जीडीपी ग्रोथ 7.4 फीसदी रहने का अनुमान, लेकिन कृषि में 3.1 फीसदी की कमजोर वृद्धि

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा बुधवार 7 जनवरी को जारी जीडीपी के पहले अग्रिम अनुमानों (First Advance Estimates) के अनुसार, वित्त वर्ष 2025–26 में कृषि और सहयोगी क्षेत्रों की वास्तविक वृद्धि दर 3.1% रहने का अनुमान है

जीडीपी ग्रोथ 7.4 फीसदी रहने का अनुमान, लेकिन कृषि में 3.1 फीसदी की कमजोर वृद्धि

वित्त वर्ष 2025-26 में भारतीय अर्थव्यवस्था के 7.4% की दर से बढ़ने का अनुमान है, जो वित्त वर्ष 2024–25 में दर्ज 6.5% की वृद्धि से बेहतर है। हालांकि, ताजा आधिकारिक आंकड़े एक बड़े असंतुलन को उजागर करते हैं। देश की लगभग आधी आबादी को रोजगार देने वाले कृषि एवं संबद्ध क्षेत्र की वृद्धि दर जीडीपी की वृद्धि दर से आधी से भी कम रहने का अनुमान लगाया गया है।  

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा बुधवार 7 जनवरी को जारी अर्थव्यवस्था के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) और ग्रॉस वैल्यू एडेड (जीवीए) के पहले अग्रिम अनुमानों (First Advance Estimates) के अनुसार, वित्त वर्ष 2025–26 में कृषि और संबद्ध गतिविधियों की वास्तविक वृद्धि दर 3.1% रहने का अनुमान है। जबकि समग्र जीडीपी का जीवीए की वृद्धि दर 7.3 फीसदी रहेगी। कृषि को छोड़कर अर्थव्यवस्था के सर्विस और मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्रों की ऊंची दर के चलते अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर ऊंची रहेगी। 

साल (2011–12) के स्थिर मूल्यों पर, वित्त वर्ष 2025–26 में वास्तविक जीडीपी 201.90 लाख करोड़ रुपए आंकी गई है, जो पिछले वित्त वर्ष (2024-25) में 187.97 लाख करोड़ रुपए थी। 

कृषि व सहयोगी क्षेत्र की कमजोर वृद्धि दर

हालांकि समग्र स्तर पर आर्थिक वृद्धि मजबूत दिखती है, लेकिन क्षेत्रवार आंकड़े एक बड़े अंतर की ओर इशारा करते हैं। कृषि, पशुपालन, वानिकी और मत्स्य पालन क्षेत्रों में 3.1 फीसदी की कमजोर वृद्धि दर का अनुमान है जो जनसंख्या वृद्धि से थोड़ा ही अधिक है और ग्रामीण आय में ठोस सुधार के लिए पर्याप्त नहीं है।

 सीएसओ के अनुमानों के मुताबिक बिजली और जल आपूर्ति जैसी उपयोगिता वाली सेवाओं में केवल 2.1 फीसदी की वृद्धि का अनुमान है, जबकि खनन क्षेत्र में हल्की गिरावट की संभावना जताई गई है।

इसके विपरीत, वित्तीय सेवाएं, रियल एस्टेट और पेशेवर सेवाएं, साथ ही लोक प्रशासन और रक्षा से जुड़ी सेवाओं के 9.9 फीसदी की दर से बढ़ने का अनुमान है। व्यापार, होटल, परिवहन और संचार से जुड़ी सेवाओं में 7.5 फीसदी की वृद्धि अनुमानित है। 

कृषि से बाहर रोजगार सृजन के लिए अहम विनिर्माण और निर्माण क्षेत्र, दोनों में सात फीसदी की वास्तविक वृद्धि अनुमानित है। हालांकि इससे गैर-कृषि रोजगार को कुछ सहारा मिलेगा, लेकिन यह कृषि क्षेत्र की सुस्ती की भरपाई के लिए पर्याप्त नहीं है।

