धान की सीधी बुवाई से उत्सर्जन में कमी, पानी की बचत और कार्बन क्रेडिट की संभावना, हिमाचल कृषि विश्वविद्यालय की स्टडी

हिमाचल प्रदेश में किए गए अध्ययन से पता चला है कि धान की सीधी बुवाई ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन को कम करने, पानी की बचत और मिट्टी के स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में मददगार हो सकती है। इस पद्धति में अच्छी उपज भी बरकरार रहती है और कार्बन क्रेडिट मिलने की अधिक संभावना है।

धान की सीधी बुवाई से उत्सर्जन में कमी, पानी की बचत और कार्बन क्रेडिट की संभावना, हिमाचल कृषि विश्वविद्यालय की स्टडी

हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय (CSKHPKV) के एक अध्ययन में सामने आया है कि धान की सीधी बुवाई की SAVA-134 FullPage® तकनीक धान उत्पादन को अधिक जल-कुशल और जलवायु-अनुकूल बनाने में मदद कर सकती है। अध्ययन के अनुसार, पारंपरिक रोपाई वाली धान प्रणाली की तुलना में इस तकनीक से मीथेन उत्सर्जन में करीब 90% तक कमी दर्ज की गई। इसके अलावा, इस प्रणाली में जल उत्पादकता सबसे अधिक रही, मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार देखा गया और कार्बन क्रेडिट हासिल करने की अधिक संभावना सामने आई। 

अध्ययन का शीर्षक “पॉपुलराइजेशन ऑफ डायरेक्ट-सीडेड राइस टेक्नोलॉजी फॉर क्लाइमेट चेंज अडैप्टेशन बाय रिड्यूसिंग जीएचजी एमिशंस एंड एक्वायरिंग कार्बन क्रेडिट” है। यह शोध हिमाचल प्रदेश के दो प्रमुख धान उत्पादक क्षेत्रों में किया गया। इसमें कई फसल मौसमों के दौरान पारंपरिक रोपाई वाली धान प्रणाली और सीधी बुवाई वाली धान प्रणाली की तुलना की गई। शोध में फसल उपज, पानी की खपत, ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन और मिट्टी के स्वास्थ्य समेत विभिन्न मानकों का आकलन किया गया।

शोध का नेतृत्व पालमपुर स्थित CSKHPKV के मृदा विज्ञान विभाग में सहायक मृदा रसायनज्ञ डॉ. धनबीर सिंह ने किया। अध्ययन में सवाना सीड्स का सहयोग रहा। शोध में शामिल सीधी बुवाई वाली विभिन्न तकनीकों में SAVA-134 FullPage® ने उत्पादकता, संसाधन दक्षता और पर्यावरणीय प्रदर्शन के बीच सबसे बेहतर संतुलन दिखाया। 

डॉ. सिंह ने कहा कि अध्ययन का उद्देश्य ऐसे व्यावहारिक समाधान तलाशना था, जो किसानों को पर्यावरणीय प्रभाव कम करते हुए उत्पादकता बढ़ाने में मदद कर सकें। उन्होंने कहा कि परिणाम बताते हैं कि धान की सीधी बुवाई अधिक जलवायु-अनुकूल और संसाधन-कुशल उत्पादन प्रणालियों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

मीथेन उत्सर्जन में करीब 90% कमी

अध्ययन की प्रमुख उपलब्धियों में से एक पारंपरिक रोपाई वाली धान प्रणाली की तुलना में मीथेन उत्सर्जन में करीब 90% की कमी है। कंपनी की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, सीधी बुवाई की तकनीकों में SAVA-134 FullPage® ने उत्पादकता, संसाधन दक्षता और पर्यावरणीय स्थिरता का सबसे बेहतर समग्र प्रदर्शन किया। इस प्रणाली ने अच्छी उपज बनाए रखते हुए कम संसाधनों का इस्तेमाल किया और कार्बन फुटप्रिंट को भी कम किया।

अध्ययन में यह भी पाया गया कि सीधी बुवाई प्रणाली में जल उत्पादकता सबसे अधिक रही। इससे उन क्षेत्रों में धान की खेती के लिए संभावनाएं बढ़ती हैं, जहां किसानों को पानी की बढ़ती कमी का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा, SAVA-134 FullPage® में कार्बन क्रेडिट हासिल करने की सबसे अधिक संभावना देखी गई। इस प्रणाली के तहत मिट्टी के स्वास्थ्य से जुड़े कई संकेतकों में भी सुधार दर्ज किया गया। इनमें मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ना, सूक्ष्मजीवी गतिविधि में वृद्धि, पानी धारण करने की क्षमता में सुधार और मिट्टी के संघनन में कमी शामिल हैं।

सार्वजनिक-निजी भागीदारी 

CSKHPKV पालमपुर के अनुसंधान निदेशक डॉ. विनोद शर्मा ने कहा कि यह शोध सार्वजनिक कृषि संस्थानों और निजी क्षेत्र के बीच सहयोग की उपयोगिता को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि यह अध्ययन जलवायु-लचीली और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को विकसित करने के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी का एक मजबूत उदाहरण है।

सवाना सीड्स के एमडी एवं सीईओ अजय राणा ने कहा कि किसानों पर एक ओर खाद्य उत्पादन बढ़ाने और दूसरी ओर कम संसाधनों के इस्तेमाल के साथ कृषि के पर्यावरणीय प्रभाव को घटाने की बढ़ती अपेक्षा है। उनके अनुसार, फसल आनुवंशिकी और उत्पादन पद्धतियों में नवाचार इन दोनों लक्ष्यों को हासिल करने में मदद कर सकता है।

सीधी बुवाई बन सकती है विकल्प

धान दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण खाद्य फसलों में शामिल है। इसकी खेती दुनिया भर में 16.4 करोड़ हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में होती है और यह वैश्विक आबादी के आधे से अधिक लोगों के लिए आहार ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है। वैश्विक धान उत्पादन में एशिया की हिस्सेदारी करीब 90% है, जहां धान की रोपाई वाली पारंपरिक प्रणाली अभी भी व्यापक रूप से अपनाई जाती है।

पारंपरिक रोपाई वाली धान की खेती में आमतौर पर खेतों में लंबे समय तक पानी भरा रखा जाता है। इससे बड़ी मात्रा में पानी और श्रम की आवश्यकता होती है तथा मीथेन उत्सर्जन भी बढ़ता है। वहीं, किसानों को श्रमिकों की कमी, पानी की बढ़ती कमी, उत्पादन लागत में वृद्धि और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में धान की सीधी बुवाई को एक वैकल्पिक उत्पादन प्रणाली के रूप में देखा जा रहा है। यह पद्धति संसाधनों की जरूरत कम करने के साथ उत्पादकता बनाए रखने की क्षमता रखती है। 

Subscribe Rural Voice Newsletter