डीएपी और कॉम्प्लेक्स खाद की बढ़ी कीमतों से सरकार दबाव में, उद्योग को दी तर्कसंकत वृद्धि की हिदायत

सरकार को डाइ अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) और कॉम्प्लेक्स उर्वरकों की कीमतों में 45 फीसदी से 58 फीसदी तक की बढ़ोतरी के चलते राजनीतिक नुकसान की आशंका सताने लगी है। इस नुकसान को कम करने के लिए सरकार ने उर्वरक उद्योग से कहा है कि वह इन उर्वरकों की कीमतों को तर्कसंगत रखे और मुनाफे के लिए अधिक बढ़ोतरी नहीं करे। इसके साथ ही कीमतों को तय करते समय आयातित कच्चे माल की लागत को ध्यान में रखे।

डीएपी और कॉम्प्लेक्स खाद की बढ़ी कीमतों से सरकार दबाव में, उद्योग को दी तर्कसंकत वृद्धि की  हिदायत

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को डाइ अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) और कॉम्प्लेक्स उर्वरकों की कीमतों में 45 फीसदी से 58 फीसदी तक की बढ़ोतरी के चलते राजनीतिक नुकसान की आशंका सताने लगी है। इस नुकसान को कम करने के लिए सरकार ने उर्वरक उद्योग से कहा है कि वह इन उर्वरकों की कीमतों को तर्कसंगत रखे और मुनाफे के लिए अधिक बढ़ोतरी नहीं करे। इसके साथ ही कीमतों को तय करते समय आयातित कच्चे माल की लागत को ध्यान में रखे। पुरानी कीमतों पर आयातित कच्चे माल से तैयार उर्वरकों को अधिक कीमत पर नहीं बेचा जाना चाहिए। अगर ज्यादा मुनाफे के लिए कीमतों में बढ़ोतरी पाई जाती है तो उस स्थिति में सरकार ने उर्वरक सब्सिडी रोकने तक की बात कही है। उर्वरक एवं रसायन मंत्राललय में डिपार्टमेंट ऑफ फर्टिलाइजर्स (उर्वरक विभाग) में सयुक्त सचिव अपर्णा एस. शर्मा ने 17 मई, 2021 को उर्वरक उद्योग को लिखे एक पत्र में यह बातें कही हैं। इस पत्र की प्रति रुरल वॉयस के पास है। यह बात अलग है कि सरकार ने कच्चे माल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी के बावजूद न्यूट्रिएंट आधारित सब्सिडी (एनबीएस) स्कीम के तहत दी जाने वाली सब्सिडी में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है और उसे पिछले वित्त वर्ष के स्तर पर ही बरकरार रखा गया है। लेकिन जिस तरह से उर्वरकों की कीमतों में वृद्धि का मसला राजनीतिक रूप ले रहा है और किसान संगठन विरोध कर रहे हैं उससे सरकार पर सब्सिडी बढ़ाने का दबाव भी बढ़ रहा है।

संयुक्त सचिव द्वारा लिखे गये इस पत्र में कहा गया है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल और तैयार उत्पादों की कीमतों में पिछले तीन चार माह में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसकी वजह उर्वरकों की अधिक खपत वाले मार्केट्स में मांग बढ़ने के चलते बढ़ती प्रतिस्पर्धा को बताया है। पत्र में कहा गया है कि कुछ कंपनियां ऐसी भी हैं जिन्होंने कच्चे माल को पुरानी कीमतों पर आयात किया था और इससे तैयार उर्वरकों को अधिक मुनाफे के लिए बढ़ी कीमतों पर बेच रही हैं। इस तरह की कंपनियों के खिलाफ सरकार कार्रवाई करने में नहीं हिचकेगी। इसके साथ ही कहा है कि कोविड महामारी के इस दौर में किसानों को उर्वरक की आपूर्ति सुनिश्चित करने में कोई ढिलाई नहीं बरती जानी चाहिए।

पत्र की प्रति नीचे दी गई है।

गैर यूरिया उर्वरकों के लिए सरकार न्यूट्रिएंट आधारित सब्सिडी (एनबीएस) व्यवस्था के तहत सब्सिडी देती है और इनकी कीमतों पर सरकार का नियंत्रण नहीं है। कच्चे माल की कीमतों और सरकार की सब्सिडी के आधार पर उर्वरक कंपनियां दाम तय करती हैं। यह सब्सिडी उर्वरकों में इस्तेमाल होने वाले न्यूट्रिएंट के आधार पर दी जाती है। इसके तहत 46 फीसदी फॉस्फोरस और 18 फीसदी नाइट्रोजन वाले डीएपी पर 10,231 रुपये प्रति टन की सब्सिडी मिलती है। 60 फीसदी पोटाश वाले एमओपी पर 6070 रुपये प्रति टन की सब्सिडी मिलती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल की कीमत बढ़ने के चलते उर्वरक कंपनियों ने एक अप्रैल,2021 से डीएपी की कीमतें 1200 रुपये प्रति बैग (50 किलो) से बढ़ाकर 1800 से 1900 रुपये प्रति बैग कर दी हैं। देश की सबसे बड़ी उर्वरक उत्पादक सहकारी संस्था इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइजर कोआपरेटिव लिमिटेड (इफको) ने पुराने कीमतों पर आयातित कच्चे माल से उत्पादित उर्वरकों के 11.26 लाख टन स्टॉक को पुरानी कीमतों पर ही उर्वरक बेचने की घोषणा की थी। सूत्रों के मुताबिक इफको इन उर्वरकों कोअ भी पुरानी कीमतों पर ही उर्वरक बेच रही है। लेकिन अब इसका पुराना स्टॉक लगभग समाप्त होने को है। इस स्थिति में अगर अगले कुछ दिनों में सब्सिडी में बढ़ोतरी नहीं होती है तो इफको को भी बढ़ी कीमतों पर उर्वरक बेचना पड़ सकता है। लेकिन अधिकांश उर्वरक कंपनियों ने अप्रैल में ही बढ़ी कीमतों पर डीएपी और दूसरे कॉम्प्लेक्स उर्वरकों को बेचना शुरू कर दिया था।

