अमेरिकी मध्यावधि चुनाव में ट्रंप को झटका, भारत के साथ व्यापार वार्ता पर बढ़ सकता है दबाव
अमेरिकी मध्यावधि चुनावों (US midterm election) में डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump loses) की राजनीतिक स्थिति कमजोर हुई है। इससे वे भारत पर जल्द व्यापार समझौता करने का दबाव बना सकते हैं। थिंकटैंक जीटीआरआई (GTRI) ने चेतावनी दी है कि प्रस्तावित समझौता एकतरफा रह सकता है, भारत पर टैरिफ का जोखिम बढ़ा सकता है।
अमेरिका में 2026 के मध्यावधि चुनावों (US midterm election) में डेमोक्रेटिक पार्टी की व्यापक जीत (Democrats win) से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। इन चुनावों के बाद डेमोक्रेट्स के पास सीनेट (ऊपरी सदन) और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स (निचला सदन), दोनों का नियंत्रण होगा। इससे ट्रंप के घरेलू एजेंडे पर तो अंकुश लग सकता है, लेकिन भारत के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) को जल्द अंतिम रूप देने के लिए उन पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में ट्रंप भी भारत पर दबाव बना सकते हैं। नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) की एक रिपोर्ट में यह आकलन किया गया है।
चुनाव परिणामों से वाशिंगटन में राजनीतिक शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव आया है। दो साल तक रिपब्लिकन पार्टी के नियंत्रण के बाद अब डेमोक्रेट्स प्रशासन की नीतियों को चुनौती देने की स्थिति में आ गए हैं। हालांकि, रिपोर्ट के अनुसार कांग्रेस में सत्ता परिवर्तन से अमेरिका की व्यापक संरक्षणवादी व्यापार नीति में बदलाव की संभावना कम है।
रिपब्लिकन गढ़ों में डेमोक्रेट्स की ऐतिहासिक बढ़त
डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत ने उन राज्यों में भी राजनीतिक समीकरण बदल दिए, जहां पारंपरिक रूप से रिपब्लिकन पार्टी का दबदबा रहा है। हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की प्रतिस्पर्धी सीटों पर भी पार्टी की बढ़त निचले सदन में निर्णायक बदलाव का संकेत दे रही है।
ये जीत उन राज्यों में विशेष रूप से उल्लेखनीय रही, जहां 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप को मजबूत समर्थन मिला था। कंसास ने लगभग एक सदी बाद, महामंदी के दौर के बाद, अपना पहला डेमोक्रेटिक सीनेटर चुना है। साउथ कैरोलिना में डेमोक्रेट्स ने ट्रंप की पसंदीदा सीनेट उम्मीदवार डार्लिन ग्राहम को हरा दिया। डार्लिन ग्राहम रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर भारी-भरकम शुल्क लगाने का बिल लाने वाले दिवंगत अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम की बहन हैं। सदन में पारित होने के बाद ट्रंप इस बिल पर दस्तखत कर चुके हैं, हालांकि इस पर अभी तक अमल नहीं हुआ है।
टेक्सास में सबसे बड़े राजनीतिक उलटफेरों में से एक देखने को मिला। डेमोक्रेट्स ने कई दशकों से जारी हार का सिलसिला तोड़ते हुए सीनेट की सीट जीती और तीन बार के रिपब्लिकन गवर्नर ग्रेग एबॉट को पराजित किया। 2024 में ट्रंप ने इस राज्य में बड़े अंतर से जीत हासिल की थी।
मेन में रिपब्लिकन सीनेटर सुसान कॉलिन्स को भी हार का सामना करना पड़ा। ट्रंप से दूरी बनाने की कोशिशों के बावजूद उनकी तीन दशक लंबी राजनीतिक पारी समाप्त हो गई। चुनाव परिणामों ने राष्ट्रपति के व्यक्तिगत समर्थन से मैदान में उतरे उम्मीदवारों की कमजोरियों को भी उजागर किया।
हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के 20 प्रतिस्पर्धी मुकाबलों में डेमोक्रेट्स ने सभी में जीत हासिल की। रिपब्लिकन पार्टी की ओर से चुनावी संभावनाएं बेहतर बनाने के लिए निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं में बदलाव की अभूतपूर्व कोशिश भी काफी हद तक विफल रही। डेमोक्रेट्स ने लक्षित सीटों में से अधिकांश पर अपना कब्जा बरकरार रखा।
