तीसरे साल से पहले ही क्यों दम तोड़ने लगती हैं छोटी खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां?

कृषि और खाद्य प्रसंस्करण से जुड़े 40 व्यवसायों की सरकारी मॉडल परियोजना रिपोर्ट बताती हैं कि आधे से भी कम इकाइयों में पहले साल से मुनाफे का अनुमान है। कार्यशील पूंजी की कमी, पुराने मूल्य अनुमान, शुरुआती वर्षों में कम कमाई और खरीदारों की अनिश्चितता छोटी इकाइयों को संकट में डाल सकती है।

तीसरे साल से पहले ही क्यों दम तोड़ने लगती हैं छोटी खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां?
AI image

ग्रामीण क्षेत्र में पहली बार उद्यम शुरू करने वाले किसी व्यक्ति से पूछिए कि छोटी खाद्य प्रसंस्करण इकाई लगाने में उसे किस बात की सबसे ज्यादा चिंता है, तो जवाब अक्सर मशीन के बारे में होता है - कौन-सा ब्रांड खरीदें, उसकी क्षमता कितनी हो और उसकी कीमत क्या होगी। लेकिन जब ऐसी छोटी इकाइयां शुरुआती दो-तीन वर्षों में मुश्किलों का सामना करती हैं, तो इसकी वजह शायद ही कभी मशीन होती है। परेशानी आमतौर पर उन बातों से पैदा होती है, जिनका जिक्र परियोजना रिपोर्ट में नहीं होता - इकाई चलाने के लिए जरूरी नकदी, कच्चे माल की कीमत और सबसे अहम सवाल कि उत्पाद खरीदेगा कौन?

उत्कृषि में हमने पीएमएफएमई, खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (KVIC), नाबार्ड, राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड/मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर (NHB/MIDH) और मैनेज (MANAGE) की ओर से कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण से जुड़े 40 व्यवसायों के लिए तैयार सरकारी मॉडल परियोजना रिपोर्टों का अध्ययन किया है। इनके आधार पर हमने सरल भाषा में मार्गदर्शिकाएं तैयार की हैं। ये मॉडल व्यवसाय शुरू करने के लिए उपयोगी आधार जरूर हैं, लेकिन बारीकी से देखने पर वे यह भी बताते हैं कि इतनी सारी छोटी इकाइयों को शुरुआती वर्षों में संघर्ष क्यों करना पड़ता है। 

सरकारी मॉडल क्या बताते हैं?

हमने जिन 40 मॉडलों की जांच की, उनमें से केवल 16 में पहले साल से मुनाफा दिखाया गया है। सात मॉडल में पहले साल घाटा दिखा, लेकिन बाद के वर्षों में मुनाफे में आ गए। तेरह मॉडलों में मुनाफे के ऐसे आंकड़े नहीं हैं, जिन पर भरोसा किया जा सके। इसकी एक प्रमुख वजह कीमतों से जुड़ी पुरानी धारणाएं हैं। वहीं, चार मॉडलों में तीसरे साल भी घाटा दिखाया गया है। इनमें प्याज को सुखाकर प्रसंस्कृत करने और शहद प्रसंस्करण की इकाइयां शामिल हैं।

दूसरे शब्दों में कहें तो कागज पर भी इन व्यवसायों में से आधे से कम पहले साल से कमाई करते दिखाई देते हैं। इसका मतलब इन योजनाओं का विरोध करना नहीं है। असल बात यह है कि प्रचार सामग्री देखकर निवेश करने के बजाय पहले आंकड़ों को समझा जाए।

पहली समस्या: पहले साल कम कमाई

कई व्यवसाय लंबे समय में लाभदायक हो सकते हैं, लेकिन उनकी शुरुआत धीमी होती है। अक्सर उद्यमी इसके लिए तैयार नहीं रहते। उदाहरण के लिए, सालाना 150 टन क्षमता वाली इडली-डोसा मिश्रण इकाई लगाने में लगभग 10.5 लाख रुपये खर्च होते हैं। पीएमएफएमई योजना के तहत इसमें करीब 2.8 लाख रुपये की सब्सिडी मिल सकती है। इसके मॉडल में पहले साल का मुनाफा केवल 29,000 रुपये दिखाया गया है, जो तीसरे साल तक बढ़कर लगभग 5.2 लाख रुपये हो जाता है। यानी कारोबार चल सकता है, लेकिन पहले साल इतनी कम कमाई होती है कि भुगतान में देरी या उत्पाद की किसी खेप के खराब होने से भी आर्थिक संकट पैदा हो सकता है।

