यूरिया आत्मनिर्भरता का अगला चरण: उत्पादन बढ़ाने से आगे ऊर्जा, कच्चे माल और स्वदेशी संसाधनों पर नियंत्रण की नई रणनीति
भारत के लिए उर्वरक क्षेत्र में अगली चुनौती यूरिया उत्पादन बढ़ाने के साथ कच्चे माल और ऊर्जा की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। हिंदुस्तान उर्वरक एंड रसायन लिमिटेड (HURL) बरौनी में ग्रीन यूरिया और सिंदरी में कोयला गैसीफिकेशन आधारित यूरिया उत्पादन की संभावनाएं तलाश रही है, ताकि आयात निर्भरता घटे और उर्वरक सुरक्षा मजबूत हो।
भारत का उर्वरक क्षेत्र देश की कृषि और खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में लंबा सफर तय कर चुका है। पिछले एक दशक में घरेलू उत्पादन क्षमता में किए गए निवेश से यूरिया उत्पादन बढ़ा और आयात पर निर्भरता कम हुई है। इसके बावजूद भारत दुनिया में यूरिया का सबसे बड़ा आयातक बना हुआ है। घरेलू यूरिया उत्पादन भी काफी हद तक प्राकृतिक गैस पर निर्भर है, जिसका बड़ा हिस्सा एलएनजी के रूप में आयात किया जाता है।
यह स्थिति आत्मनिर्भरता के इस महत्वपूर्ण पहलू को रेखांकित करती है कि उर्वरक सुरक्षा ऊर्जा और कच्चे माल की सुरक्षा से गहराई से जुड़ी हुई है। ऐसे समय जब वैश्विक परिस्थितियां लगातार अनिश्चित हैं, भारत की उर्वरक यात्रा का अगला चरण केवल अधिक उत्पादन तक सीमित नहीं रह सकता। इसके लिए सुरक्षित ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और स्वदेशी क्षमताओं के आधार पर एक मजबूत, विविध और टिकाऊ उर्वरक मूल्य श्रृंखला का निर्माण आवश्यक है।
अगली चुनौती केवल अधिक यूरिया का उत्पादन नहीं, बल्कि उस यूरिया उत्पादन के पीछे मौजूद ऊर्जा और कच्चे माल की आपूर्ति श्रृंखला को भी अधिक सुरक्षित बनाने की है। हिंदुस्तान उर्वरक एवं रसायन लिमिटेड (एचयूआरएल) की ‘ग्रीन यूरिया’ और ‘कोयला-से-यूरिया’ पहल इस दिशा में दो पूरक रास्ते प्रस्तुत करती हैं। इनमें से एक थर्मल पावर प्लांट से प्राप्त ग्रीन अमोनिया और कैप्चर किए गए कार्बन-डाइ-ऑक्साइड पर आधारित है, जबकि दूसरा देश में उत्पादन होने वाले कोयले के गैसीफिकेशन पर।
भारत में यूरिया का परिदृश्य
भारत ने यूरिया बनाने की क्षमता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है। वर्ष 2014-15 में यूरिया उत्पादन 225 लाख टन था, जो 2024-25 में बढ़कर 306 लाख टन हो गया। इस दौरान छह नए/रिवाइव किए गए संयंत्रों से सालाना 76.2 लाख टन अतिरिक्त उत्पादन क्षमता जुड़ी। आज देश की स्थापित यूरिया उत्पादन क्षमता लगभग 291 लाख टन है।
इस विस्तार के बावजूद भारत में मांग का 15-20 प्रतिशत यूरिया अब भी आयात से पूरा किया जाता है। इस तरह देश वैश्विक यूरिया और ऊर्जा बाजारों से लगातार जुड़ा हुआ है। लेकिन चुनौती का अगला चरण जटिल होता जा रहा है। यूरिया की मांग बढ़ रही है, पुरानी उत्पादन क्षमता को प्रतिस्थापित करने की जरूरत है और इस क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल तथा ऊर्जा की उपलब्धता भी वैश्विक बाजारों पर निर्भर है।
