सोलर परियोजनाओं की आड़ में खेजड़ी की कटाई के खिलाफ राजस्थान में आंदोलन
पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि एक ओर वैज्ञानिक बार-बार छंटाई से बचने की सलाह दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सोलर प्लांटों और अन्य परियोजनाओं के लिए खेजड़ी की अंधाधुंध कटाई की जा रही है। पर्यावरण कार्यकर्ताओं के अनुसार सौर ऊर्जा परियोजनाओं के नाम पर राजस्थान में बीते एक दशक में लाखों पेड़ काटे गए हैं, जिनमें खेजड़ी जैसे परंपरागत और जीवनदायी वृक्ष बड़ी संख्या में शामिल हैं
बीकानेर संभाग मुख्यालय के हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर, चूरू, नागौर, जोधपुर, पाली, बाड़मेर और जैसलमेर सहित राज्य के कई ज़िलों में खेजड़ी बचाओ आंदोलन के समर्थन में लगातार धरने और प्रदर्शन हो रहे हैं। खेजड़ी पर मंडरा रहे संकट को लेकर लोगों में गहरा आक्रोश है। लगभग तीन दशक पहले शुरू हुए कीट प्रकोप के कारण खेजड़ी के हज़ारों पेड़ सूख चुके हैं और बीते कई वर्षों से सोलर प्लांट लगाने के नाम पर इसकी अंधाधुंध कटाई की जा रही है।
आंदोलन का नेतृत्व कर रही पर्यावरण संघर्ष समिति के संयोजक रामगोपाल बिश्नोई का कहना है कि खेजड़ी इस समय गंभीर संकट में है। पहले लंबे समय तक चले कीट प्रकोप ने हज़ारों पेड़ों को नष्ट किया और अब सोलर प्लांट स्थापित करने के लिए ज़मीन खाली करने के नाम पर खेजड़ी पर कुल्हाड़ी चलाई जा रही है। इसी वजह से लाखों पेड़ काटे जा चुके हैं। राज्य का कल्पवृक्ष कहलाने वाली खेजड़ी आज अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है और इसे बचाना समय की सबसे बड़ी ज़रूरत है।
खेजड़ी की कटाई पर रोक लगाने की मांग लंबे समय से उठाई जा रही थी, लेकिन लगातार अनदेखी के चलते लोगों का गुस्सा अब सड़कों पर फूट पड़ा है। धरना-प्रदर्शन पहले भी होते रहे हैं, लेकिन फरवरी की शुरुआत के साथ ही इस आंदोलन ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। 2 फरवरी को बीकानेर के पॉलीटेक्निक कॉलेज परिसर में हज़ारों लोगों ने महापड़ाव डालकर साफ़ ऐलान कर दिया कि जब तक खेजड़ी के संरक्षण के लिए सख़्त कानून नहीं बनाया जाएगा, आंदोलन जारी रहेगा।
3 फरवरी को महापड़ाव स्थल पर सैकड़ों लोगों ने आमरण अनशन शुरू कर दिया। पहले चरण में 363 लोग अनशन पर बैठे, जिनकी संख्या बाद में बढ़कर 450 तक पहुँच गई। इस अनशन में 18 वर्ष के युवाओं से लेकर 80 वर्ष तक के बुज़ुर्ग शामिल थे। तीसरे दिन आमरण अनशन पर बैठे 17 लोगों की तबीयत बिगड़ गई, जिनमें से तीन को गंभीर हालत में पीबीएम अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। हालात इतने बिगड़ गए कि प्रशासन को अनशन स्थल पर 75-75 बेड के दो अस्थायी अस्पताल स्थापित करने पड़े।

