उत्तर प्रदेश का चीनी उत्पादन एक दशक में सबसे कम, आगामी सीजन में बढ़ सकता है गन्ना आपूर्ति का संकट

आगामी सीजन में भी चीनी मिलों के सामने गन्ना आपूर्ति का गंभीर संकट खड़ा हो सकता है। कमजोर मानसून की आशंका और गन्ने की खेती से जुड़ी समस्याओं ने बढ़ाई गन्ना अर्थव्यवस्था की चुनौतियां।

उत्तर प्रदेश का चीनी उत्पादन एक दशक में सबसे कम, आगामी सीजन में बढ़ सकता है गन्ना आपूर्ति का संकट

देश के प्रमुख चीनी उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश में गन्ने की खेती और शुगरकेन इकॉनमी की चुनौतियां लगातार बढ़ती जा रही हैं। चालू चीनी वर्ष 2025-26 में 15 मई तक प्रदेश की चीनी मिलों में पिछले वर्ष के मुकाबले 73 लाख टन कम गन्ने की पेराई हुई और राज्य के चीनी उत्पादन में 2.75 लाख टन की गिरावट दर्ज की गई।

गन्ने से चीनी रिकवरी में बढ़ोतरी के बावजूद उत्तर प्रदेश में चीनी उत्पादन घटकर 89.70 लाख टन रह गया, जो पिछले एक दशक का सबसे निचला स्तर है। वर्ष 2019-20 में हुए रिकॉर्ड 126 लाख टन चीनी उत्पादन की तुलना में यूपी के चीनी उत्पादन में करीब 30 प्रतिशत की गिरावट आ चुकी है।

उत्तर प्रदेश में चीनी उत्पादन की स्थिति

स्रोत: upcane.gov.in

राष्ट्रीय स्तर पर वर्ष 2025-26 में देश का कुल चीनी उत्पादन 274.65 लाख टन रहा, जो वार्षिक घरेलू खपत से भी कम है। चीनी उत्पादन में इस गिरावट ने देश से चीनी निर्यात की संभावनाओं पर विराम लगा दिया है। साथ ही, भविष्य में एथेनॉल उत्पादन को लेकर भी आशंकाएं पैदा हो रही हैं।

गन्ने की फसल पर रेड रॉट जैसी बीमारियों और नई किस्मों के विकास में अपेक्षित सफलता न मिलने के कारण अकेले उत्तर प्रदेश में किसानों को अनुमानित 3,000 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा। दूसरी ओर, गन्ने की कमी के चलते चीनी मिलें अपनी पूरी क्षमता से नहीं चल सकीं और कई मिलों को समय से पहले पेराई सत्र समाप्त करना पड़ा। यह समूचे चीनी उद्योग के सामने उत्पन्न चुनौती का संकेत है, जो आगामी चीनी सीजन (अक्टूबर-सितंबर) में गंभीर संकट का रूप ले सकती है।

इस वर्ष संभावित मजबूत अल नीनो और कमजोर मानसून की आशंकाओं ने गन्ने की खेती की चुनौतियां और बढ़ा दी हैं। हालांकि, कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू खरीफ सीजन में 19 मई तक देशभर में 57.31 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में गन्ने की बुवाई हो चुकी थी, जो पिछले वर्ष के 56.64 लाख हेक्टेयर क्षेत्र की तुलना में एक प्रतिशत से कुछ अधिक है।

लेकिन चीनी उद्योग से जुड़े सूत्रों के अनुसार, किसानों ने उत्तर प्रदेश में इस साल गन्ने का रकबा घटा दिया है। इसके पीछे खेती की बढ़ती लागत, रोग व कीटों के प्रकोप, श्रमिकों की कमी और घटती पैदावार जैसे कारण हैं। इन परिस्थितियों के चलते किसानों का रुझान गन्ने की बजाय अन्य फसलों और एग्रो-फॉरेस्ट्री की ओर बढ़ रहा है। यदि कमजोर मानसून के कारण सूखे जैसे हालात बने रहते हैं, तो प्रदेश में गन्ना उत्पादन पिछले वर्ष से भी कम रह सकता है।

