भारत के केला उत्पादकों के सामने TR4 फंगस का खतरा, बड़े इलाके में पौधे हो सकते हैं तबाह

वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि केले को प्रभावित करने वाली फंगल बीमारी ट्रॉपिकल रेस-4 (TR4) भारत की 50,000 करोड़ रुपये की केला अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बन सकती है। यह बीमारी कई राज्यों में फैल चुकी है और व्यापक रूप से उगाई जाने वाली ग्रैंड नाइन (G-9) किस्म को प्रभावित कर रही है, जिससे उत्पादन और किसानों की आय को लेकर चिंता बढ़ गई है।

भारत के केला उत्पादकों के सामने TR4 फंगस का खतरा, बड़े इलाके में पौधे हो सकते हैं तबाह

अभास आनंद

दुनिया के कई देशों में केले की खेती को प्रभावित करने वाली एक बेहद विनाशकारी बीमारी अब भारत के केला क्षेत्र के लिए बड़ी चिंता बनकर उभर रही है। ट्रॉपिकल रेस-4 (TR4) नामक यह बीमारी मिट्टी में पनपने वाला एक फंगल संक्रमण है, जो केले के पौधों पर अंदरूनी हमला कर धीरे-धीरे उन्हें नष्ट कर देता है।

तिरुचिरापल्ली स्थित आईसीएआर-राष्ट्रीय केला अनुसंधान केंद्र (ICAR-NRCB) के वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि TR4 तेजी से फैला तो देशभर के केला उत्पादकों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा केला उत्पादक देश है, जहां सालाना उत्पादन लगभग 3.5 से 3.7 करोड़ टन के बीच आंका जाता है। इस उत्पादन का बड़ा हिस्सा ग्रैंड नाइन या जी-9 किस्म से आता है, जिसकी खेती बड़े पैमाने पर टिश्यू कल्चर पौधों के माध्यम से की जाती है।

यह बीमारी सबसे पहले केले के पौधों की जड़ों पर हमला करती है, जिससे पौधे की पानी और पोषक तत्वों को अवशोषित और प्रवाहित करने की क्षमता प्रभावित हो जाती है। संक्रमण बढ़ने पर पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं, पौधा कमजोर हो जाता है और अंततः सूखकर मर जाता है।

एनआरसीबी-आईसीएआर के शोधकर्ताओं के अनुसार यह फफूंद विशेष रूप से खतरनाक है क्योंकि इसे पूरी तरह समाप्त करना बेहद कठिन है। एक बार मिट्टी में पहुंचने के बाद यह कई वर्षों तक जीवित रह सकता है, जिससे संक्रमित भूमि लंबे समय तक केले की खेती के लिए अनुपयुक्त हो जाती है।

राष्ट्रीय केला अनुसंधान केंद्र के निदेशक डॉ. आर. सेल्वराजन के अनुसार यह बीमारी पहली बार वर्ष 2015 में बिहार में पाई गई थी। इसके बाद उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल में भी इसके मामले सामने आए हैं। उन्होंने कहा कि सबसे बड़ा खतरा ग्रैंड नाइन किस्म को है, जिसकी खेती पूरे देश में बड़े पैमाने पर होती है और जो वैश्विक केला व्यापार में भी प्रमुख भूमिका निभाती है। यदि यह बीमारी तेजी से फैली तो नुकसान का स्तर बेहद गंभीर हो सकता है।

डॉ. सेल्वराजन ने बताया कि टिश्यू कल्चर तकनीक ने एक समान और अधिक उत्पादन देने वाले पौधों के जरिए केला उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन यही एकरूपता अब जोखिम भी बन रही है, क्योंकि आनुवांशिक रूप से समान पौधे एक ही बीमारी की चपेट में एक साथ आ सकते हैं, जिससे संक्रमण बड़े क्षेत्रों में तेजी से फैल सकता है।

एनआरसीबी-आईसीएआर के वैज्ञानिक फिलहाल बीमारी नियंत्रण की रणनीति पर काम कर रहे हैं। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और गुजरात के प्रभावित क्षेत्रों में फील्ड ट्रायल भी चल रहे हैं। डॉ. सेल्वराजन ने कहा कि टिश्यू कल्चर पौधों के व्यापक उपयोग से राज्यों के बीच संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ गया है, क्योंकि संक्रमित रोपण सामग्री आसानी से नए क्षेत्रों तक बीमारी पहुंचा सकती है।

उन्होंने संक्रमण रोकने के लिए कड़े क्वारंटीन उपायों की आवश्यकता पर जोर दिया, जिसमें संक्रमित क्षेत्रों से रोगमुक्त क्षेत्रों में पौधे ले जाने पर प्रतिबंध शामिल है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि TR4 बड़े पैमाने पर फैल गया तो भारत के केला क्षेत्र को गंभीर आर्थिक और उत्पादन संबंधी नुकसान झेलना पड़ सकता है। भारत की केला अर्थव्यवस्था का आकार लगभग 50,000 करोड़ रुपये है। 

किसानों पर इसके प्रभाव को तमिलनाडु के त्रिची जिले के किसान जी. करिकालन के अनुभव से समझा जा सकता है। करिकालन ने बताया कि केले की खेती में भारी निवेश की आवश्यकता होती है। किसान आमतौर पर प्रति एकड़ 1 लाख से 1.5 लाख रुपये तक खर्च करते हैं। सामान्य परिस्थितियों में एक एकड़ से 25 से 30 टन तक केले का उत्पादन हो सकता है। उनके क्षेत्र में वर्तमान बाजार मूल्य लगभग 32 रुपये प्रति किलोग्राम है, जिसके आधार पर किसान लागत घटाने से पहले प्रति एकड़ लगभग 8 लाख से 9.6 लाख रुपये तक की आय प्राप्त कर सकते हैं।

लेकिन उन्होंने चेतावनी दी कि बीमारी फैलने की स्थिति में केले की खेती का पूरा आर्थिक संतुलन बिगड़ सकता है। केले की खेती में मजदूरी, उर्वरक, सिंचाई और रोपण सामग्री पर लगातार खर्च करना पड़ता है, जिससे किसान फसल नुकसान के प्रति बेहद संवेदनशील बने रहते हैं।

करिकालन ने कहा कि इस वर्ष बाजार स्थिति “स्थिर” है और पहले जैसी भारी मूल्य अस्थिरता नहीं है। हालांकि उन्होंने बताया कि कमजोर बाजार परिस्थितियों में केले की कीमतें घटकर 10-15 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच जाती हैं। यदि ऐसे समय में बीमारी फैलती है तो कई किसानों को गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि TR4 केवल रोग का मामला नहीं है, बल्कि यह एक ही फसल किस्म पर अत्यधिक निर्भरता के जोखिम की चेतावनी भी है। वैज्ञानिक और सरकारी एजेंसियां अनुसंधान और जागरूकता बढ़ाने में जुटी हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि शुरुआती हस्तक्षेप, कड़ी निगरानी और संक्रमित क्षेत्रों को तेजी से नियंत्रित करना इस बीमारी को राष्ट्रीय संकट बनने से रोकने के लिए बेहद जरूरी होगा।

Subscribe here to get interesting stuff and updates!