5 फरवरी की रात प्रदेश के उद्योग मंत्री के.के. बिश्नोई अनशन स्थल पर पहुँचे और यह कहते हुए अनशन समाप्त करने का आग्रह किया कि सरकार ने बीकानेर और जोधपुर संभाग में खेजड़ी की कटाई पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। हालांकि आंदोलनकारियों ने यह कहते हुए मंत्री के आग्रह को अस्वीकार कर दिया कि जब तक पूरे राज्य में खेजड़ी की कटाई पर रोक नहीं लगाई जाती, तब तक बेमियादी अनशन जारी रहेगा। बाद में आधी रात को आमरण अनशन तो समाप्त कर दिया गया, लेकिन यह घोषणा भी की गई कि जब तक खेजड़ी की कटाई रोकने के लिए सख़्त कानून नहीं बनता, क्रमिक अनशन जारी रहेगा। इसके बाद से बीकानेर में क्रमिक अनशन लगातार जारी है और बड़ी संख्या में लोग जुट रहे हैं। साथ ही राज्य के विभिन्न ज़िलों में धरना-प्रदर्शन भी जारी हैं। राज्य विधानसभा और लोकसभा में भी यह मुद्दा उठ चुका है।
राजस्थान के किसानों के लिए खेजड़ी केवल राज्य वृक्ष नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। सामुदायिक सहभागिता के चलते नागौर, बीकानेर, अजमेर, चूरू, बाड़मेर, जैसलमेर, जोधपुर, पाली, सिरोही, जालौर, हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर, जयपुर, करौली, सीकर और झुंझुनू जैसे ज़िलों में आज भी लाखों खेजड़ी के पेड़ मौजूद हैं। यह पशुओं के लिए चारे का प्रमुख स्रोत है, घरों में जलाऊ लकड़ी देती है, सांगरी जैसी सब्ज़ी के रूप में भोजन का हिस्सा है और खेतों के लिए प्राकृतिक खाद का काम करती है।
हालांकि लगभग तीन दशक पहले हुए कीटों के गंभीर हमले ने इसके अस्तित्व पर गहरा संकट खड़ा कर दिया था। यह संकट पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन किसानों और सरकारी विभागों के संयुक्त प्रयासों से खेजड़ी को अब तक बचाए रखा जा सका है।
जोधपुर स्थित शुष्क वन अनुसंधान संस्थान (एएफआरआई) के वन संरक्षण विभाग के वैज्ञानिकों ने वर्ष 2010 में इस समस्या की जड़ तक पहुँचने के लिए सात वर्षों का विस्तृत शोध शुरू किया था। शोध का उद्देश्य खेजड़ी के सूखने और मरने के कारणों की पहचान करना और उनके व्यावहारिक समाधान सुझाना था। अध्ययन में यह सामने आया कि खेजड़ी के क्षरण के पीछे दो प्रमुख जैविक कारक हैं—एक जड़ सड़न पैदा करने वाला कवक गैनोडर्मा ल्यूसिडम और दूसरा जड़ों में छेद करने वाला कीट एकैंथोफोरस सेराटिकॉर्निस। इसके अलावा कुछ अजैविक कारण भी सामने आए, जिनमें भूजल स्तर का लगातार गिरना और ट्रैक्टरों से की जाने वाली गहरी जुताई शामिल है, जो पेड़ों की जड़ों को नुकसान पहुँचाती है।
शोध पूरा होने के बाद वैज्ञानिकों ने खेजड़ी के संरक्षण को लेकर किसानों के लिए दिशा-निर्देश जारी किए। इनमें प्रमुख सलाह यह थी कि खेजड़ी की छंटाई हर वर्ष करने के बजाय दो वर्ष में एक बार की जाए, ताकि पेड़ों पर अनावश्यक दबाव न पड़े और उनकी जीवन-क्षमता बनी रहे। लेकिन पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि एक ओर वैज्ञानिक बार-बार छंटाई से बचने की सलाह दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सोलर प्लांटों और अन्य परियोजनाओं के लिए खेजड़ी की अंधाधुंध कटाई की जा रही है।
पर्यावरण कार्यकर्ताओं के अनुसार सौर ऊर्जा परियोजनाओं के नाम पर राजस्थान में बीते एक दशक में लाखों पेड़ काटे गए हैं, जिनमें खेजड़ी जैसे परंपरागत और जीवनदायी वृक्ष बड़ी संख्या में शामिल हैं। खेजड़ी को राजस्थान में ‘कल्पवृक्ष’ का दर्जा प्राप्त है, क्योंकि यह मरुस्थलीय पारिस्थितिकी को संतुलित रखने के साथ-साथ ग्रामीण आजीविका का आधार भी है। जन्म से मृत्यु तक के सामाजिक और सांस्कृतिक संस्कारों में इसकी मौजूदगी अहम मानी जाती है।
