ICAR प्रमुख एम.एल. जाट ने खाद्य सुरक्षा और जलवायु अनुकूल कृषि के लिए संतुलित बायोटेक रेगुलेटरी व्यवस्था की वकालत की

आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट ने कृषि में आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी के सुरक्षित उपयोग को बढ़ावा देने के लिए विज्ञान आधारित और संतुलित नियामक ढांचे की आवश्यकता बताई। टीएएएस, आईसीएआर और एफएसआईआई की संयुक्त गोलमेज बैठक में जैव-प्रौद्योगिकी फसलों के लिए तेज, पारदर्शी और समयबद्ध अनुमोदन प्रक्रिया की सिफारिश की गई।

ICAR प्रमुख एम.एल. जाट ने खाद्य सुरक्षा और जलवायु अनुकूल कृषि के लिए संतुलित बायोटेक रेगुलेटरी व्यवस्था की वकालत की

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट ने कृषि जैव-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में रेगुलेटरी सुधारों की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी के सुरक्षित उपयोग को बढ़ावा देने के लिए एक संतुलित और विज्ञान-आधारित रेगुलेटरी व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए।

ट्रस्ट फॉर एडवांसमेंट ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (TAAS), आईसीएआर और फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (FSII) द्वारा आयोजित जैव-प्रौद्योगिकी फसलों पर उच्चस्तरीय गोलमेज बैठक को संबोधित करते हुए जाट ने कहा कि खाद्य एवं पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने, जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने और टिकाऊ कृषि विकास के लिए आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।

डॉ. जाट, जो कृषि मंत्रालय के कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (डीएआरई) के सचिव भी हैं, ने विज्ञान आधारित और साक्ष्य आधारित कृषि नवाचार को आगे बढ़ाने के लिए आईसीएआर की प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने कहा, "ऐसी संतुलित नियामक व्यवस्था की आवश्यकता है, जो खाद्य एवं पोषण सुरक्षा, जलवायु अनुकूलता और टिकाऊ कृषि विकास के लक्ष्य हासिल करने के लिए आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकियों के सुरक्षित उपयोग को सक्षम बनाए।"

इस गोलमेज बैठक में 80 से अधिक प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया, जिनमें नीति-निर्माता, कृषि वैज्ञानिक, नियामक संस्थाओं के प्रतिनिधि, उद्योग जगत के विशेषज्ञ, अर्थशास्त्री और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ शामिल थे। बैठक की सह-अध्यक्षता TAAS के अध्यक्ष आर.एस. परोदा और रासी सीड्स के संस्थापक अध्यक्ष एम. रामासामी ने की।

एक बयान में कृषि मंत्रालय ने कहा कि भारत में ट्रांसजेनिक फसलों के लिए पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 तथा नियम, 1989 के तहत बहु-स्तरीय नियामक ढांचा पहले से मौजूद है। इसमें संस्थागत जैव-सुरक्षा समितियां, जैव प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत रिव्यू कमेटी ऑन जेनेटिक मैनिपुलेशन (आरसीजीएम), पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमेटी (जीईएसी), भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई), आईसीएआर तथा अन्य संबंधित मंत्रालय और राज्य सरकारें शामिल हैं।

हालांकि, मंत्रालय ने कहा कि जैव-प्रौद्योगिकी, विशेषकर क्रिस्पर-कैस (CRISPR-Cas) आधारित तकनीक में तेजी से हो रही प्रगति, वैश्विक नियामक व्यवस्थाओं में बदलाव तथा जलवायु अनुकूल और टिकाऊ कृषि की बढ़ती आवश्यकता को देखते हुए मौजूदा नियामक ढांचे के आधुनिकीकरण की जरूरत है।

"फिर भी, क्रिस्पर-कैस आधारित प्रणालियों सहित जैव-प्रौद्योगिकी में तेजी से हो रही प्रगति, वैश्विक नियामक व्यवस्थाओं में बदलाव तथा जलवायु अनुकूल और टिकाऊ कृषि की बढ़ती आवश्यकता भारत में जैव-प्रौद्योगिकी फसलों के रेगुलेटरी ढांचे की समीक्षा और आधुनिकीकरण की मांग करती है।"

बैठक का उद्देश्य जैव-प्रौद्योगिकी फसलों के लिए अधिक प्रभावी और समयबद्ध अनुमोदन प्रक्रिया का रोडमैप तैयार करना था। उद्घाटन सत्र में TAAS सचिव भागमल ने जलवायु परिवर्तन, खाद्य एवं पोषण सुरक्षा, टिकाऊ कृषि तथा जैव-प्रौद्योगिकी में हो रही प्रगति को देखते हुए भारत के नियामक ढांचे के आधुनिकीकरण की आवश्यकता पर जोर दिया। इस अवसर पर साउथ एशिया बायोटेक्नोलॉजी सेंटर के अध्यक्ष सी.डी. मायी, आईएसएएए इंक. की कार्यकारी निदेशक रोडोरा रोमेरो-अल्डेमिटा तथा पीजी इकोनॉमिक्स लिमिटेड (यूके) के कृषि अर्थशास्त्री ग्राहम ब्रूक्स ने भी अपने विचार रखे।

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