चीनी और इथेनॉल उत्पादन पर अल नीनो का खतरा, लगातार तीसरे साल खपत से कम रह सकता है चीनी उत्पादन
अगले दो साल देश के चीनी और एथेनॉल सेक्टर के लिए नई चुनौतीपूर्ण रहेंगे। कमजोर मानसून और गन्ना खेती की समस्याओं के कारण 2026-27 में देश का कुल चीनी उत्पादन लगातार तीसरे साल घरेलू खपत से कम रह सकता है।
गन्ने की खेती की समस्याओं के चलते देश में चीनी और एथेनॉल उत्पादन का गणित गड़बड़ा गया है। लगातार तीसरे साल देश में चीनी उत्पादन की संभावना कमजोर पड़ रही हैं। इस साल कमजोर मानसून, गन्ना पैदावार में गिरावट और किसानों का रुझान अन्य फसलों की ओर बढ़ने के कारण आगामी चीनी सीजन (2026-27) में देश का कुल चीनी उत्पादन (इथेनॉल के अलावा) लगभग 280-285 लाख टन पर अटक सकता है, जो देश में चीनी की सालाना 285-290 लाख टन की खपत से कम होगा।
रूरल वॉयस को उद्योग सूत्रों के मिली जानकारी के अनुसार, चालू चीनी सीजन 2025-26 की समाप्ति पर 30 सितंबर, 2026 को देश में चीनी का बकाया स्टॉक एक दशक के सबसे निचले स्तर 35 लाख टन पर आ जाएगा, जो केवल डेढ़ महीने की खपत के बराबर है। जबकि अक्तूबर में नये सीजन की शुरुआत में शुगर स्टॉक के लिए लगभग तीन महीने की औसत खपत को आधार माना जाता है।
अगर कमजोर मानसून की आशंका सही साबित हुई तो आगामी सीजन 2027-28 सीजन में भी चीनी उत्पादन को झटका लग सकता है। गन्ने की फसल को जून से सितंबर के दौरान कई बार सिंचाई की आवश्यकता होती है। महाराष्ट्र और कर्नाटक में गन्ने के बुवाई भी इसी दौरान होती है।
चीनी उत्पादन में गिरावट के मद्देनजर मई में केंद्र सरकार ने चीनी के निर्यात पर 30 सितंबर 2026 तक रोक लगा दी थी। जबकि सरकार ने 7 नवंबर, 2025 को 15 लाख टन और फिर 13 फरवरी 2026 को 5 लाख टन चीनी निर्यात की अनुमति दी थी। ईरान युद्ध के चलते भारत से इस साल लगभग 8 लाख टन चीनी का निर्यात ही हो पाया। अगर सरकार द्वारा दी गई अनुमति की पूरी 20 लाख चीनी निर्यात हो जाती, चीनी का क्लोजिंग स्टॉक एक महीने की खपत भी कम बचता, जिससे इसी साल चीनी आयात की नौबत आ सकती थी।
कम उत्पादन के बावजूद चीनी निर्यात
मौजूदा स्थिति देश में चीनी उत्पादन के अनुमानों और निर्यात नीति पर भी बड़े सवाल खड़े करती है। चालू शुगर सीजन में कुल चीनी उत्पादन लगभग 278 लाख टन रहेगा, जबकि शुरुआती अनुमानों में उद्योग संगठन इस्मा ने कुल चीनी उत्पादन 309.5 लाख टन रहने का अनुमान लगाया गया था। जबकि इथेनॉल के लिए 34 लाख टन चीनी डायवर्जन का अनुमान था। इस तरह सकल चीनी उत्पादन 343.5 लाख टन आंका गया था।
देश में पर्याप्त चीनी उत्पादन के अनुमानों के आधार पर ही केंद्र सरकार ने 7 नवंबर, 2025 को शुगर सीजन 2025-26 के दौरान 15 लाख टन चीनी निर्यात की अनुमति दी थी। इसके बाद फरवरी में जब देश में चीनी उत्पादन की स्थिति लगभग साफ हो चुकी थी, तब भी 5 लाख टन अतिरिक्त निर्यात कोटा देने की घोषणा कर दी। लेकिन मई में अचानक यू-टर्न लेते हुए सरकार ने चीनी निर्यात पर 30 सितंबर 2026 तक पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। चीनी उत्पादन अनुमानों में गड़बड़ी के चलते ही निर्यात नीति में इस प्रकार की अनिश्चितता रही।
हाल के वर्षों में चीनी उत्पादन में गिरावट के साथ ही इथेनॉल के लिए चीनी का उपयोग भी घटा है। वर्ष 2024-25 में इथेनॉल उत्पादन के लिए 35 लाख टन चीनी का डायवर्जन हुआ था, जो वर्ष 2025-26 में घटकर लगभग 29 लाख रह गया। एक ओर जहां सरकार पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण को 20 फीसदी से अधिक बढ़ाने पर जोर दे रही है, वहीं गन्ना पैदावार में गिरावट के चलते इस मोर्चे पर भी चुनौती खड़ी हो गई है।