एक ओर बीकानेर स्थित आईसीएआर-केंद्रीय शुष्क बागवानी संस्थान ने ‘थार शोभा खेजड़ी’ जैसी नई किस्में विकसित की हैं, वहीं दूसरी ओर इसकी कटाई लगातार चिंता का विषय बनी हुई है। बीकानेर स्थित महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय के पर्यावरण विभाग के प्रोफेसर अनिल छंगाणी द्वारा किए गए अध्ययन में यह तथ्य सामने आया है कि केवल सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने के लिए पिछले दस वर्षों में अकेले बीकानेर ज़िले में ही लगभग दो लाख पेड़ काटे जा चुके हैं। इनमें खेजड़ी के अलावा बेर, केर, रोहिड़ा और बबूल जैसे स्थानीय वृक्ष भी शामिल हैं।
अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि सौर संयंत्रों के आसपास का तापमान औसतन चार से पाँच डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाता है, जिससे स्थानीय जलवायु पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। पेड़ों की कटाई से कीट-पतंगों, मधुमक्खियों, पक्षियों और अन्य जीवों के प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैं। साथ ही गोंद और पशु-चारे जैसे वन-आधारित संसाधनों की उपलब्धता घट रही है, जिसका सीधा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। इसके अलावा सौर संयंत्रों को साफ़ और ठंडा रखने के लिए बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है, जबकि राजस्थान पहले से ही गंभीर जल संकट का सामना कर रहा है।
आंदोलन से जुड़े बिश्नोई समाज के वरिष्ठ नेता परसराम बिश्नोई का कहना है कि जब तक पूरे राज्य में खेजड़ी की कटाई पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया जाएगा, तब तक कोई समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। उनका कहना है कि जो भी समझौता होगा, वह जनता के बीच और सार्वजनिक मंच पर होगा। संपूर्ण राज्य में खेजड़ी की कटाई पर रोक लगाना ही आंदोलन की एकमात्र मांग है और इसके पूरा होने तक संघर्ष जारी रहेगा।
उन्होंने स्पष्ट किया कि आंदोलन सोलर प्लांट या औद्योगिक विकास के खिलाफ नहीं है। “हम विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन खेजड़ी नहीं कटनी चाहिए। उद्योग चाहे जितने लगें, पर खेजड़ी की बलि नहीं दी जा सकती। खेजड़ी न काटने के सौ कारण हैं, लेकिन उसे काटने का एक भी कारण नहीं हो सकता।” परसराम बिश्नोई का सुझाव है कि यदि किसी स्थान पर सोलर प्लांट लगाने में पेड़ आड़े आ रहे हैं तो परियोजना के लिए अतिरिक्त भूमि ली जानी चाहिए। अगर सौ बीघा ज़मीन की ज़रूरत है और उसमें पेड़ हैं, तो 110 बीघा ले ली जाए। इससे सोलर प्लांट भी लग जाएगा और पेड़ भी बच जाएंगे।
पर्यावरण संघर्ष समिति के संयोजक रामगोपाल बिश्नोई बताते हैं कि सरकार ने बातचीत के लिए संतों को आमंत्रित किया है। यदि सरकार पूरे राज्य में खेजड़ी की कटाई पर प्रतिबंध लगाने की बात मान लेती है, तो समाधान संभव है। अन्यथा फाल्गुन माह में मुकाम में लगने वाले मेले में आंदोलन की आगे की दिशा पर अंतिम फैसला लिया जाएगा। इस मेले में विभिन्न राज्यों से दस लाख से अधिक लोगों के आने की संभावना है।

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