कुछ व्यवसायों की शुरुआत घाटे से होती है। प्रतिदिन 2,000 लीटर क्षमता वाले दूध ठंडा रखने वाले (चिलिंग) केंद्र की स्थापना में लगभग 11.8 लाख रुपये खर्च होते हैं। कृषि अवसंरचना कोष (AHIDF) के तहत इस पर तीन प्रतिशत ब्याज सहायता मिल सकती है, लेकिन पूंजीगत सब्सिडी नहीं मिलती। इसके मॉडल में पहले साल लगभग 2.5 लाख रुपये का घाटा दिखाया गया है, जबकि तीसरे साल करीब 1.4 लाख रुपये का मुनाफा होने का अनुमान है। जिस परिवार ने अपनी संपत्ति गिरवी रखकर कर्ज लिया हो, उसके लिए शुरुआती साल का इतना घाटा सहना आसान नहीं है।

दूसरी समस्या: कार्यशील पूंजी का बजट नहीं बनाना

मशीनरी दिखाई देती है, लेकिन कारोबार चलाने के लिए जरूरी कार्यशील पूंजी अक्सर नजरअंदाज कर दी जाती है। पीएमएफएमई के तहत प्रतिदिन 400 किलोग्राम मिर्च पाउडर बनाने वाली इकाई के मॉडल में कुल परियोजना लागत लगभग 14.7 लाख रुपये है। इसमें से करीब 4.7 लाख रुपये यानी लगभग 32 प्रतिशत राशि मशीनरी पर खर्च नहीं होती। यह पैसा मिर्च, पैकेजिंग सामग्री, मजदूरी, बिजली और दुकानदारों को उधार पर माल देने जैसी जरूरतों में लगता है।

यदि परियोजना रिपोर्ट में इस खर्च को शामिल नहीं किया जाता, तो इकाई बनकर तैयार तो हो जाती है, लेकिन उसका संचालन मुश्किल हो जाता है। कच्चा माल खरीदने के लिए पैसा न होने पर मशीनें खाली खड़ी रहती हैं।

बैंक कार्यशील पूंजी की जरूरत का अलग से आकलन करते हैं। इसलिए इसे शुरुआत से ही विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) में शामिल करना चाहिए, न कि मशीनरी खरीदने के बाद इसके लिए पैसे तलाशने चाहिए।

तीसरी समस्या: कीमतों के पुराने अनुमान

मॉडल परियोजना रिपोर्ट किसी खास समय पर तैयार की जाती हैं, जबकि बाजार में कीमतें बदलती रहती हैं। तली हुई प्याज और फलों के गूदे जैसे कई उत्पादों के लिए इन मॉडलों में बिक्री मूल्य मौजूदा बाजार की तुलना में काफी अधिक दिखाई दिए। इसलिए हमने उनके मुनाफे के अनुमानों को भरोसेमंद नहीं माना।

बेकरी से जुड़ी एक मॉडल रिपोर्ट में उत्पादन क्षमता बताने के बजाय सालाना बिक्री लगभग 27.7 लाख रुपये दिखाई गई है। इससे गणनाओं की जांच करना मुश्किल हो जाता है।

जो उद्यमी अपने जिले की कीमतों की जांच किए बिना किसी मॉडल की नकल कर लेता है, उसकी बैंक परियोजना रिपोर्ट कागज पर लाभदायक दिख सकती है, जबकि वास्तविक कारोबार घाटे में जा सकता है।

इसका समाधान सरल है, लेकिन अक्सर इस पर अमल नहीं किया जाता। उद्यमी को स्थानीय मंडी जाकर कच्चे माल और तैयार उत्पाद की मौजूदा कीमतों का पता लगाना चाहिए और उन्हीं के आधार पर परियोजना की पूरी गणना दोबारा तैयार करनी चाहिए।

चौथी समस्या: उत्पादन से पहले खरीदार तय न करना

प्रतिदिन 150 किलोग्राम आलू या केले के चिप्स बनाने वाली इकाई लगाने में लगभग 14.6 लाख रुपये खर्च होते हैं। इसके मॉडल में पहले साल करीब 3.8 लाख रुपये का मुनाफा दिखाया गया है। लेकिन यह मुनाफा दो ऐसी बातों पर निर्भर करता है, जो फैक्टरी के नियंत्रण से बाहर हैं - आलू या केले की कीमत और दुकानों से लगातार मिलने वाले ऑर्डर।

बाजरे जैसे मोटे अनाज के आटे के मामले में भी यही समस्या है, क्योंकि उसकी भंडारण अवधि कम होती है। यदि कोई इकाई दो-तीन पक्के खरीदार तय किए बिना उत्पादन शुरू कर देती है, तो उसे अपना माल कम कीमत पर बेचना पड़ सकता है या स्टॉक फेंकना पड़ सकता है।