आगामी सीजन 2026-27 की स्थिति
गन्ने की खेती और चीनी उद्योग की चुनौतियां आगामी शुगर सीजन 2026-27 में बनी रह सकती हैं। गन्ने की बुवाई के क्षेत्र, फसल की स्थिति और मानसून को देखते हुए उद्योग का अनुमान है कि अगले साल देश में चीनी का सकल (ग्रास) उत्पादन 310 लाख टन रहेगा। जिसमें से करीब 25 लाख टन चीनी का इथेनॉल के लिए डायवर्जन होने से चीनी का कुल (नेट) उत्पादन 285 लाख टन के आसपास रह सकता है।
देश में चीनी उत्पादन को दो जोन में बांटकर देखा जाता है। उत्तरी जोन और दक्षिण-पश्चिम जोन। उत्तरी जोन में उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और उत्तराखंड शामिल हैं। वहीं दक्षिण-पश्चिम जोन में महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और तमिलनाडु को शामिल किया जाता है।
कमजोर मानसून ने बढ़ाई मुश्किल
चीनी उत्पादन के लिहाज से सबसे बड़ी मुश्किल दक्षिण-पश्चिम जोन से आने वाली है, क्योंकि इसका अधिकांश गन्ना उत्पादन क्षेत्र बारिश पर निर्भर करता है और कमजोर मानसून का प्रतिकूल असर गन्ने की फसल पर पड़ेगा। महाराष्ट्र में जुलाई से सितंबर के बीच गन्ने की बुवाई होती है। कमजोर बारिश के चलते बुवाई प्रभावित होने का असर 2027-28 के चीनी उत्पादन पर भी पड़ेगा।
उत्तरी जोन में बारिश की कमी से गन्ना उत्पादन बहुत अधिक प्रभावित होने की आशंका नहीं है, क्योंकि उत्तरी राज्यों में सिंचाई सुविधाएं बेहतर हैं। हालांकि, कम बारिश से खेती की लागत बढ़ जाएगी। देश के प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्य में उत्तर प्रदेश में किसान गन्ने की कम पैदावार, अधिक लागत और श्रमिकों की समस्या के कारण दूसरी फसलों का रुख कर रहे हैं। इसके पीछे बेहतर किस्में उपलब्ध न हो पाना बड़ी वजह है।
यूपी में अलग संकट
यूपी में किसान गन्ने की खेती में रेड रॉट जैसी बीमारियों से जूझ रहे हैं। सरकार किसानों को अधिक पैदावार वाली रोगमुक्त किस्मों का विकल्प किसानों को देने में नाकाम रही है।
शामली जिले के प्रगतिशील किसान उमेश कुमार का कहना है कि सरकार द्वारा गन्ने की रिसर्च और नई किस्मों के लिए खर्च में कमी का असर दिखने लगा है। कम पैदावार के कारण किसान प्लांटेशन, बागवानी और अन्य फसलों का रुख करने लगे हैं।
इस बीच, गुड़ व खांडसारी उत्पादों की मांग बढ़ने से इन इकाइयों की तरफ भी गन्ने का डायवर्जन बढ़ा है। ये इकाइयों कई बार चीनी मिलों के मुकाबले अधिक भुगतान कर किसानों से गन्ना खरीदती हैं, जिससे चीनी मिलों के सामने गन्ना आपूर्ति का संकट खड़ा हो गया है। चालू सीजन में उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों में लगभग 73 लाख टन कम गन्ने की पेराई हुई। यही कारण है कि चीनी उद्योग कोल्हू और खांडसारी इकाइयों पर नियमों का शिकंजा कसवाना चाहता है।
ऐसे में अगर बारिश में कमी के चलते गन्ने की पैदावार पर असर पड़ा तो चीनी मिलों के सामने गन्ना आपूर्ति की समस्या बढ़ेगी। कुल मिलाकर कमजोर मानसून, गन्ने की पैदावार में गिरावट और नीतिगत खामियों के चलते चीनी और एथेनॉल उत्पादन के लिए अगले दो सीजन चुनौतीपूर्ण रहेंगे। आशंका तो यहां तक है कि देश को चीनी के निर्यात से कहीं आयात करने की नौबत न आ जाए!

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