गन्ना भाव 575 रुपये क्विंटल करने की मांग, केंद्र की समिति पर किसान सभा ने उठाए सवाल
अखिल भारतीय किसान सभा ने गन्ना मूल्य 575 रुपये प्रति क्विंटल करने और चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य 50 रुपये प्रति किलो तय करने की मांग की है। संगठन ने केंद्र सरकार की नई समिति पर सवाल उठाते हुए इसमें किसान संगठनों और गन्ना उत्पादक राज्यों को शामिल करने की मांग उठाई है।
अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS) ने गन्ने का न्यूनतम कानूनी मूल्य 575 रुपये प्रति क्विंटल करने और सभी खरीफ एवं रबी फसलों के लिए C2+50% के आधार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) घोषित करने की मांग की है। किसान संगठन ने गन्ने के मूल्य निर्धारण और चीनी की न्यूनतम बिक्री कीमत तय करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा गठित समिति पर भी सवाल उठाए हैं।
किसान सभा ने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि महाराष्ट्र और कर्नाटक के गन्ना उत्पादकों के एक महीने तक चले आंदोलन के दबाव में सरकार को समिति गठित करनी पड़ी है। संगठन ने दक्षिण महाराष्ट्र और उत्तर कर्नाटक के आंदोलनरत गन्ना किसानों तथा उनके नेताओं को बधाई देते हुए कहा कि यह फैसला सरकार की ओर से कोई उपहार नहीं, बल्कि किसानों के संघर्ष का परिणाम है।
केंद्र सरकार ने नीति आयोग के पूर्व सदस्य प्रो. रमेश चंद की अध्यक्षता में गन्ना किसानों की मांगों और चीनी के न्यूनतम बिक्री मूल्य पर विचार करने के लिए समिति गठित की है।
समिति पर उठाए सवाल
किसान सभा ने समिति के अध्यक्ष प्रो. रमेश चंद की नियुक्ति पर आपत्ति जताई है। संगठन का कहना है कि प्रो. चंद तीन विवादित कृषि कानूनों के प्रमुख पैरोकार रहे हैं। किसान सभा ने उनकी पिछली MSP समिति से जुड़ी भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि वह समिति किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी दिलाने में विफल रही थी।
संगठन के मुताबिक, समिति के अन्य तीन सदस्य नौकरशाह हैं। इसमें न तो किसान संगठनों को प्रतिनिधित्व दिया गया है और न ही गन्ना उत्पादक राज्यों की सरकारों को शामिल किया गया है।
किसान सभा ने समिति की कार्य-शर्तों पर भी आपत्ति जताई है। उसका कहना है कि किसानों को मिलने वाले मूल्य को चीनी मिलों की वित्तीय व्यवहार्यता से जोड़ने पर मिल मालिकों का प्रभाव बढ़ सकता है। संगठन ने मांग की है कि समिति की रिपोर्ट 30 दिनों के भीतर सार्वजनिक की जाए।
FRP के मुनाफे के आकलन पर सवाल
किसान सभा ने कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP) द्वारा गन्ने के उचित एवं लाभकारी मूल्य (FRP) के आकलन पर सवाल उठाए हैं। आयोग ने 2026-27 के लिए गन्ने का FRP 365 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया है और उत्पादन लागत के मुकाबले 100.5 प्रतिशत मुनाफे का दावा किया है।
किसान सभा के अनुसार, यह गणना 182 रुपये प्रति क्विंटल की A2+FL लागत के आधार पर की गई है। संगठन का कहना है कि आयोग द्वारा बताई गई 258 रुपये प्रति क्विंटल की C2 लागत के आधार पर मुनाफे का मार्जिन घटकर 41.5 प्रतिशत रह जाता है।
किसान सभा ने अपनी रिपोर्ट ‘द शुगरकेन प्राइस, डिकोडेड’ में गन्ने की लागत की गणना में दस खामियां होने का दावा किया है। संगठन के मुताबिक, इन खामियों को दूर करने पर C2 लागत लगभग 308 रुपये प्रति क्विंटल हो जाती है। इसमें 2011-12 के पुराने सूचकांक का इस्तेमाल और रेड रॉट रोग से उपज में हुई गिरावट को छिपाने के लिए औसत उत्पादकता का सहारा लेना जैसी विसंगतियां शामिल हैं।
इन्हीं आकलनों के आधार पर किसान सभा ने गन्ने का मूल्य कम से कम 575 रुपये प्रति क्विंटल तय करने की मांग की है। संगठन का कहना है कि किसी भी स्थिति में यह कीमत 550 रुपये प्रति क्विंटल से कम नहीं होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त, इथेनॉल और बिजली से होने वाली आय में किसानों को कम से कम 57 रुपये प्रति क्विंटल का अतिरिक्त हिस्सा मिलना चाहिए।
