भारत को अपनी आनुवंशिक संपदा को कृषि महाशक्ति बनाने की दिशा में बदलना होगा: डॉ. परोदा
भारत को अपनी विशाल पादप आनुवंशिक संपदा को जलवायु सहनशीलता, खाद्य सुरक्षा, किसानों की समृद्धि और कृषि नवाचार के लिए रणनीतिक ताकत में बदलना होगा। यह बात पद्मश्री डॉ. राज एस. परोदा ने कही। NBPGR के स्वर्ण जयंती समारोह में उन्होंने चार परिवर्तनकारी शक्तियों की पहचान करते हुए जीन बैंक के आधुनिकीकरण और डिजिटल आनुवंशिक सूचना सहित सात राष्ट्रीय प्राथमिकताएं बताईं।
भारत में कृषि की अगली क्रांति शायद खेतों से नहीं, बल्कि जीन बैंक से शुरू होगी। जलवायु परिवर्तन, कृषि में डिजिटाइजेशन का प्रयोग और जीन एडिटिंग जैसी तकनीकें खेती का स्वरूप बदल रही हैं। ऐसे में भारत को केवल अपनी समृद्ध पादप आनुवंशिक संपदा को संरक्षित करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे जलवायु सहनशीलता, बेहतर पोषण, किसानों की अधिक आय और वैश्विक नेतृत्व की ताकत में बदलना होगा। यह बात ट्रस्ट फॉर एडवांसमेंट ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (TAAS) के संस्थापक अध्यक्ष पद्मश्री डॉ. राज एस. परोदा ने कही।
ICAR-नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज (NBPGR) के स्वर्ण जयंती स्थापना दिवस समारोह को संबोधित करते हुए डॉ. परोदा ने कहा कि संस्था की 50 वर्षों की यात्रा ने भारत की सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक संपदाओं में से एक, आनुवंशिक संपदा का निर्माण किया है। हालांकि उन्होंने चेताया कि अगले 50 वर्षों की रणनीति केवल जैविक सामग्री के पारंपरिक संरक्षण तक सीमित नहीं रह सकती।
उन्होंने कहा, “भारतीय कृषि का भविष्य केवल जैव विविधता के संरक्षण पर निर्भर नहीं करेगा, बल्कि विज्ञान, नवाचार और प्रभावी शासन के माध्यम से इसे राष्ट्रीय संपदा में बदलने पर निर्भर करेगा।” डॉ. परोदा के अनुसार, NBPGR की यात्रा इस सोच का प्रमाण है कि कृषि का भविष्य पीढ़ियों से संचित आनुवंशिक विविधता के संरक्षण पर निर्भर करता है। भारत के पास अब दुनिया के सबसे बड़े पादप आनुवंशिक संसाधन संग्रहों में से एक है, जिसमें 4.6 लाख से अधिक एक्सेशन हैं। इनमें सूखा, गर्मी, बाढ़, लवणता और अन्य प्रतिकूल परिस्थितियों को सहन करने के साथ बेहतर पोषण से जुड़े महत्वपूर्ण गुण मौजूद हैं। हालांकि बदलते कृषि परिदृश्य में इन संसाधनों के प्रबंधन और उपयोग के तरीके में बुनियादी बदलाव की जरूरत है।
आनुवंशिक संसाधन प्रबंधन को बदलने वाली चार शक्तियां
डॉ. परोदा ने जलवायु परिवर्तन, डिजिटल कृषि, आणविक जीव विज्ञान एवं जीन एडिटिंग तथा संस्थागत बदलाव को चार प्रमुख परिवर्तनकारी शक्तियों के रूप में चिन्हित किया, जो पादप आनुवंशिक संसाधनों का भविष्य तय करेंगी।
जलवायु परिवर्तन केवल तापमान को नहीं बदल रहा, बल्कि भविष्य की फसलों के लिए जरूरी आनुवंशिक गुणों को भी बदल रहा है। सूखा, गर्मी, बाढ़, लवणता, पाला और नए कीटों को सहन करने वाली किस्मों की आवश्यकता बढ़ेगी।
पारंपरिक प्रजातियां, फसलों की संबंधी जंगली प्रजातियां और कम उपयोग वाली फसलें ऐसे कई उपयोगी गुण उपलब्ध करा सकती हैं। इसलिए आज संरक्षित किया गया प्रत्येक आनुवंशिक संसाधन भविष्य की जलवायु अनिश्चितताओं के खिलाफ एक “बीमा पॉलिसी” बन सकता है।