तराई किसान यूनियन के अध्यक्ष तजिंदर सिंह विर्क ने रूरल वॉयस को बताया कि गन्ने की खेती में बढ़ती लागत और घटती आमदनी के कारण किसान अन्य फसलों या एग्रो-फॉरेस्ट्री का रुख कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि तीन-चार वर्ष पहले जहां प्रति बीघा 80-90 क्विंटल तक उत्पादन होता था, वहीं अब 50 क्विंटल उत्पादन हासिल करना भी मुश्किल हो गया है। गन्ने की लोकप्रिय किस्म Co-0238 का प्रभावी विकल्प उपलब्ध न होने के कारण किसानों को पैदावार और आय दोनों में नुकसान उठाना पड़ रहा है।

विर्क का मानना है कि यह प्रदेश के गन्ना अनुसंधान से जुड़े सरकारी विभागों और शोध संस्थानों पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है कि गन्ना अर्थव्यवस्था पर मंडरा रहे संकट के बावजूद किसानों को Co-0238 जैसी सफल किस्म का विकल्प नहीं मिल पाया है, जबकि किसान कई वर्षों से इस समस्या का सामना कर रहे हैं।

महाराष्ट्र में सूखे का खतरा

इस वर्ष 4 जून को केरल पहुंचा मानसून अपेक्षाकृत धीमी गति से आगे बढ़ा है। बीच में लगभग दो सप्ताह तक इसकी प्रगति थमी रही, जिसके कारण 23 जून तक देश में सामान्य से 42 प्रतिशत और मध्य भारत में सामान्य से 64 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई। 

गन्ना उत्पादक राज्य महाराष्ट्र में भी सामान्य से 76 प्रतिशत कम वर्षा हुई है। जून में मानसून की धीमी प्रगति और सामान्य से कम बारिश गन्ने की फसल को नुकसान पहुंचा सकती है। गन्ने की अच्छी वृद्धि के लिए मानसून के चार प्रमुख महीनों में पर्याप्त नमी और सिंचाई आवश्यक होती है। यदि अगले कुछ सप्ताह तक वर्षा की कमी बनी रहती है, तो इसका प्रतिकूल असर उत्पादन पर पड़ सकता है। साथ ही, किसानों की सिंचाई लागत भी बढ़ेगी क्योंकि उन्हें अतिरिक्त संसाधनों पर खर्च करना पड़ेगा। सरकार ने खाड़ी युद्ध के चलते कच्चे तेल की कीमतों में इजाफे के बाद डीजल की कीमतों मे सात रुपये प्रति लीटर से अधिक की बढ़ोतरी की है जिसका सीधा असर गन्ना उत्पादन लागत में बढोतरी के रूप में किसानों पर पड़ेगा।

बढ़ी उद्योग की चिंता

गन्ने की फसल में उत्पादकता संबंधी समस्याओं ने चीनी उद्योग की चिंताएं बढ़ा दी हैं। उद्योग के दो प्रमुख संगठन, इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) और नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज (NFCSF), ने केंद्र सरकार से कोयंबटूर स्थित आईसीएआर के शुगरकेन ब्रीडिंग इंस्टीट्यूट (SBI) में गन्ना अनुसंधान के लिए एक सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (CoE) स्थापित करने की मांग की है। हालांकि, इस प्रस्ताव पर अभी तक कोई निर्णय नहीं लिया गया है उद्योग का कहना है कि गन्ने की बेहतर उत्पादकता वाली नई प्रजातियों की ब्रीडिंग की कमी एक बड़ा संकट लेकर आई है जो उद्योग और किसान दोनो के लिए मुश्किलें बढ़ा रहा है। 

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