हाइड्रोजेल से कम पानी में भी होगी बेहतर खेती

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) पूसा नई दिल्ली के कृषि वैज्ञनिकों ने एक नई तकनीक इजाद की है, जिसको हाइड्रोजेल के नाम से जाना जाता हैं । वह कहते है कि, अगर किसान इस नई तकनीक का खेती में इस्तेमाल करता है तो कम पानी में फसलों से अधिक पैदावार ले सकते हैं ।

हाइड्रोजेल से  कम पानी में भी होगी बेहतर खेती

हर साल कम होता बारिश घटता भूमिगत जल स्तर  प्रकृति के चेतावनी को समझें तो देश में जिस तरह से जल संकट बढ़ रहा है। इससे आज के वक्त में देश के कई राज्यों में फसलों की सिंचाई के लिए जल की कमी के कारण खेती को काफी नुकसान हो रहा है, यह बात हम यूं ही नहीं कह रहे हैं। पंजाब, हरियाणा,और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई ज़िले, जहां कभी हरियाली लोगों का मन मोह लेती थी आज डार्क ज़ोन की श्रेणी में शामिल हो चुके हैं,जहां धरती से पानी निकालना मुश्किल है। अगर इसी तरह चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब आने वाले कुछ सालों में पानी की कमी के कारण खेती करना मुश्किल हो जाएगा ।

केन्द्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान के क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र, लखनऊ के प्रिंसिपल साइंटिस्ट डॉ संजय अरोरा  का कहना है कि अपने देश में जितनी खेती होती है उसमें से 60 प्रतिशत खेती ऐसे एरिया में की जाती है जहां पर पानी की बेहद किल्लत है। इसमें से 30 प्रतिशत जगहों पर तो पर्याप्त बारिश ही नहीं होती है। इसीलिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद  (आईसीएआर) के तरफ से  ऐसे आधुनिक तरीक़ों पर अब ज्यादा ज़ोर दिया जा रहा है, जिनसे पानी की हर बूंद से फसलों से ज्यादा से ज्यादा पैदावार लिया जा सके। इसलिए खेती में इस तरह की तकनीकों को अपनाया जाए,जिससे कम पानी में फसलों से अधिकतम उपज लिया जा सके। जिसके लिए आईसीएआर कृषि वैज्ञानिक नये नये शोध कर रहे हैं, जिससे कि भविष्य में गहराते जलसंकट में भी खेती पर कोई प्रभाव न पड़े। डॉ अरोरा  ने बताया भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) पूसा नई दिल्ली के कृषि वैज्ञनिकों ने एक नई तकनीक इजाद की  है, जिसको हाइड्रोजेल के नाम से जाना जाता हैं । वह कहते है कि, अगर किसान इस  नई तकनीक का खेती में  इस्तेमाल करता है तो कम पानी में फसलों से अधिक पैदावार ले सकते हैं ।

प्राकृतिक पॉलिमर है हाइड्रोजेल

 डा संजय अरोरा के अनुसार दरअसल हाइड्रोजेल की मदद से बारिश के पानी को ज्यादा समय तक खेतों में संग्रहित रखा जा सकता है और इसका इस्तेमाल उस वक्त किया जाता है जब फसलों को पानी की जरूरत होती है।  उन्होंने बताया की वैज्ञानिकों ने हाइड्रोजेल का विकास ग्वार फली से किया है जो पूरी तरह से प्राकृतिक पॉलिमर है जिसमें पानी को सोख लेनेकी क्षमता होती है मगर यह पानी में घुलता नहीं है। इसके आलावा हाइड्रोजेल बायोडिग्रेडेबल होता है, जिसके काऱण प्रदूषण का भी खतरा नहीं रहता है । जब आप अपने खेतों में हाइड्रोजेल का इस्तेमाल करते हैं तो हाइड्रोजेल के कण सिंचाई या बारिश के वक्त अपनी क्षमता से कई गुना अधिक पानी सोख लेते हैं, और जब खेतों में बारिश और सिंचाई की कमी के कारण खेतों में नमी की कमी हो जाती है तब हाइड्रोजेल के कण से पानी रिस कर खेत में नमी बनाए रखता है । और अगर खेतों में पुन: बारिश और सिंचाई होती है,तो हाइड्रोजेल के कण दुबारा पानी को सोख लेते हैं और जरूरत के मुताबिक फिर उसमें से पानी रिसकर खेत में नमी बनाए रखता  है।

कम खर्च में जल संकट से निपटरा 

 डॉ संजय अरोरा का कहना कि अगर कोई किसान हाइड्रोजेल का इस्तेमाल करना चाहता है तो एक एकड़ खेत के लिए महज एक किलोग्राम हाइड्रोजेल के ग्रेन्यूल की जरूरत होती है, जिसकी कीमत लगभग 1000 से 1200 रूपये होती है। उन्होंने बताया कि भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित पूसा हाइड्रोजेल बारीक कंकड़ों जैसा होता है। इसे फसल की बुवाई  के समय ही बीज के साथ खेतों में मिलाकर डाला जाता है। जब फसल की पहली सिंचाई की जाती है तो पूसा हाइड्रोजेल पानी को सोखकर 10 मिनट में ही फूल जाता है और जैल में बदल जाता है। जैल में बदला यह हाइड्रोजेल गर्मी या तापमान से सूखता नहीं है। क्योकि यह पौधों की जड़ों से चिपका रहता है,इसलिए पौधा अपनी जरूरत के हिसाब से जड़ों के माध्यम से इस हाइड्रोजेल का पानी सोखता रहता है।  खेतों में हाइड्रोजेल का एक बार इस्तेमाल करने के बाद यह खेत में दो से लेकर पांच साल तक काम करता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के वैज्ञानिकों ने धान  मक्का, गेहूं,आलू, सोयाबीन, सरसों, प्याज, टमाटर,फूलगोभी, गाजर, गन्ने, हल्दी, जूट समेत अन्य फसलों में हाइड्रोजेल का इस्तेमाल करके पाया है कि इसके इस्तेमाल से फसल की उपज तो बढ़ती है साथ ही पर्यावरण और फसलों को किसी तरह का नुकसान नहीं होता है।

हाइड्रोजेल खेती में पानी के बेहतर इस्तेमाल के लिए अच्छी तकनीक है क्योंकि भारत में पानी की जितनी खपत होती है,उसका 85 प्रतिशत हिस्सा खेती में इस्तेमाल होता है। जिस तरह धीरे धीरे पानी की किल्लत हो रही है अगर किसान इस तकनीक का इस्तेमाल करते हैं तो काफी हद तक खेती में आ रही पानी की कमी की समस्या से निजात पाया जा सकता है। पानी की कमी वाले क्षेत्रो में भी फसलों से अच्छी उपज ले सकते है।