वर्ष 2025-26 में यूरिया की मांग लगभग 400 लाख टन रही, जबकि घरेलू उत्पादन करीब 300 लाख टन था। इस तरह लगभग 100 लाख टन का अंतर रहा। अब सवाल केवल यह नहीं कि भारत कितनी यूरिया पैदा कर सकता है, बल्कि यह भी है कि यूरिया उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की आपूर्ति कितनी सुरक्षित है।
प्राकृतिक गैस: पारंपरिक यूरिया के पीछे रणनीतिक कमजोरी
प्राकृतिक गैस अमोनिया आधारित यूरिया उत्पादन के लिए प्रमुख कच्चा माल है। भारत के यूरिया संयंत्र प्रतिदिन लगभग 55 मिलियन मीट्रिक स्टैंडर्ड घन मीटर (MMSCMD) प्राकृतिक गैस की खपत करते हैं। इस तरह यह देश में प्राकृतिक गैस की खपत करने वाला सबसे बड़ा क्षेत्र है। घरेलू यूरिया उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली प्राकृतिक गैस का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा आयातित एलएनजी के माध्यम से पूरा किया जाता है। इससे उर्वरक उत्पादन और वैश्विक ऊर्जा बाजारों के बीच गहरे संबंध का पता चलता है। ऐसे में जब भारत यूरिया के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब ऊर्जा और कच्चे माल के विश्वसनीय, किफायती और विविध स्रोत सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण हो जाता है।
कीमतों का झटका: युद्ध से पहले और बाद
इस निर्भरता ने उर्वरक क्षेत्र को कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव के प्रति संवेदनशील बना दिया है। पिछले 5-6 वर्षों में यूरिया बनाने के लिए औसत पूल्ड गैस कीमत लगभग 12-14 अमेरिकी डॉलर प्रति मीट्रिक मिलियन ब्रिटिश थर्मल यूनिट (MMBtu) रही है, लेकिन वर्तमान में यह बढ़कर करीब 18 अमेरिकी डॉलर हो गई है। वहीं, एंपावर्ड पूल मैनेजमेंट कमेटी (ईपीएमसी) गैस की कीमत बढ़कर 23 अमेरिकी डॉलर प्रति यूनिट तक पहुंच गई है।
2022 में रूस-यूक्रेन संघर्ष शुरू होने के बाद वैश्विक गैस कीमतों में तेज बढ़ोतरी ने भारत में पूल्ड गैस की लागत काफी बढ़ा दी। इससे यूरिया उत्पादन की लागत बढ़ी और सरकार पर सब्सिडी का बोझ भी बढ़ गया। हाल में ईरान युद्ध और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में व्यवधान ने एक बार फिर इस निर्भरता की संवेदनशीलता को उजागर किया। खाड़ी क्षेत्र से एलएनजी की आपूर्ति पर दबाव पड़ा और अंतरराष्ट्रीय यूरिया कीमतों में तेज वृद्धि हुई।
ये घटनाक्रम स्पष्ट करते हैं कि उर्वरक सुरक्षा को ऊर्जा सुरक्षा से अलग नहीं किया जा सकता। इसलिए आगे की दिशा घरेलू यूरिया उत्पादन के लिए अधिक सुरक्षित आधार तैयार करने की है। इसके लिए मजबूत गैस इन्फ्रास्ट्रक्चर, आपूर्ति के विविध स्रोत और कोल गैसीफिकेशन, ग्रीन हाइड्रोजन तथा ग्रीन अमोनिया जैसे वैकल्पिक कच्चे माल के रास्तों को विकसित करना महत्वपूर्ण होगा।