दूसरा बड़ा बदलाव डिजिटल सीक्वेंस सूचना (DSI) के बढ़ते महत्व से जुड़ा है। आनुवंशिक संसाधन अब केवल भौतिक नमूनों के रूप में मौजूद नहीं हैं, बल्कि तेजी से डिजिटल आनुवंशिक सूचनाओं के रूप में भी साझा और उपयोग किए जा रहे हैं।
डॉ. परोदा ने कहा कि DSI को नियंत्रित करने वाले अंतरराष्ट्रीय नियमों को आकार देने वाले देश कृषि नवाचार और आनुवंशिक संसाधनों के स्वामित्व को प्रभावित करने में तेजी से महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। इसलिए भारत को विकासशील देशों के हितों को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिक रूप से प्रगतिशील, कानूनी रूप से न्यायसंगत और समान अवसर देने वाले अंतरराष्ट्रीय नियम बनाने में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
संरक्षण के साथ नवाचार जरूरी
डॉ. परोदा ने आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण को जीन एडिटिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सिंथेटिक बायोलॉजी जैसी आधुनिक तकनीकों के साथ जोड़ने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि इन तकनीकों को कृषि जैव विविधता के लिए खतरे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उचित नियमन के साथ ये भारत के आनुवंशिक संग्रहों में छिपी क्षमता को सामने लाने के शक्तिशाली साधन बन सकती हैं।
उन्होंने नवाचार को तेज करने के लिए मजबूत सार्वजनिक-निजी भागीदारी की जरूरत बताई, साथ ही आनुवंशिक संसाधनों तक पहुंच और उनसे मिलने वाले लाभों के उचित बंटवारे के लिए स्पष्ट व्यवस्था की वकालत की। हालांकि, सबसे बड़ी संस्थागत चुनौती संरक्षण और उपयोग के बीच लंबे समय से मौजूद अंतर को खत्म करना है।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय जीन बैंक की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि उसमें कितने एक्सेशन सुरक्षित हैं, बल्कि इस आधार पर होनी चाहिए कि इन आनुवंशिक संसाधनों के प्रभावी उपयोग से कितने किसानों की आजीविका में सुधार हुआ।
उनके अनुसार, प्रत्येक संरक्षित आनुवंशिक संसाधन का इस्तेमाल अंततः ऐसी फसल किस्में विकसित करने में होना चाहिए, जिनमें बेहतर पोषण, अधिक लचीलापन और किसानों के लिए अधिक आय की क्षमता हो। उनका स्पष्ट संदेश था कि उपयोग के बिना संरक्षण महज संरक्षण है, जबकि संरक्षण और नवाचार का मेल राष्ट्रीय विकास का इंजन बन सकता है।
वैश्विक नेतृत्व की क्षमता रखता है भारत
डॉ. परोदा ने कहा कि विशाल फसल विविधता, वैज्ञानिक क्षमता, कृषि अनुसंधान नेटवर्क और मेहनती किसान समुदाय के कारण भारत पादप आनुवंशिक संसाधनों के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व हासिल करने की अनूठी स्थिति में है।
भारत के पास 4.6 लाख से अधिक एक्सेशन के साथ वैज्ञानिक संस्थानों का व्यापक नेटवर्क और पादप प्रजनन तथा जैव प्रौद्योगिकी के प्रशिक्षित विशेषज्ञ हैं। खाद्य और पोषण सुरक्षा के लिए आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण और उपयोग को लेकर देश में मजबूत राजनीतिक समर्थन भी मौजूद है।
उन्होंने पिछले वर्ष प्रधानमंत्री द्वारा डुप्लीकेट सेफ्टी जीन बैंक के लिए घोषित 500 करोड़ रुपये की सहायता का उल्लेख करते हुए कहा कि यह दर्शाता है कि भारत की जैविक विरासत को रणनीतिक राष्ट्रीय संपदा के रूप में देखा जा रहा है।