इन नतीजों के पीछे महंगाई, जीवनयापन की बढ़ती लागत, ईरान के साथ युद्ध की अलोकप्रियता और ट्रंप की आर्थिक नीतियों, खासकर टैरिफ को लेकर मतदाताओं की नाराजगी प्रमुख रही। टैरिफ का बोझ अंततः अमेरिकी जनता को चुकाना पड़ा है। डेमोक्रेट्स ने आरोप लगाया कि प्रशासन की नीतियों से महंगाई बढ़ी है और आम अमेरिकियों की तुलना में अमीर वर्ग के हितों को प्राथमिकता दी गई है।
एक एग्जिट पोल में आधे मतदाताओं ने मध्यावधि चुनावों को ट्रंप के खिलाफ नाराजगी जताने का अवसर माना, जबकि 70% मतदाताओं ने राष्ट्रपति पर कांग्रेस के अधिक प्रभावी नियंत्रण और संतुलन की आवश्यकता जताई। नए डेमोक्रेटिक नियंत्रण वाले कांग्रेस से ट्रंप प्रशासन पर अंकुश लगने की उम्मीद है। सीनेट राष्ट्रपति के नामांकित उम्मीदवारों, यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट की संभावित नियुक्तियों को भी रोक सकती है।
व्यापार समझौते पर दबाव बढ़ा सकते हैं ट्रंप
चुनावी झटके के बावजूद अमेरिका की व्यापक व्यापार नीति में बड़े बदलाव की संभावना नहीं है। GTRI के अनुसार, डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन दोनों ही आर्थिक राष्ट्रवाद, घरेलू मैन्युफैक्चरिंग और संरक्षणवादी तौर-तरीको के समर्थक हैं। रिपोर्ट का मानना है कि ट्रंप अब भारत के साथ जल्द व्यापार समझौता करने की कोशिश कर सकते हैं, ताकि घरेलू राजनीतिक मुश्किलों के बीच अपनी बातचीत की क्षमता और आर्थिक उपलब्धि का प्रदर्शन कर सकें।
प्रस्तावित भारत-अमेरिका व्यापार समझौते का ढांचा अब भी विवादास्पद है। 6 फरवरी के संयुक्त बयान के तहत भारत से अमेरिकी औद्योगिक और कृषि उत्पादों की व्यापक श्रेणी पर आयात शुल्क घटाने या समाप्त करने की अपेक्षा की गई है। हालांकि भारत के खिलाफ अमेरिका अपने नियमित मोस्ट फेवर्ड नेशन (एमएफएन) आयात शुल्क बरकरार रखेगा। भारत से पांच वर्षों में 500 अरब डॉलर के अमेरिकी सामान खरीदने और कुछ आर्थिक एवं सुरक्षा नीतियों को वाशिंगटन के अनुरूप बनाने की प्रतिबद्धता भी मांगी गई है।
अमेरिका ने पहले भारतीय वस्तुओं पर अतिरिक्त रेसिप्रोकल टैरिफ को 25% से घटाकर 18% करने का संकेत दिया था। हालांकि, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 20 फरवरी को लर्निंग रिसोर्सेज इंक. बनाम ट्रंप मामले में इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (आईईईपीए) के तहत लगाए गए रेसिप्रोकल टैरिफ को रद्द कर दिया। इससे अमेरिका का एक प्रमुख वार्ता हथियार समाप्त हो गया।
जीटीआरआई के अनुसार, इस दबाव के कमजोर पड़ने के बाद ट्रंप व्यापारिक साझेदारों पर दबाव बनाए रखने के लिए सेक्शन 232 और सेक्शन 301 सहित अन्य कार्यकारी शक्तियों का अधिक इस्तेमाल कर सकते हैं। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि प्रस्तावित समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद भी भारत को अमेरिका की ओर से 15% से 18% तक अतिरिक्त टैरिफ का सामना करना पड़ सकता है। इससे भारत के लिए नीतिगत और कानूनी जोखिम भी पैदा हो सकते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के अन्य सदस्यों को समान रियायत दिए बिना अमेरिकी वस्तुओं को प्राथमिकता देना भारत की एमएफएन प्रतिबद्धताओं का उल्लंघन हो सकता है। यदि अमेरिका पारस्परिक टैरिफ रियायतें नहीं देता है, तो यह समझौता डब्ल्यूटीओ नियमों के तहत वैध मुक्त व्यापार समझौते की श्रेणी में भी नहीं आ सकता।
जीटीआरआई का मानना है कि नई दिल्ली को पारस्परिक रियायतों की स्पष्ट और बाध्यकारी शर्तों, डब्ल्यूटीओ नियमों के अनुपालन तथा ऊर्जा सुरक्षा और विकास प्राथमिकताओं की रक्षा के लिए पर्याप्त नीतिगत स्वतंत्रता पर जोर देना चाहिए। भारत को अपने दीर्घकालिक आर्थिक हितों के अनुरूप समझौता सुनिश्चित करने पर जोर देना चाहिए।

Join the RuralVoice whatsapp group



