सरकारी रणनीति: कम कीमत और उपलब्धता
भारत सरकार ने क्षमता निर्माण, नीतिगत समर्थन और उत्पादन के विविधीकरण के जरिए यूरिया में आत्मनिर्भरता को लगातार मजबूत किया है। नई निवेश नीति-2012 के तहत छह नए यूरिया संयंत्रों की स्थापना हुई। इनमें एचयूआरएल के गोरखपुर, सिंदरी और बरौनी संयंत्र भी शामिल हैं। इन संयंत्रों से कुल 76.2 लाख टन प्रति वर्ष की अतिरिक्त उत्पादन क्षमता जुड़ी। सरकार ने जुलाई 2026 में यूरिया के लिए राष्ट्रीय निवेश नीति-2026 को मंजूरी दी। इसका उद्देश्य गैस आधारित यूरिया बनाने में नए निवेश को प्रोत्साहित करना और घरेलू उत्पादन को मजबूत करना है।
इसी के साथ, सरकार पारंपरिक प्राकृतिक गैस आधारित यूरिया से आगे के विकल्पों को भी आगे बढ़ा रही है। उर्वरक विभाग ने ग्रीन यूरिया परियोजनाओं के लिए रुचि की अभिव्यक्ति (ईओआई) आमंत्रित की है, जिसमें ग्रीन अमोनिया और कैप्चर्ड कार्बन-डाइ-ऑक्साइड का इस्तेमाल होना है।
दूसरी ओर, कोयला मंत्रालय यूरिया सहित डाउनस्ट्रीम उत्पादों के लिए कोयला/लिग्नाइट गैसीफिकेशन को बढ़ावा दे रहा है। इसके लिए 37,500 करोड़ रुपये की योजना है। इससे पहले कोल गैसीफिकेशन आधारित तीन नई यूरिया परियोजनाओं को भी मंजूरी दी गई है।
एसईसीआई के साइट (SIGHT) कार्यक्रम ने उर्वरक क्षेत्र से ग्रीन अमोनिया की दीर्घकालिक मांग तैयार की है। प्रतिस्पर्धी बोली में ग्रीन अमोनिया की कीमतें 49.75 रुपये से 64.74 रुपये प्रति किलोग्राम के बीच रहीं। यह भारत में ग्रीन अमोनिया की उभरती व्यावसायिक व्यवहार्यता की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
एचयूआरएल की अगुवाई
बड़े पैमाने पर यूरिया संयंत्रों के विकास और संचालन के अनुभव के आधार पर एचयूआरएल उर्वरक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के अगले चरण को दो अलग प्रौद्योगिकी के जरिए आगे बढ़ा रही है। एचयूआरएल बरौनी इकाई में ग्रीन अमोनिया और कैप्चर्ड कार्बन-डाइ-ऑक्साइड का इस्तेमाल करके ग्रीन यूरिया उत्पादन की दिशा में काम कर रही है। इसके साथ ही, सिंदरी इकाई में कोल गैसीफिकेशन के जरिए यूरिया उत्पादन की दिशा में आगे बढ़ रही है।
ये दोनों पहल पारंपरिक प्राकृतिक गैस आधारित यूरिया उत्पादन से आगे बढ़ने और ऐसे विकल्प तलाशने के एचयूआरएल के प्रयास को दर्शाती हैं, जो कच्चे माल की सुरक्षा को मजबूत कर सकें, बाहरी निर्भरता कम कर सकें और अधिक टिकाऊ उर्वरक उत्पादन को बढ़ावा दे सकें।
एचयूआरएल बरौनी: ग्रीन हाइड्रोजन और कैप्चर्ड कार्बन-डाइ-ऑक्साइड से यूरिया
