India-EU Trade Deal: यूरोपीय संघ के कड़े कीटनाशक नियम भारतीय कृषि निर्यातकों के लिए क्यों बन सकते हैं खतरा
यूरोपीय संघ की कीटनाशक अवशेषों की अत्यंत सख्त सीमा कई मामलों में डिफॉल्ट रूप से 0.01 पीपीएम तक घट जाती है। India-EU FTA (मुक्त व्यापार समझौता) लागू होने की तैयारी के बीच यह भारतीय कृषि निर्यात के लिए बड़ी बाधा बन सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को आयातित खाद्य उत्पादों पर समान स्तर की जांच व्यवस्था लागू करनी चाहिए, खेत से बंदरगाह तक ट्रेसबिलिटी विकसित करनी चाहिए, प्रयोगशालाओं को मजबूत बनाना चाहिए और डब्ल्यूटीओ जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर गैर-वैज्ञानिक व्यापार बाधाओं को सक्रिय रूप से चुनौती देनी चाहिए।
जैसे-जैसे भारत, यूरोपीय संघ (ईयू) के साथ अपने मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को लागू करने के करीब पहुंच रहा है, खाद्य सुरक्षा मानक दोनों पक्षों के बीच सबसे संवेदनशील व्यापारिक मुद्दों में उभर रहे हैं। समझौते में रेगुलेटरी सहयोग को मजबूत बनाने का वादा तो है, लेकिन ईयू उन कीटनाशकों के लिए इम्पोर्ट टॉलरेंस समाप्त करना चाहता है, जिन्हें उसने अपने यहां उपयोग के लिए मंजूरी देना बंद कर दिया है। इसका परिणाम यह होगा कि अनेक आयातित कृषि उत्पादों पर स्वतः 0.01 पार्ट्स पर मिलियन (पीपीएम) की डिफॉल्ट अधिकतम अवशेष सीमा (एमआरएल) लागू हो जाएगी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त कोडेक्स एलिमेंटेरियस मानक वैज्ञानिक आधार पर इससे कहीं अधिक सीमा की अनुमति देते हैं। 0.01 पीपीएम की यह सीमा 100 टन खाद्य पदार्थ में केवल एक ग्राम कीटनाशक अवशेष के बराबर होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह मानक अत्यधिक कठोर है और भारतीय निर्यातकों के लिए अनुपालन की गंभीर चुनौतियां खड़ी कर सकता है।
यूरोप में भारतीय कृषि निर्यात को लगातार कीटनाशक अवशेष, बैक्टीरिया एवं फफूंदजनित संक्रमण तथा प्रमाणन एवं लेबलिंग संबंधी कमियों के कारण अस्वीकृति का सामना करना पड़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठन (यूएनआईडीओ) के अनुसार, इन अस्वीकृतियों में 81 प्रतिशत मामले कीटनाशकों से इतर कारणों से जुड़े हैं, जबकि 19 प्रतिशत मामलों में कीटनाशक अवशेष जिम्मेदार हैं। दूसरी ओर, भारत में आयातित खाद्य उत्पादों की जांच अपेक्षाकृत कम होती है। थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) की एक रिपोर्ट के अनुसार, यदि भारत अपनी खाद्य सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत नहीं करता है और मानकों का निष्पक्ष अनुपालन सुनिश्चित नहीं करता है, तो एफटीए के बाद यूरोपीय खाद्य उत्पादों को भारतीय बाजार में आसान पहुंच मिल सकती है, जबकि भारतीय निर्यातकों को यूरोप में सख्त रेगुलेटरी बाधाओं का सामना करना पड़ेगा।
खाद्य सुरक्षा और व्यापार
खाद्य सुरक्षा संबंधी नियम उपभोक्ताओं की सुरक्षा के लिए आवश्यक हैं। फल, सब्जियां, मसाले और अनाज में फसलों की सुरक्षा के लिए उपयोग किए गए कीटनाशकों के कम अवशेष स्वाभाविक रूप से मौजूद हो सकते हैं, जबकि प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों में संरक्षक और अन्य योजक पाए जा सकते हैं। सरकारें यह सुनिश्चित करने के लिए अधिकतम अवशेष सीमा (एमआरएल) और अन्य मानक तय करती हैं कि इन पदार्थों का स्तर वैज्ञानिक रूप से सुरक्षित सीमा के भीतर रहे।
