डीएसआर से पानी की 35% तक बचत, लागत भी कम, एफएसआईआई का इसे व्यापक रूप से अपनाने का आह्वान
फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (FSII) के एक सम्मेलन में विशेषज्ञों ने कहा कि सीधी बुवाई (DSR) तकनीक से धान की खेती में पानी की खपत 35 प्रतिशत तक कम की जा सकती है। खेती की लागत लगभग 14,000 रुपये प्रति हेक्टेयर तक घटाई जा सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, प्रमुख धान उत्पादक राज्यों में भूजल स्तर तेजी से घट रहा है। उद्योग जगत और वैज्ञानिकों ने टिकाऊ तथा जलवायु-अनुकूल धान उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए डीएसआर तकनीक को व्यापक स्तर पर अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
भारत में जल संसाधनों पर बढ़ते दबाव, बढ़ती श्रम लागत और कृषि के पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने की आवश्यकता के बीच, फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (FSII) ने डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) पर आयोजित एक सम्मेलन में अधिक संसाधन-कुशल खेती पद्धतियों को अपनाने का आह्वान किया। विशेषज्ञों ने कहा कि डीएसआर एक क्लाइमेट-स्मार्ट और संसाधन-कुशल विकल्प के रूप में उभर रहा है, जो प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के साथ किसानों की आय बढ़ाने में सक्षम है।
FSII ने 10 मार्च 2026 को नई दिल्ली के NASC कॉम्प्लेक्स में “सस्टेनेबल एवं मुनाफे वाले चावल उत्पादन के लिए डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR)” विषय पर अपने सम्मेलन के दूसरे संस्करण का आयोजन किया। इस सम्मेलन में नीति-निर्माताओं, वैज्ञानिकों, उद्योग जगत के प्रतिनिधियों और कृषि विशेषज्ञों ने भाग लिया। कार्यक्रम में भारत के धान उत्पादक क्षेत्रों में डीएसआर को बड़े पैमाने पर अपनाने से जुड़े अवसरों और चुनौतियों पर चर्चा की गई और इसके तेजी से प्रसार के लिए एक रणनीतिक रोडमैप तैयार करने पर विचार-विमर्श हुआ।
भारत में धान की खेती पर अस्थिर भूजल दोहन के कारण लगातार दबाव बढ़ता जा रहा है, खासकर उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में। फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (FSII) के अध्यक्ष तथा सवाना सीड्स के सीईओ और प्रबंध निदेशक अजय राणा ने कहा, “पंजाब में भूजल दोहन वार्षिक रीचार्ज का लगभग 156% तक पहुंच चुका है, जबकि हरियाणा में यह लगभग 137% है, जो भूजल भंडारों पर गंभीर दबाव को दर्शाता है। धान सबसे अधिक पानी लेने वाली फसलों में शामिल है। एक किलोग्राम चावल उत्पादन के लिए 3,000 से 5,000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। वहीं, भारत में कुल मीठे पानी का लगभग 80% हिस्सा कृषि क्षेत्र में जाता है। ऐसे में अधिक जल-कुशल धान उत्पादन प्रणालियों की ओर तेजी से बढ़ना बेहद आवश्यक हो गया है।”
राणा ने कहा कि बीज उद्योग तकनीकी नवाचारों के माध्यम से डीएसार को अपनाने में सक्षम बनाने के लिए अनुसंधान संस्थानों और किसानों के साथ सक्रिय रूप से काम कर रहा है।
उन्होंने कहा, “DSR के सामने खरपतवार प्रबंधन एक बड़ी चुनौती है। इसे ध्यान में रखते हुए बीज उद्योग ने सार्वजनिक अनुसंधान प्रणाली के सहयोग से सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों द्वारा विकसित हर्बिसाइड टॉलरेंस तकनीकों को पेश किया है, जिससे किसान हर्बिसाइड का उपयोग कर खरपतवार का अधिक प्रभावी ढंग से नियंत्रण कर सकते हैं। पिछले खरीफ सीजन के दौरान लगभग एक लाख एकड़ क्षेत्र में ड्रिल आधारित बुवाई के माध्यम से हर्बिसाइड टॉलरेंट धान की खेती की गई, जिसमें मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सबसे अधिक अपनाने की रिपोर्ट मिली,” उन्होंने कहा।
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार के आयुक्त डॉ. पी. के. सिंह ने कहा कि नई डीएसआर तकनीकों को अपनाने से कई राज्यों में उत्साहजनक परिणाम सामने आने लगे हैं। सिंह ने कहा कि नई बीज तकनीक और फसल सुरक्षा से जुड़े नवाचार भारतीय कृषि को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
उन्होंने कहा, “हम नए बायोलॉजिकल उत्पादों, उन्नत फसल सुरक्षा रसायन और अगली पीढ़ी की बीज तकनीक, जिसमें हाइब्रिड और जीन-एडिटेड किस्में शामिल हैं, पर काम कर रहे हैं। जब इन तकनीकों को बेहतर कृषि प्रबंधन पद्धतियों के साथ जोड़ा जाएगा, तो ये भारतीय कृषि के लिए वास्तविक गेम-चेंजर साबित हो सकती हैं।”
प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वैरायटीज एंड फार्मर्स राइट्स अथॉरिटटी (PPVFRA) के चेयरपर्सन, कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के पूर्व सचिव, और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्व महानिदेशक डॉ. त्रिलोचन महापात्र ने कहा, “डायरेक्ट सीडेड राइस में धान की खेती की दक्षता को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाने और किसानों की लागत घटाने की बड़ी क्षमता है। बीज प्रौद्योगिकी, कृषि विज्ञान (एग्रोनॉमी) और मशीनीकरण, डीएसआर में निरंतर नवाचार को अपनाने से जुड़ी चुनौतियों का समाधान करने तथा किसानों को इसके पूर्ण लाभ दिलाने के लिए आवश्यक होंगे।”
उन्होंने कहा, “हमारा अनुमान है कि कृषि-पर्यावरणीय परिस्थितियों के आधार पर भारत के 20–60% धान क्षेत्र को संभावित रूप से डीएसार पद्धति में बदला जा सकता है। भारत में लगभग 4.4 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में धान की खेती होती है, ऐसे में यदि इसको आंशिक रूप से भी अपनाया जाता है तो भूजल, पंपिंग सिंचाई में उपयोग होने वाली ऊर्जा और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में बड़े पैमाने पर बचत संभव है।”
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के पूर्व निदेशक डॉ. ए. के. सिंह ने कहा, “भारत की खाद्य सुरक्षा में धान की भूमिका केंद्रीय बनी रहेगी, लेकिन प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों का सामना करने के लिए उत्पादन प्रणालियों में बदलाव जरूरी है। डायरेक्ट सीडेड राइस धान उत्पादन प्रणालियों में सस्टेनेबल इंटेंसिफिकेशन का एक महत्वपूर्ण मार्ग प्रदान करता है, जिसे मजबूत अनुसंधान, बेहतर बीज किस्मों और प्रभावी विस्तार सेवाओं का समर्थन मिलना चाहिए।”
सम्मेलन में मध्य प्रदेश के प्रगतिशील किसान मेहत लाल बिसेन ने डायरेक्ट सीडेड राइस अपनाने के अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि इस पद्धति से उन्हें श्रम लागत और पानी की खपत कम करने में मदद मिली है, साथ ही धान की खेती की समग्र दक्षता भी बढ़ी है।

Join the RuralVoice whatsapp group