किसान सभा ने उत्तर प्रदेश और हरियाणा में घोषित राज्य परामर्शित मूल्य (SAP) को चीनी मिलों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ बताने संबंधी CACP के रुख की भी आलोचना की है।
चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य 50 रुपये किलो करने की मांग
किसान सभा ने चीनी के न्यूनतम बिक्री मूल्य में लंबे समय से बदलाव नहीं होने का मुद्दा भी उठाया है। संगठन के अनुसार, चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य 2019 से 31 रुपये प्रति किलो पर स्थिर है। मिलों की ओर से किसानों का भुगतान करने में असमर्थता के लिए इसी कीमत का हवाला दिया जाता है।
किसान सभा का दावा है कि देश की 60 से 65 प्रतिशत चीनी खरीदने वाली शीतल पेय और कन्फेक्शनरी कंपनियों को हर साल लगभग 15,000 करोड़ रुपये की अप्रत्यक्ष सब्सिडी का लाभ मिलता है। संगठन ने चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य बढ़ाकर कम से कम 50 रुपये प्रति किलो करने की मांग की है।
गेहूं और चने के MSP पर भी सवाल
किसान सभा ने गन्ने के अलावा अन्य फसलों के MSP निर्धारण में भी उत्पादन लागत का सही आकलन नहीं किए जाने का आरोप लगाया है। संगठन के अनुसार, रबी विपणन वर्ष 2027-28 के लिए CACP की अपनी C2 लागत गणना के आधार पर गेहूं का मूल्य 2,774 रुपये प्रति क्विंटल होना चाहिए, जबकि घोषित MSP 2,610 रुपये है। इसी तरह, चने का मूल्य 7,426 रुपये प्रति क्विंटल होना चाहिए, जबकि घोषित MSP 5,958 रुपये है।
संगठन का कहना है कि इनपुट मूल्य सूचकांक में 5.4 प्रतिशत की वृद्धि के बावजूद गेहूं की अनुमानित लागत में केवल 2 प्रतिशत की बढ़ोतरी दिखाई गई। किसान सभा ने गेहूं के MSP में केवल 25 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि को 17 वर्षों में सबसे कम बताया और सरकार के 106 प्रतिशत मुनाफे के दावे पर सवाल उठाए।
खरीफ फसलों के संबंध में भी किसान सभा ने CACP की लागत गणना को किसान-विरोधी बताया है। संगठन के मुताबिक, कपास और सोयाबीन जैसी फसलों के घोषित MSP और आयोग की C2 लागत के आधार पर उचित मूल्य के बीच बड़ा अंतर है।
राज्यों के लागत आकलन पर भी आपत्ति
किसान सभा ने कुछ राज्य सरकारों पर कृषि उत्पादन लागत का कम आकलन करके भेजने का आरोप लगाया है। उत्तर प्रदेश ने गन्ने की लागत की गणना के लिए 800 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की उत्पादकता मानी, जबकि वास्तविक उत्पादकता 563 क्विंटल बताई गई है। किसान सभा का दावा है कि अधिक उत्पादकता मानने से प्रति क्विंटल लागत कम दिखाई देती है। संगठन ने कहा कि महाराष्ट्र ने गन्ने की उत्पादन लागत का अनुमान ही नहीं भेजा।
धान के मामले में किसान सभा ने आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और असम ने CACP के अपने लागत अनुमानों से भी कम लागत बताई। वहीं, गेहूं की लागत के आकलन के लिए उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा की ओर से अनुमान नहीं भेजे जाने का दावा किया गया है।
रंगराजन फॉर्मूला लागू करने की मांग
किसान सभा ने गन्ना किसानों को चीनी उद्योग से होने वाली कुल आय में उचित हिस्सा दिलाने के लिए विस्तारित रंगराजन फॉर्मूला लागू करने की मांग की है। इसके तहत चीनी, इथेनॉल, बिजली और बायोगैस से प्राप्त मूल्य का 75 प्रतिशत उत्पादकों को देने की मांग की गई है।
संगठन ने गन्ने के FRP का बकाया 15 प्रतिशत ब्याज के साथ चुकाने, मशीनी कटाई के नाम पर किसानों से की जाने वाली कटौती बंद करने और किसानों की निगरानी में तौल तथा चीनी रिकवरी की जांच सुनिश्चित करने की मांग भी की है।
किसान सभा ने समिति से मिलने का समय मांगा है। संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि समिति का इस्तेमाल किसानों की मांगों पर निर्णय टालने के लिए किया गया, तो वह संयुक्त किसान मोर्चा और अन्य समान विचारधारा वाले संगठनों के साथ मिलकर चीनी मिलों, मंडियों और गांवों में आंदोलन तेज करेगी।

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