हालांकि, कई देश अब खाद्य सुरक्षा नियमों का उपयोग व्यापार नीति के एक साधन के रूप में भी करने लगे हैं। आयात शुल्क बढ़ाने के बजाय वे कीटनाशक अवशेषों की अत्यंत सख्त सीमाएं, कठोर प्रमाणन आवश्यकताएं और जटिल निरीक्षण प्रक्रियाएं लागू करते हैं, जिससे भारत जैसे देशों के लिए निर्यात करना कठिन हो जाता है। ये नियम अक्सर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त कोडेक्स मानकों से कहीं अधिक कठोर होते हैं, जिससे निर्यातकों की लागत काफी बढ़ जाती है।
दबाव में भारतीय निर्यात
विदेशी बाजारों में भारतीय निर्यातकों पर खाद्य सुरक्षा संबंधी कार्रवाई लगातार बढ़ रही है। वर्ष 2026 के मध्य में जापान ने फ्यूमिगेशन और कीट नियंत्रण प्रक्रियाओं में कमियां पाए जाने के बाद भारत से अल्फांसो और केसर आम आयात को निलंबित कर दिया। यूरोपीय संघ, यूनाइटेड किंगडम और अन्य विकसित देशों ने भी मिर्च, जीरा, हल्दी, तिल, चावल उत्पादों, समुद्री खाद्य, फल, सब्जियां, हर्बल उत्पादों और फूड सप्लीमेंट्स की भारतीय खेपों को अत्यधिक कीटनाशक अवशेष, एथिलीन ऑक्साइड संदूषण, अफ्लाटॉक्सिन, पशु चिकित्सा दवाओं के अवशेष और भारी धातुओं की मौजूदगी के कारण कई बार रिजेक्ट किया है।
यूरोपीय संघ ने भारतीय उत्पादों के खिलाफ खाद्य सुरक्षा संबंधी 365 अधिसूचनाएं जारी की हैं। तिल, मिर्च, करी पत्ता, भिंडी और कुछ हर्बल उत्पादों सहित कई भारतीय वस्तुओं पर अब यूरोपीय संघ की सीमाओं पर 20 से 50 प्रतिशत तक भौतिक निरीक्षण और प्रयोगशाला परीक्षण अनिवार्य कर दिया गया है। इन अतिरिक्त जांचों से लागत बढ़ती है, आपूर्ति में देरी होती है और भारतीय निर्यात की प्रतिस्पर्धा क्षमता घटती है।
आयात की कमजोर निगरानी
इसके विपरीत भारत में आयातित खाद्य उत्पादों की अपेक्षाकृत कम जांच होती है। यह स्थिति तब है जब विकसित देशों में भारत की तुलना में कहीं अधिक कीटनाशकों का उपयोग होता है। जीटीआरआई के अनुसार, यूरोपीय संघ में लगभग 600 कीटनाशक पंजीकृत हैं, जबकि भारत में इनकी संख्या 372 है। वर्ष 2023 में यूरोपीय संघ के किसानों ने लगभग तीन लाख टन कीटनाशकों का उपयोग किया, जबकि भारत में यह मात्रा केवल 40 हजार टन रही। प्रति हेक्टेयर के आधार पर यूरोपीय संघ में औसतन 2.67 किलोग्राम कीटनाशक उपयोग किए जाते हैं, जबकि भारत में यह केवल 0.24 किलोग्राम है, यानी यूरोप में उपयोग का स्तर भारत से 11 गुना अधिक है।
फसल स्तर पर भी यही अंतर दिखाई देता है। यूरोपीय किसानों को सेब की खेती में 256 प्रकार के कीटनाशकों के उपयोग की अनुमति है, जबकि भारत में केवल 54 की मंजूरी है। अमेरिका भी दुनिया के सबसे बड़े कीटनाशक उपयोगकर्ताओं में शामिल है। इसके बावजूद यूरोप से आयातित सेब, कैलिफोर्निया के बादाम और पश्चिम एशिया से आने वाले खजूर शायद ही कभी उस स्तर की व्यापक अवशेष जांच से गुजरते हैं, जिसका सामना भारतीय निर्यात को विदेशों में करना पड़ता है।
कठोर हो रहे हैं यूरोपीय संघ के नियम