कौन-सी योजना क्या देती है, यह समझना जरूरी

शुरुआती मुश्किलों की एक वजह सरकारी योजनाओं को सही ढंग से न समझना भी है। पीएमएफएमई योजना खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों के लिए ऋण से जुड़ी 35 प्रतिशत पूंजीगत सब्सिडी देती है, जिसकी अधिकतम सीमा 10 लाख रुपये है। प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP) के तहत श्रेणी और स्थान के अनुसार 15 से 35 प्रतिशत तक सब्सिडी मिल सकती है।

इसके विपरीत, कृषि अवसंरचना कोष (AIF) के तहत कोई पूंजीगत सब्सिडी नहीं मिलती। यह दो करोड़ रुपये तक के ऋण पर सालाना तीन प्रतिशत ब्याज सहायता और ऋण गारंटी की सुविधा देता है।

इन सभी योजनाओं में सब्सिडी बैंक ऋण से जुड़ी होती है और आमतौर पर इकाई का संचालन शुरू होने के बाद उपलब्ध होती है। उद्यमी सामान्यतः परियोजना लागत का करीब 10 प्रतिशत स्वयं लगाता है, जबकि शेष राशि बैंक ऋण के रूप में देता है। बाद में सब्सिडी को ऋण खाते में समायोजित किया जाता है। जो आवेदक निर्माण शुरू होने से पहले ही सब्सिडी की रकम हाथ में मिलने की उम्मीद करते हैं, उनका काम अक्सर बीच में अटक जाता है।

आवेदन करने से पहले यह भी जांचना जरूरी है कि संबंधित योजना फिलहाल खुली है या नहीं। पीएमएफएमई की मौजूदा अवधि सितंबर 2026 तक थी और इसके विस्तार का प्रस्ताव रखा गया है। इसलिए आवेदकों को आवेदन से पहले पीएमएफएमई पोर्टल पर ताजा स्थिति की पुष्टि करनी चाहिए। 

ऋण लेने से पहले तीन जरूरी जांच

  1. कीमतों की जांच: मॉडल में दिए गए आंकड़ों को अपने जिले में मौजूदा कच्चे माल और तैयार उत्पाद की कीमतों के आधार पर दोबारा तैयार करें। यदि स्थानीय कीमतों पर मुनाफा नहीं बचता, तो किसी दूसरे व्यवसाय या उत्पादन क्षमता पर विचार करें।
  2. नकदी की जांच: सुनिश्चित करें कि विस्तृत परियोजना रिपोर्ट में कार्यशील पूंजी का पूरा प्रावधान हो। शुरुआती साल में कारोबार धीमा रहने की स्थिति से निपटने के लिए पर्याप्त नकदी रखें। यह भी आकलन करें कि सब्सिडी ऋण खाते में समायोजित होने में कितने महीने लग सकते हैं।
  3. खरीदारों की जांच: मशीनरी का ऑर्डर देने से पहले कम से कम दो-तीन खरीदारों से संपर्क करें। इनमें खुदरा विक्रेता, होटल, व्यापारी या किसान उत्पादक संगठन (FPO) शामिल हो सकते हैं। उनसे पहली खेप खरीदने के लिए लिखित सहमति लेने की कोशिश करें।

वास्तविकता को समझना जरूरी

ऋण और सब्सिडी मंजूर करने का फैसला बैंक और संबंधित संस्थाएं करती हैं। कोई सलाहकार ऋण मंजूर होने की गारंटी नहीं दे सकता। वह इसकी तैयारी में मदद करता है।

उद्यमी के नियंत्रण में तीन अहम बातें हैं - सही व्यवसाय का चुनाव, आंकड़ों का वास्तविक आकलन और उत्पादन शुरू होने से पहले खरीदारों की व्यवस्था। सरकारी मॉडल परियोजना रिपोर्ट इस तैयारी के लिए अच्छा शुरुआती आधार हैं, लेकिन वे वास्तविक बाजार अध्ययन और व्यावसायिक योजना का विकल्प नहीं हो सकतीं।

(मालविका लाल, उत्कृषि (एल्ड्यू डिजिटल प्राइवेट लिमिटेड, पुणे) एग्रीटेक स्टार्टअप की सह-संस्थापक हैं। यह स्टार्टअप RKVY-RAFTAAR के तहत पूसा कृषि (ICAR-IARI) में इनक्यूबेट हुआ है।)

 

Subscribe Rural Voice Newsletter