ग्रामीण मांग पर चिंता बरकरार

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि कृषि की कमजोर वृद्धि दर इस बात का उजागर करती है  कि ग्रामीण खपत शहरी मांग के बराबर क्यों नहीं बढ़ पा रही है। निजी अंतिम उपभोग व्यय (PFCE), जो जीडीपी का आधे से अधिक हिस्सा है, वित्त वर्ष 2025–26 में सात फीसदी  की वास्तविक वृद्धि दर्ज करेगा हालांकि यह समग्र वृद्धि के अनुरूप है, लेकिन इसमें ग्रामीण–शहरी अंतर स्पष्ट रूप से छिपा हुआ है।

वित्त वर्ष 2025–26 में प्रति व्यक्ति वास्तविक जीडीपी Rs 1,42,119 आंकी गई है, जो पिछले साल की तुलना में 6.5 फीसदी अधिक है। वहीं प्रति व्यक्ति वास्तविक उपभोग में केवल 6 फीसदी से थोड़ा अधिक की वृद्धि का अनुमान है। विश्लेषकों का कहना है कि ये लाभ समान रूप से वितरित नहीं हैं और कृषि परिवारों की आय में बढ़ोतरी शहरी सेवा क्षेत्र के कर्मचारियों की तुलना में कहीं कम है।

बजट 2026–27 के लिए निहितार्थ

जीडीपी के ये अनुमान केंद्रीय बजट 2026–27 की तैयारियों पर गहरा असर डाल सकते हैं, खासकर कृषि और ग्रामीण व्यय को लेकर। जब कृषि की वृद्धि दर समग्र अर्थव्यवस्था की आधी से भी कम है, तब न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), उर्वरक सब्सिडी और ग्रामीण रोजगार योजनाओं के माध्यम से समर्थन बनाए रखने का दबाव बना रहने की संभावना है।

नई दिल्ली स्थित एक नीति संस्थान के एक अर्थशास्त्री ने कहा,“अगले बजट के लिए यह आंकड़े एक स्पष्ट दुविधा पैदा करते है। ग्रामीण और कृषि क्षेत्र का दबाव बना हुआ है, लेकिन पूंजीगत व्यय में कटौती करने से विकास कमजोर पड़ सकता है, जबकि सब्सिडी बढ़ाने से राजकोषीय घाटे के लक्ष्य प्रभावित होंगे।”

बाहरी और मूल्य जोखिम

यह अनुमान कृषि से जुड़े खर्चों के लिए संभावित जोखिमों की ओर भी इशारा करते हैं। वित्त वर्ष 2025–26 में आयात के 14.4 फीसदी  की वास्तविक दर से बढ़ने का अनुमान है, जो निर्यात में 6.4 फीसदी की वृद्धि से कहीं अधिक है। यदि वैश्विक जिंस कीमतों में उछाल आता है, तो इससे चालू खाता संतुलन पर दबाव बढ़ सकता है।

हालांकि महंगाई में कमी आई है, लेकिन अधिकारियों का कहना है कि खाद्य और ऊर्जा कीमतें अब भी मौसम संबंधी झटकों और वैश्विक बाजारों की अस्थिरता के प्रति संवेदनशील बनी हुई हैं, जिससे सब्सिडी का दबाव दोबारा बढ़ सकता है।

NSO ने कहा है कि प्रथम अग्रिम अनुमान नवंबर 2025 तक उपलब्ध आंशिक आंकड़ों पर आधारित हैं और जैसे-जैसे अधिक जानकारी उपलब्ध होगी, इनमें संशोधन किया जाएगा। द्वितीय अग्रिम अनुमान, साथ ही 2022–23 को नया आधार वर्ष मानते हुए संशोधित ऐतिहासिक जीडीपी आंकड़े, 27 फरवरी 2026 को जारी किए जाएंगे।

फिलहाल, वित्त वर्ष 2025–26 के ये आंकड़े एक जानी-पहचानी नीतिगत चुनौती को फिर से सामने लाते हैं: तेज गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था, जिसकी सबसे कमजोर कड़ी अब भी कृषि बनी हुई है। इससे ग्रामीण मांग कमजोर बनी रहती है और भारत के अगले बजट चक्र में राजकोषीय फैसलों को और जटिल बना देती है।

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