हालांकि, डॉ. परोदा के अनुसार प्रस्तावित दूसरा जीन बैंक केवल मौजूदा सुविधा की नकल नहीं होना चाहिए। इसे एक डिजिटल, जलवायु-स्मार्ट और वैश्विक स्तर पर नेटवर्क से जुड़ी सुविधा के रूप में विकसित किया जाना चाहिए, जिसमें जीनोमिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्रायोबायोलॉजी, फेनोमिक्स और रियल-टाइम सूचना प्रणालियों का एकीकरण हो। उन्होंने सुझाव दिया कि यह सुविधा स्वालबार्ड ग्लोबल सीड वॉल्ट के बराबर या उससे बेहतर मानकों को हासिल करने का लक्ष्य रखे।
सात राष्ट्रीय प्राथमिकताएं
भविष्य की रणनीति के लिए डॉ. परोदा ने पादप आनुवंशिक संसाधनों से जुड़ी सात राष्ट्रीय प्राथमिकताएं सामने रखीं।
पहली, सभी उपलब्ध फसल जंगली संबंधी प्रजातियों का संग्रह पूरा किया जाए, क्योंकि इनमें जलवायु सहनशीलता सहित कई महत्वपूर्ण गुण मौजूद हो सकते हैं। दूसरी, उभरती वैज्ञानिक और जलवायु चुनौतियों के अनुरूप राष्ट्रीय जीन बैंक का आधुनिकीकरण किया जाए। तीसरी, उभरती डिजिटल आनुवंशिक संसाधन अर्थव्यवस्था में भारत की भूमिका मजबूत करने के लिए डिजिटल सीक्वेंस सूचना का राष्ट्रीय प्लेटफॉर्म स्थापित किया जाए।
चौथी, आनुवंशिक सामग्री को सुरक्षित रखने और उसके वैज्ञानिक चरित्र को बेहतर समझने के लिए DNA फिंगरप्रिंटिंग और क्रायो-संरक्षण को मजबूत किया जाए। पांचवीं, सामुदायिक बीज बैंक और खेत स्तर पर संरक्षण को बढ़ावा दिया जाए, ताकि आनुवंशिक विविधता का संबंध किसानों और स्थानीय समुदायों से बना रहे। छठी, संरक्षित आनुवंशिक संसाधनों के गुणों और संभावित उपयोग का व्यवस्थित मूल्यांकन करने के लिए राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन मूल्यांकन मिशन शुरू किया जाए।
सातवीं, भारत को पादप आनुवंशिक संसाधनों के अंतरराष्ट्रीय शासन में वैश्विक नेतृत्व की स्थिति हासिल करनी चाहिए। इसमें संसाधनों तक पहुंच, नवाचार, डिजिटल आनुवंशिक सूचना और लाभ-साझेदारी से जुड़े नियमों को आकार देने में सक्रिय भूमिका शामिल होनी चाहिए।
बीज को रणनीतिक राष्ट्रीय संपदा के रूप में देखने की जरूरत
अपने संबोधन के समापन में डॉ. परोदा ने कहा कि बीज को केवल जैविक सामग्री के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इनमें विकास की प्रक्रिया, कृषि परंपराओं, संस्कृति, लचीलेपन और मानव ज्ञान का संचित अनुभव मौजूद है। उन्होंने कहा कि अगले 50 वर्षों की चुनौती NBPGR द्वारा संरक्षित आनुवंशिक संपदा को व्यावहारिक परिणामों में बदलने की है।
उन्होंने विश्वास जताया कि NBPGR अपने मजबूत वैज्ञानिक नेतृत्व और समर्पित टीम के साथ इस राष्ट्रीय अभियान के केंद्र में बना रहेगा। डॉ. परोदा ने कहा कि भावी पीढ़ियां वर्ष 2026 को उस समय के रूप में याद करें, जब भारत ने अपनी आनुवंशिक संपदा को कृषि विकास और राष्ट्रीय प्रगति के शक्तिशाली इंजन में बदलने की दूरदर्शी सोच विकसित की।
उन्होंने कहा, “भारतीय कृषि का भविष्य उन बीजों में छिपा है, जिन्हें हम आज संरक्षित कर रहे हैं।” उन्होंने जोर दिया कि अब जिम्मेदारी इन बीजों में छिपी क्षमता को किसानों, नागरिकों और आने वाली पीढ़ियों की समृद्धि के लिए सामने लाने की है।

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