“त्योहारी सीजन की ओर बढ़ते हुए हमारी दोहरी प्रतिबद्धता है - उपभोक्ताओं को निर्बाध और किफायती आपूर्ति सुनिश्चित करना तथा मिलों को पर्याप्त और व्यवहार्य कीमत दिलाना, ताकि उनकी वित्तीय तरलता बनी रहे और देशभर के करोड़ों किसानों को गन्ने का भुगतान समय पर किया जा सके।”

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