बिहार स्थित बरौनी इकाई में एचयूआरएल ऐसे ग्रीन यूरिया मॉडल की संभावनाएं तलाश रही है, जिसमें उसके उर्वरक परिसर की एनटीपीसी के बरौनी बिजली संयंत्र से निकटता का लाभ उठाया जा सके।
उर्वरक विभाग ने 22 जून 2026 को देश में ग्रीन यूरिया उत्पादन के लिए ईओआई जारी किया था। इसके बाद एचयूआरएल ने ग्रीन अमोनिया और एनटीपीसी से प्राप्त कैप्चर्ड कार्बन-डाइ-ऑक्साइड को यूरिया उत्पादन के साथ रणनीतिक रूप से जोड़ने की अवधारणा विकसित की है। इसे आगे बढ़ाने के लिए एचयूआरएल ने एनटीपीसी के साथ समझौता भी किया है।
इसकी प्रक्रिया सरल है और यह परिवर्तनकारी हो सकती है:
नवीकरणीय ऊर्जा → ग्रीन हाइड्रोजन → ग्रीन अमोनिया + कैप्चर्ड कार्बन-डाइ-ऑक्साइड → ग्रीन यूरिया
यह दृष्टिकोण दो अलग औद्योगिक लक्ष्यों - स्वच्छ ऊर्जा व कार्बन उपयोग तथा उर्वरक उत्पादन को जोड़ता है। महत्वपूर्ण बात है कि इसमें कार्बन-डाइ-ऑक्साइड को केवल नियंत्रित उत्सर्जन के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे कार्बन कच्चे माल के रूप में देखा जाता है, जिसे कैप्चर करके यूरिया उत्पादन में इस्तेमाल किया जा सकता है।
नवीकरणीय ऊर्जा से तैयार ग्रीन अमोनिया, कैप्चर्ड कार्बन-डाइ-ऑक्साइड और मौजूदा उर्वरक उत्पादन तंत्र को एकीकृत करके एचयूआरएल ऐसे रास्ते तलाश रही है, जो पारंपरिक जीवाश्म ईंधन आधारित कच्चे माल पर निर्भरता कम कर सके और यूरिया उत्पादन के लिए अपेक्षाकृत कम कार्बन वाला विकल्प तैयार कर सके।
एचयूआरएल सिंदरी: वैकल्पिक कच्चे माल के रूप में स्वदेशी कोयला
एचयूआरएल अपनी सिंदरी इकाई में कोल इंडिया लिमिटेड के साथ मिलकर कोल गैसीफिकेशन आधारित कोयला-से-यूरिया मॉडल की संभावनाएं तलाश रही है। एचयूआरएल ने कोल इंडिया के साथ एक समझौता किया है, जिसके तहत दोनों कंपनियां संयुक्त रूप से इस परियोजना की संभावनाओं का अध्ययन करेंगी। इस पहल में उर्वरक उत्पादन में एचयूआरएल की विशेषज्ञता और कोयला क्षेत्र में कोल इंडिया की विशेषज्ञता को एक साथ लाया जा रहा है।
यह पहल भारत सरकार द्वारा कोल गैसीफिकेशन को बढ़ावा देने की रणनीतिक दिशा के अनुरूप है। इसका उद्देश्य आयातित प्राकृतिक गैस पर निर्भरता कम करना और रसायनों तथा उर्वरकों के उत्पादन में स्वदेशी संसाधनों के अधिक इस्तेमाल को संभव बनाना है।
इसकी प्रक्रिया इस प्रकार है:
कोयला → गैसीफिकेशन → सिनगैस → अमोनिया → यूरिया
यह केवल एक ईंधन की जगह दूसरे ईंधन के इस्तेमाल की बात नहीं है। इसका रणनीतिक महत्व यूरिया के लिए अतिरिक्त घरेलू कच्चे माल का स्रोत तैयार करने में है। यूरिया भारत की खाद्य सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण उर्वरक है। एचयूआरएल की उर्वरक उत्पादन विशेषज्ञता और कोल इंडिया के घरेलू कोयला संसाधनों को जोड़कर यह पहल एक स्वदेशी संसाधन को कृषि के लिए आवश्यक इनपुट में बदलने की दिशा में काम कर रही है। साथ ही, इससे आयातित प्राकृतिक गैस और वैश्विक ऊर्जा बाजारों में कीमतों के उतार-चढ़ाव के प्रति जोखिम कम करने में मदद मिल सकती है। इस लिहाज से, सिंदरी की यह पहल उर्वरक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के अगले चरण का एक महत्वपूर्ण आयाम प्रस्तुत करती है।