यूरोपीय संघ की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था लगातार अधिक प्रतिबंधों वाली होती जा रही है। सबसे विवादास्पद प्रावधानों में से एक कीटनाशक अवशेष सीमा से जुड़ा है। जब किसी कीटनाशक का यूरोप में घरेलू उपयोग नहीं होता है, तो यूरोपीय संघ अक्सर उसके आयात एमआरएल को घटाकर डिफॉल्ट 0.01 पीपीएम कर देता है, जो 100 टन खाद्य पदार्थ में केवल एक ग्राम अवशेष के बराबर है। अर्थात किसी व्यक्ति को एक ग्राम कीटनाशक अवशेष ग्रहण करने के लिए 100 टन खाद्य पदार्थ का सेवन करना पड़ेगा, जो व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। आलोचकों का कहना है कि यह डिफॉल्ट सीमा अक्सर नए वैज्ञानिक जोखिम मूल्यांकन के बिना लागू कर दी जाती है।
इस विवाद का एक प्रमुख उदाहरण ट्राइसाइक्लाजोल है, जो धान की खेती में व्यापक रूप से इस्तेमाल होता है। वर्ष 2022 में यूरोपीय खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण (ईएफएसए) ने वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर चावल में ट्राइसाइक्लाजोल की एमआरएल को 0.01 पीपीएम से बढ़ाकर 0.09 पीपीएम करने की सिफारिश की थी। इसके बावजूद यूरोपीय संसद ने इस सिफारिश को अस्वीकार कर दिया और अधिक कठोर 0.01 पीपीएम की सीमा बनाए रखी, जिससे भारत सहित चावल उत्पादक देशों के लिए निर्यात और कठिन हो गया।
डब्ल्यूटीओ की एसपीएस समिति में हुई चर्चा के दौरान यूरोपीय संघ ने स्वीकार किया कि उसने यह सीमा पारंपरिक वैज्ञानिक जोखिम मूल्यांकन के आधार पर तय नहीं की, बल्कि अपने डिफॉल्ट खतरा-आधारित दृष्टिकोण के आधार पर निर्धारित की।
केवल एफटीए से समस्या का समाधान नहीं होगा
भारत-यूरोपीय संघ एफटीए के लागू होने के साथ यह मुद्दा और अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगा। जहां समझौता अधिक नियामकीय सहयोग का वादा करता है, वहीं यूरोपीय संघ ने ऐसे कीटनाशकों के लिए आयात टॉलरेंस समाप्त करने का प्रस्ताव भी रखा है, जिन्हें यूरोप में अब मंजूरी नहीं है। इससे अनेक आयातित उत्पादों पर स्वतः 0.01 पीपीएम की डिफॉल्ट अवशेष सीमा लागू हो जाएगी।
जीटीआरआई के अजय श्रीवास्तव और सेंटर फॉर एनवायरनमेंट एंड एग्रीकल्चर की सांत्वना दीक्षित का कहना है कि भारत को रक्षात्मक और आक्रामक दोनों तरह की रणनीति अपनानी होगी। सबसे पहले, भारत को खेत से बंदरगाह तक ट्रेसबिलिटी विकसित करते हुए, किसानों को कीटनाशकों के सुरक्षित उपयोग संबंधी बेहतर मार्गदर्शन करना चाहिए, अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं की संख्या बढ़ाकर भारतीय मान्यता प्रणाली को मजबूत बनाना चाहिए, नियमित अवशेष निगरानी सुनिश्चित करनी चाहिए।
दूसरे, भारत को आयातित खाद्य उत्पादों की उसी कठोरता से जांच करनी चाहिए, जिस प्रकार भारतीय निर्यात की विदेशों में होती है। आयातित खेपों की जोखिम-आधारित सैंपलिंग और प्रयोगशाला परीक्षण किया जाना चाहिए तथा जो खेप भारतीय मानकों पर खरी न उतरे, उसे रिजेक्ट कर दिया जाना चाहिए। चीन इसका अच्छा उदाहरण है। वर्ष 2013 से 2019 के बीच चीन ने खाद्य सुरक्षा उल्लंघनों के कारण हर वर्ष औसतन 740 यूरोपीय संघ की खाद्य खेपों को रिजेक्ट किया या लौटा दिया।

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