ऑयलमील निर्यात में लगातार पांचवें महीने गिरावट, पश्चिम एशिया संकट के कारण मार्च में 33% घट गया निर्यात
वर्ष 2025-26 के अंतिम माह में 2.75 लाख टन का ऑयलमील निर्यात हो सका, जबकि एक साल पहले 4.09 लाख टन का निर्यात हुआ था। इस तरह मार्च में निर्यात में 33 प्रतिशत की गिरावट आई है। नवंबर 2025 से ही इसमें गिरावट का ट्रेंड बना हुआ है।
भारत से ऑयलमील निर्यात में मार्च 2026 में लगातार पांचवें महीने गिरावट आई है। वर्ष 2025-26 के अंतिम माह में 2.75 लाख टन का ऑयलमील निर्यात हो सका, जबकि एक साल पहले 4.09 लाख टन का निर्यात हुआ था। इस तरह मार्च में निर्यात में 33 प्रतिशत की गिरावट आई है। नवंबर 2025 से ही इसमें गिरावट का ट्रेंड बना हुआ है।
सॉलवेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया की तरफ से मंगलवार को जारी आंकड़ों के अनुसार पूरे वित्त वर्ष 2025-26 में ऑयलमील निर्यात 13 प्रतिशत घटा है। यह 2024-25 के 43.42 लाख टन से घटकर 37.68 लाख टन रह गया। वर्ष 2023-24 में 48.85 लाख टन ऑयलमील का निर्यात हुआ था।
वैल्यू के लिहाज से देखें तो वर्ष 2025-26 में 9,340 करोड़ रुपये का ऑयलमील निर्यात हो सका जबकि 2024-25 में 12,171 करोड़ रुपये का निर्यात किया गया था। उससे पहले 2023-24 में 15,368 करोड़ रुपये का ऑयलमील निर्यात हुआ था।
फरवरी 2026 की तुलना में मार्च में सोयाबीन मील का निर्यात लगभग आधा रह गया। इसका 63,019 टन का निर्यात हुआ जबकि फरवरी में 1,12,869 टन का निर्यात हुआ था। रेपसीड मील का निर्यात 99,208 टन से बढ़कर 1,57,291 टन हो गया। राइस ब्रान एक्सट्रैक्ट का निर्यात भी 23,925 टन से बढ़कर 38,486 टन पहुंच गया। लेकिन कैस्टर सीड मील का निर्यात 21,763 टन की तुलना में 15,996 टन रह गया।
एसोसिएशन का कहना है कि मुख्य रूप से रेड सी शिपिंग रूट में बाधा के कारण ऑयलमील निर्यात में इतनी गिरावट देखने को मिली है। इसकी वजह से भाड़ा काफी बढ़ गया है। इसके अलावा दक्षिण अमेरिकी और यूरोपीय सप्लायर भी प्रतिस्पर्धी कीमतों पर सप्लाई कर रहे हैं।
पिछले वित्त वर्ष में चीन भारतीय ऑयलमील का सबसे बड़ा खरीदार रहा। उसने भारत से 8.78 लाख टन ऑयलमील की खरीद की। एक तो भारत का रेपसीड मील सस्ता था, दूसरे चीन ने कनाडा के रेपसीड/कैनोला मील पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगा रखा था।
सोयाबीन मील निर्यात में बड़ी गिरावट पर एसईए का कहना है कि अर्जेंटीन और ब्राजील जैसे बड़े उत्पादक देश कम कीमतों पर सोयामील की सप्लाई कर रहे थे। घरेलू स्तर पर भी फीड बनाने वालों ने सोयामील या अन्य ऑयलमील की जगह एथेनॉल के सह-उत्पाद डीडीजीएस का इस्तेमाल शुरू कर दिया है।
भूराजनैतिक संकट के कारण शिपिंग कंपनियों को रेड सी मार्ग से बचना पड़ रहा है। केप ऑफ गुड होप के रास्ते जहाजों को भेजने से समुद्री यात्रा में 10-15 दिनों की अतिरिक्त देरी हो रही है, जिससे कंटेनरों की कमी और मालभाड़ा लागत में बढ़ोतरी हुई है। भारत के लगभग 20% ऑयलमील निर्यात पश्चिम एशिया को और 15% निर्यात यूरोप को भेजे जाते हैं। ये लॉजिस्टिक देरी और बढ़ती लागत से अत्यधिक प्रभावित हैं।

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