भारत का सबसे बड़ा निर्माता बनने की ओर एचयूआरएल
चयूआरएल के मौजूदा तीन संयंत्रों की कुल यूरिया उत्पादन क्षमता करीब 38 लाख टन प्रति वर्ष है। कंपनी बरौनी में ग्रीन यूरिया और सिंदरी में कोयला-से-यूरिया के रूप में अतिरिक्त रणनीतिक विकल्पों पर काम कर रही है। इसके अलावा, एचयूआरएल गोरखपुर इकाई में गैस आधारित संयंत्र पर भी विचार कर रही है। यदि ये परियोजनाएं सफलतापूर्वक विकसित और चालू होती हैं, तो वैकल्पिक कच्चे माल पर आधारित उपायों के जरिए एचयूआरएल की उत्पादन क्षमता में लगभग 25.4 लाख टन की अतिरिक्त क्षमता जुड़ सकती है। इसके साथ एचयूआरएल भारत की सबसे बड़ी यूरिया निर्माता कंपनी बन जाएगी, जिसकी वार्षिक उत्पादन क्षमता 76.2 लाख टन तक पहुंच सकती है।
उर्वरक आत्मनिर्भरता की नई परिभाषा
इसकी केंद्रीय रणनीतिक अवधारणा सरल है: भारत में निर्मित प्रति टन यूरिया उत्पाद के स्तर पर आत्मनिर्भरता को मजबूत करता है; वहीं सुरक्षित घरेलू संसाधनों का इस्तेमाल करके निर्मित प्रति टन यूरिया उत्पाद के साथ-साथ कच्चे माल के स्तर पर भी आत्मनिर्भरता को बढ़ाता है। ग्रीन हाइड्रोजन, अमोनिया उत्पादन में जीवाश्म ईंधन से प्राप्त हाइड्रोजन पर निर्भरता कम कर सकता है, जबकि कैप्चर्ड कार्बन-डाइ-ऑक्साइड यूरिया संश्लेषण के लिए आवश्यक कार्बन घटक उपलब्ध करा सकता है। दूसरी ओर, कोल गैसीफिकेशन घरेलू कार्बन संसाधन को सिनगैस में बदल सकता है, जिसका आगे अमोनिया और यूरिया उत्पादन में इस्तेमाल किया जा सकता है।
ये अलग-अलग तकनीकी रास्ते हैं, लेकिन इनका लक्ष्य एक ही है - यूरिया उत्पादन के लिए कच्चे माल की श्रृंखला पर अधिक नियंत्रण हासिल करना। इसका यह मतलब नहीं कि प्राकृतिक गैस का महत्व खत्म हो जाएगा। गैस आधारित संयंत्र भारत की उर्वरक व्यवस्था का प्रमुख हिस्सा बने रहेंगे। रणनीतिक अवसर एक ऐसे विविधीकृत उत्पादन तंत्र के निर्माण में है, जिसमें प्राकृतिक गैस, कोल गैसीफिकेशन और ग्रीन हाइड्रोजन की अपनी-अपनी स्पष्ट भूमिका हो। यह भूमिका अर्थव्यवस्था, प्रौद्योगिकी की परिपक्वता, संसाधनों की उपलब्धता और पर्यावरणीय प्रभाव जैसे कारकों के आधार पर तय की जा सकती है। भारत बड़े पैमाने पर यूरिया उत्पादन क्षमता विकसित करने की अपनी क्षमता पहले ही साबित कर चुका है। अब आत्मनिर्भरता के अर्थ को और व्यापक बनाने का समय है।
मेड इन इंडिया से ‘भारत के संसाधनों से भारत में निर्मित’ तक
