लगभग खत्म हो रही है गेहूं निर्यात के दोबारा शुरू होने की संभावना

व्यावहारिक रूप से गेहूं निर्यात के दोबारा शुरू होने की संभावना काफी कमजोर दिख रही है। इसकी दो वजह हैं। पहली, देश में गेहूं की कीमतें निर्यात पर प्रतिबंध के बाद कुछ नरम हुई थी लेकिन अब यह न्यूनतम समर्थन मूल्य से दो सौ से तीन सौ रुपये प्रति क्विटंल अधिक चल रही हैं। अभी यह कीमतें 2250 रुपये से 2300 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास हैं। रबी मार्केटिंग सीजन 2022-23 के लिए गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 2015 रुपये प्रति क्विटंल है। दूसरे, भारत के गेहूं निर्यात पर प्रतिबंध लगाने के फैसले की आलोचना करने वाले देश और डब्ल्यूटीओ जैसे संगठन सीधे दूसरे देशों को निर्यात के आड़े आ रहे हैं

लगभग खत्म हो रही है गेहूं निर्यात के दोबारा शुरू होने की संभावना

सरकार ने जब 13 मई, 2022 को देश से गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया तो उसके कुछ दिन बाद ही संकेत दिये थे कि भारत जरूरतमंद देशों को गेहूं का निर्यात कर सकता है। लेकिन इस बात को अब करीब 40 दिन होने वाले हैं और गेहूं के निर्यात को दोबारा शुरू करने की कोई संभावना नजर नहीं आ रही है। सरकार ने इस दिशा में अभी तक कोई नीतिगत कदम भी नहीं उठाया है। असल में व्यावहारिक रूप से गेहूं निर्यात दोबारा शुरू होने की संभावना काफी कमजोर दिख रही है। इसकी दो वजह हैं। पहली, देश में गेहूं की कीमतें निर्यात पर प्रतिबंध के बाद कुछ नरम हुई थीं लेकिन अब यह न्यूनतम समर्थन मूल्य से दो सौ से तीन सौ रुपये प्रति क्विटंल अधिक चल रही हैं। अभी यह कीमतें 2250 रुपये से 2300 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास हैं। रबी मार्केटिंग सीजन 2022-23 के लिए गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 2015 रुपये प्रति क्विटंल है। दूसरे, भारत के गेहूं निर्यात पर प्रतिबंध लगाने के फैसले की आलोचना करने वाले देश और डब्ल्यूटीओ जैसे संगठन सीधे दूसरे देशों को निर्यात के आड़े आ रहे हैं।

सरकार द्वारा गेहूं निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की वजह घरेलू बाजार में कीमतों को नियंत्रित करना था। साथ ही अधिक निर्यात के चलते घरेलू बाजार में उपलब्धता के संकट की आशंका भी इसकी एक वजह थी। निर्यात के लिए गेहूं खऱीदने वाली एक कंपनी के वरिष्ठ पदाधिकारी ने रूरल वॉयस को बताया कि प्रतिबंध के बाद कीमतें कम हुई थीं लेकिन उसके बाद कीमतें फिर बढ़ गई हैं। हमने 2250 रुपये प्रति क्विटंल पर गेहूं की खरीद की थी। फिलहाल कीमतों को देखते हुए लगता है कि निर्यात की अनुमति नहीं मिलने की स्थिति में अगर हमें घेरलू बाजार में ही यह गेहूं बेचना पड़ा तो कीमतों के रुझान को देखते हुए शायद हमें कोई घाटा नहीं उठाना पड़ेगा।

वहीं जरूररतमंद देशों को भी सीधे गेहूं का निर्यात संभव नहीं लग रहा है। डब्ल्यूटीओ में भारत के इस रुख के खिलाफ जाने वाले देशों का कहना है कि जरूरतमंद देशों को निर्यात करना है तो वह निर्यात वर्ल्ड फूड प्रोग्राम (डब्ल्यूएफपी) के तहत होना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र की सदस्य संस्था डब्ल्यूएफपी का संचालन संयुक्त राष्ट्र महासचिव और संयुक्त राष्ट्र की संस्था फूड एंड एग्रीकल्चर आर्गनाइजेशन (एफएओ) के डायरेक्टर जनरल द्वारा नियुक्त अधिकारी करते हैं। डब्ल्यूएफपी के तहत खाद्यान्न उन देशों को मुफ्त में दिया जाता है जो इसे खरीदने की आर्थिक क्षमता नहीं रखते हैं। जाहिर है इस रास्ते जाने वाले गेहूं की कीमत क्या होगी और निजी कंपनियों के पास जो स्टॉक है वह इस कार्यक्रम के तहत कैसे निर्यात होगा। वहीं भारत से गेहूं के बड़े आयातकों में बांग्लादेश और इंडोनेशिया व खाड़ी के देश हैं लेकिन यह देश मुफ्त में अनाज लेने की श्रेणी में ही नहीं आते क्योंकि यह आयातित खाद्यान्न की कीमत देने में सक्षम हैं। ऐसे में सीधे निर्यात करने की संभावना के रास्ते में यह एक बड़ी अड़चन है।

