उर्वरक आयात पर बढ़ती भारत की निर्भरता: यूरिया आयात में 120 प्रतिशत उछाल, डीएपी 54 प्रतिशत बढ़ा
अप्रैल-नवंबर 2025 के दौरान डीएपी की 67 प्रतिशत और यूरिया की 27 प्रतिशत मांग आयात के जरिए पूरी की गई। इन आंकड़ों से आत्मनिर्भरता के दावों को झटका लगा है।
उर्वरकों के मामले में भारत की निर्भरता आयात पर बढ़ती जा रही है। फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FAI) की ओर से जारी आंकड़ों से यह उजागर हुआ है।
अप्रैल–नवंबर 2025 के दौरान यूरिया की बिक्री 2.3 प्रतिशत बढ़कर 2.54 करोड़ टन हो गई। जबकि घरेलू यूरिया उत्पादन में 3.7 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई और यह घटकर 1.97 करोड़ टन रह गया। इस अंतर को पाटने के लिए दोगुना से अधिक यूरिया आयात करना पड़ा जो 120 फीसदी की वृद्धि के साथ 71.7 लाख टन तक पहुंच गया। यूरिया आयात पिछले वर्ष की समान अवधि में 32.6 लाख टन था। यूरिया की करीब 27 फीसदी खपत आयात से पूरी की जा रही है।
गत नवंबर महीने में यूरिया की बिक्री 37.5 लाख टन रही, जो पिछले साल के मुकाबले 4.8 प्रतिशत अधिक है। इस दौरान आयात 68.4 फीसदी बढ़कर 13.1 लाख टन हो गया। इस तरह खरीफ और रबी सीजन के दौरान यूरिया की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए आयात पर निर्भरता बढ़ी है।
डीएपी उत्पादन में गिरावट, आयात में वृद्धि
एफएआई के आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल–नवंबर 2025 के दौरान प्रमुख उर्वरक डाई-अमोनियम फॉस्फेट (DAP) की बिक्री 71.2 लाख टन रही, जो पिछले वर्ष की तुलना में 1 प्रतिशत कम है। इस दौरान घरेलू डीएपी उत्पादन 5.2 प्रतिशत घटकर 26.8 लाख टन रह गया, जबकि आयात 54.4 प्रतिशत बढ़कर 55.4 लाख टन हो गया। नतीजतन, डीएपी की कुल उपलब्धता में आयात की हिस्सेदारी बढ़कर करीब 67 प्रतिशत हो गई, जो एक साल पहले 56 प्रतिशत थी।
ये आंकड़े दर्शाते हैं कि यूरिया और डीएपी के घरेलू उत्पादन में कमी के कारण भारत की निर्भरता आयातित उर्वरकों पर बढ़ गई है। खाद्य सुरक्षा और आत्मनिर्भरता के लिहाज से यह अच्छी स्थिति नहीं है। डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट को देखते हुए यह और भी चिंताजनक है। साथ ही, उन नीतियों पर भी सवाल खड़े करती है जिनके जरिए उर्वरकों की खपत घटाने और आयात कम करने के दावे किए जाते रहे हैं।
कॉम्प्लेक्स उर्वरकों का उत्पादन बढ़ा
अप्रैल–नवंबर 2025 के दौरान एनपी और एनपीके कॉम्प्लेक्स उर्वरकों की बिक्री 103.8 लाख टन रही और इसमें 0.1 प्रतिशत की मामूली वृद्धि दर्ज की गई। इन संतुलित उर्वरकों का उत्पादन 13.8 प्रतिशत बढ़कर 81.5 लाख टन हो गया, जबकि आयात लगभग दोगुना होकर 98.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ 27.2 लाख टन तक पहुंच गया।
एमओपी और एसएसपी की बिक्री बढ़ी
म्यूरेट ऑफ पोटाश (MOP) की बिक्री इस अवधि में 8.6 प्रतिशत बढ़कर 15.5 लाख टन हो गई, जो आयात में गिरावट के बावजूद स्थिर मांग को दर्शाती है।
फॉस्फेटिक उर्वरक सिंगल सुपर फॉस्फेट (SSP) का उत्पादन 9.5 प्रतिशत बढ़कर 39.7 लाख टन हो गया, जबकि बिक्री में 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ यह 41.6 लाख टन तक पहुंच गई।
माना जा रहा है कि डीएपी की उपलब्धता को लेकर समस्याओं के कारण सिंगल सुपर फॉस्फेट (SSP) की बिक्री में बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
FAI ने कहा कि अप्रैल–नवंबर 2025 के आंकड़े एक परिपक्व आपूर्ति शृंखला को दर्शाते हैं, जहां घरेलू उत्पादन और आयात एक-दूसरे के पूरक हैं। इस दौरान यूरिया आयात में 120 प्रतिशत से अधिक, डीएपी आयात में 54 प्रतिशत और कॉम्प्लेक्स उर्वरकों के आयात में करीब 99 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इससे स्पष्ट होता है कि भारत के उर्वरक क्षेत्र ने वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को अपनी मूल योजना का हिस्सा बना लिया है।
FAI के चेयरमैन एस. शंकरसुब्रमण्यम ने कहा कि समन्वित योजना के जरिए बिक्री में वृद्धि हासिल की गई है। खासकर यूरिया और डीएपी के मामले में आयात पर काफी निर्भरता यह रेखांकित करती है कि किसानों के लिए निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए आपूर्ति शृंखला प्रबंधन और दूरदर्शी आयात नीति कितनी महत्वपूर्ण है।
FAI के महानिदेशक डॉ. सुरेश कुमार चौधरी ने कहा, “इन आंकड़ों में दो बातें खास तौर पर सामने आती हैं। पहली, नाइट्रोजन और फॉस्फेट पोषक तत्वों के लिए आयात-आधारित आपूर्ति प्रबंधन की ओर संरचनात्मक बदलाव। दूसरी, एसएसपी जैसे स्वदेशी फॉस्फेटिक उर्वरकों का मजबूत प्रदर्शन, जिनकी बिक्री में 15 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यह एक संतुलित दृष्टिकोण का संकेत है, जहां हम योजनाबद्ध आयात के जरिए महत्वपूर्ण पोषक तत्व सुनिश्चित कर रहे हैं और साथ ही घरेलू फॉस्फेटिक उत्पादन को भी मजबूत कर रहे हैं।”

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