उर्वरक आत्मनिर्भरता को तीन परस्पर जुड़े स्तरों में देखा जा सकता है - उत्पाद आत्मनिर्भरता, ऊर्जा आत्मनिर्भरता और कच्चे माल में आत्मनिर्भरता। भारत के मौजूदा यूरिया संयंत्र पहले स्तर यानी उत्पाद आत्मनिर्भरता में योगदान देते हैं। गैस आपूर्ति के विविध और सुरक्षित स्रोत दूसरे स्तर यानी ऊर्जा आत्मनिर्भरता को मजबूत करते हैं। वहीं, उभरते ग्रीन यूरिया और कोयला-से-यूरिया तीसरे स्तर की संभावनाएं तलाशते हैं। इनका उद्देश्य महत्वपूर्ण कच्चे माल के स्रोतों को भारत के अपने संसाधन और ऊर्जा तंत्र के भीतर अधिक मजबूती से स्थापित करना है।
भारत के लिए यह केवल औद्योगिक क्षेत्र से जुड़ा सवाल नहीं है। उर्वरक सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण घटक है, और उर्वरक क्षेत्र की मजबूती उन ऊर्जा और कच्चे माल की प्रणालियों की मजबूती पर निर्भर करती है, जो इसे आधार प्रदान करती हैं। इसलिए भारत की उर्वरक यात्रा का अगला अध्याय केवल अधिक यूरिया उत्पादन के बारे में नहीं है। यह अधिक सुरक्षित, अधिक टिकाऊ और तेजी से भारत के अपने संसाधनों से यूरिया उत्पादन की दिशा में आगे बढ़ने के बारे में है।
निष्कर्ष
भारत की उर्वरक यात्रा एक नए चरण में प्रवेश कर रही है और एचयूआरएल खुद को इस बदलाव में अग्रणी भूमिका में स्थापित कर रही है। बड़े पैमाने पर यूरिया उत्पादन क्षमता विकसित करने से लेकर ग्रीन यूरिया और कोयला-से-यूरिया तकनीक की संभावनाएं तलाशने तक, एचयूआरएल भारत के उर्वरक क्षेत्र की बदलती जरूरतों के अनुरूप खुद को विकसित कर रही है।
बरौनी और सिंदरी में उसकी पहल नवीकरणीय ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन, कार्बन के उपयोग और घरेलू संसाधनों को एक साथ जोड़ती हैं तथा आत्मनिर्भरता की अवधारणा को उत्पादन के नए रास्तों में बदलती हैं। ये प्रयास आत्मनिर्भरता को मजबूत करने, कम-कार्बन वाली अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने और 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन हासिल करने के भारत के व्यापक राष्ट्रीय लक्ष्यों के अनुरूप भी हैं।
इसलिए उर्वरक क्षेत्र का अगला मोर्चा केवल इस बात से तय नहीं होगा कि भारत कितनी यूरिया पैदा करता है, बल्कि इससे भी तय होगा कि वह कितनी सुरक्षित, टिकाऊ और तेजी से अपने ही संसाधनों से यूरिया का उत्पादन कर सकता है। अपनी प्रमुख प्रवर्तक कंपनियों - एनटीपीसी, इंडियन ऑयल और कोल इंडिया के सहयोग से एचयूआरएल इस दृष्टि को वास्तविकता में बदलने की दिशा में प्रयास कर रही है। साथ ही, वह अधिक लचीले, संसाधन-कुशल और कम-कार्बन वाले उर्वरक क्षेत्र की ओर भारत की यात्रा में भी योगदान दे रही है।
(डॉ. सिबा प्रसाद मोहंती हिंदुस्तान उर्वरक एवं रसायन लिमिटेड (एचयूआरएल) के प्रबंध निदेशक हैं)

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