वहीं जिस तरह से सरकार ने गेहूं के उत्पादों के निर्यात को रेगुलेट करने का फैसला लिया है वह इस बात का संकेत है कि सरकार घरेलू बाजार में गेहूं की उपलब्धता को लेकर बहुत आश्वस्त नहीं है। उत्पादन के मामले में अभी भी सरकार और एक्सपर्ट्स के बीच मतभेद हैं। सरकार अभी भी 2021-22 के रबी उत्पादन सीजन में 10.6 करोड़ टन गेहूं उत्पादन के अनुमान पर कायम है। जबकि कुछ सरकारी अधिकारी ही रूरल वॉयस के साथ अनौपचारिक बातचीत में उत्पादन के करीब 10 करोड़ टन पर रहने की बात कर रहे हैं। वहीं कुछ एक्सपर्ट दस करोड़ टन से कम गेहूं उत्पादन का अनुमान लगा रहे हैं। उत्पादन में कमी के चलते सरकारी खऱीद सीजन 2022-23 के तहत 187.42 लाख टन गेहूं की ही खरीद हो सकी है। यह आंकड़ा सेंट्रल फूड ग्रेन प्रॉक्योरमेंट पोर्टल का है। जबकि भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के मुताबिक 30 मई तक 186.57 लाख टन गेहूं की खरीद हुई थी। पिछले रबी मार्केटिंग सीजन 2021-22 में गेहूं की सरकारी खरीद 433.44 लाख टन रही थी। इस साल खऱीद का स्तर 15 साल में सबसे कम रहा है। ऐसा पहली बार हुआ है जब केंद्रीय पूल में एक अप्रैल को बकाया स्टॉक से नए सीजन की खऱीद कम रही है। चालू साल में एक अप्रैल को केंद्रीय पूल में 189.9 लाख टन गेहूं का स्टॉक था। वहीं एक जून को केंद्रीय पूल में गेहूं का स्टॉक 2008 के बाद से लेकर अभी तक के 14 साल में सबसे कम है। एफसीआई के मुताबिक केंद्रीय पूल में एक जून को गेहूं का स्टॉक 311.42 लाख टन था। जबकि एक साल पहले इसी समय केंद्रीय पूल में गेहूं का स्टॉक 602.91 लाख टन था। एक जून को केंद्रीय पूल में गेहूं का सबसे अधिक स्टॉक (पीक स्टॉक) होता है। एक जून 2008 के 241.23 लाख टन के गेहूं स्टॉक के बाद से 14 साल बाद केंद्रीय पूल में 311.42 लाख टन के साथ गेहूं का स्टॉक सबसे कम है।

पिछले साल 2021-22 में भारत ने 72.39 लाख टन गेहूं का निर्यात किया था। इसकी औसत निर्यात कीमत 293 डॉलर प्रति टन रही थी और कुल निर्यात मूल्य 2121.79 मिलियन डॉलर रहा था। वहीं 2020-21 में भारत से 549.70 मिलियन डॉलर के 20.88 लाख टन गेहूं का निर्यात हुआ था। इसका औसत निर्यात मूल्य 263 डॉलर प्रति टन रहा था। जबकि चालू साल 2022-23 के पहले माह अप्रैल में ही भारत ने 14.73 लाख टन गेहूं का निर्यात किया जिसका कुल निर्यात मूल्य 473 मिलियन डॉलर रहा और औसत निर्यात मूल्य 322 डॉलर प्रति टन रहा। सरकार ने 13 मई को निर्यात पर प्रतिबंध लगाया इसलिए मई के निर्यात को मिलाकर वास्तविक निर्यात उपर दी गई मात्रा से अधिक ही रहेगा। इस साल फरवरी में रूस और यूक्रेन युद्ध शुरू होने के चलते वैश्विक बाजार में गेहूं की आपूर्ति करीब 25 फीसदी घटने के चलते कीमतें काफी बढ़ गई हैं और इसी के चलते भारत से गेहूं निर्यात में तेजी आई। लेकिन सरकार ने 13 मई को देश से गेहूं निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था। एक सरकारी अधिकारी ने रूरल वॉयस को बताया कि इसकी वजह घरेलू कीमतों को नियंत्रित करना है क्योंकि हमें किसानों को बेहतर दाम देने के साथ ही घरेलू उपभोक्ताओं को भी वैश्विक बाजार की भारी कीमत वृद्धि से संरक्षण देना है। सरकार के फैसला लेने में इस बात का खयाल रखा गया है। मौजूदा परिस्थिति को देखते हुए वैश्विक बाजार की ऊंची कीमतों के बावजूद निर्यात के दोबारा शुरू होने की संभावना काफी कम रह गई है क्योंकि अगर सरकार के आंकड़ों के मुताबिक उत्पादन होता तो सरकारी खऱीद 15 साल के निचले स्तर पर न अटकती और केंद्रीय पूल में एक जून का पीक स्टॉक 14 साल बाद सबसे कम न रहता। वहीं निर्यात के बावजूद कीमतों का फिर से न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से 200 से 300 रुपये तक ऊपर बने रहना इस बात का संकेत है कि कीमतों में तेजी रह सकती है। ऐसे में सरकार नहीं चाहेगी कि निर्यात के लालच में घरेलू बाजार में कीमतों में भारी बढ़ोतरी आए।