उद्योग सूत्रों ने रुरल वॉयस को बताया कि कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी को देखते हुए कीमतों में बढ़ोतरी के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है। सरकार को इस कीमत वृद्धि के अनुपात में सब्सिडी में बढ़ोतरी करनी चाहिए। ताजा आयात टेंडरों के लिए डीएपी की कीमतें 565 से 572 डॉलर प्रति टन पर आ रही हैं। दो सरकारी कंपनियों ने हाल ही में आयात के लिए जो टेंडर किये थे उनके लिए यह दरें आई हैं। हालांकि इनमें से एक कंपनी कह रही है कि अभी हम कीमतों को लेकर बातचीत कर रहे हैं।

 अक्तूबर,2020 से अभी तक डीएपी की कीमतें 395 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 572 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई हैं। इस दौरान यूरिया की कीमत 275 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 365 डॉलर प्रति टन पर पहुंच गई हैं। एमओपी कीमत 230 डॉलर प्रति टन 280 डॉलर प्रति टन पर पहुंच गई हैं। वहीं कच्चे माल में अमोनिया की कीमत 280 डॉलर से 550 डॉलर प्रति टन और सल्फर की कीत 85 डॉलर से बढ़कर 210 डॉलर प्रति टन पर पहुंच गई है। फॉस्फोरिक एसिड की आयातित कीमतें जुलाई- सितंबर,2020 की तिमाही में 620 डॉलर प्रति टन थी जो अब बढ़कर 998 डॉलर प्रति पर पहुंच गई हैं। अगर हम 570 डॉलर प्रति टन की कीमत पर डीएपी का आयात करते हैं तो 41,600 रुपये प्रति टन आती है। इसके उपर पांच फीसदी सीमा शुल्क और करीब 3000 हजार रुपये प्रति टन के बैगिंग, हैंडलिंग, वेयरहाउसिंग समेत दूसरी लागतें मिलाकर यह कीमत करीब 46,700 रुपये प्रति टन पर पहुंच जाती है। इसमें से एनबीएस के तहत डीएपी पर मिलने वाली 10,231 रुपये प्रति टन की सब्सिडी घटाने के बाद भी उर्वरक कंपनियों द्वारा इसे 36,500 रुपये प्रति टन से कम बेचना मुश्किल होगा।

दिलचस्प बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल की ऊंची कीमतों के बीच भी सरकार कंपनियों से ही उम्मीद लगाये हुए है कि वह कीमतों में तर्कसंगत बढ़ोतरी ही करें। मंत्रालय द्वारा उद्योग को लिखे इस पत्र में कहा गया है कि अगर किसी कंपनी द्वारा उपयोग किये गये कच्चे माल की कीमत के आधार पर आने वाली लागत और बैग पर अंकित अधिकतम खुदरा मूल्य के बीच गैर जरूरी अंतर पाया जाता है और कंपनी ने अधिक मुनाफा कमाने के लिए ज्यादा कीमत बढ़ोतरी की है तो सरकार उस कंपनी के ऐसे उर्वरकों की श्रेणी को और जरूरी हुआ तो कंपनी को भी एनबीएस सब्सिडी योजना से बाहर करने में नहीं हिचकेगी।

यहां तक तो ठीक है, लेकिन सरकार एनबीएस के तहत सब्सिडी में बढ़ोतरी कर किसानों के लिए कीमतों को कम करने का फैसला क्यों नहीं ले रही है। इसको लेकर आश्चर्य होना स्वाभाविक है। यही नहीं कंपनियों द्वारा एक अप्रैल, 2021 से गैर यूरिया उर्वरकों की कीमत में 45 फीसदी से 58 फीसदी तक की बढ़ोतरी करने के बाद 9 अप्रैल, 2021 को उर्वरक मंत्रालय ने एक ऑफिस मेमोरेंडम जारी कर एनबीएस के तहत सब्सिडी की दरों को चालू वित्त वर्ष 2021-22 में भी पिछले वित्त वर्ष 2020-21 की दरों पर ही रखने की घोषणा की थी। जबकि उस समय कीमतें बढ़ चुकी थी। इस ऑफिस मेमोरेंडम पर रुरल वॉयस ने उस समय खबर की थी। इस बीच उर्वरक मंत्रालय में उर्वरकों की कीमतों को लेकर उद्योग के साथ बैठक भी हुई थी।

उसके बाद यह पत्र अब उर्वरक उत्पादक कंपनियों को लिखा गया है। ऐसा लगता है कि इसकी वजह देश के अधिकांश हिस्सों में विनियंत्रित उर्वरकों की कीमतों में भारी बढ़ोतरी को लेकर किसानों की नाराजगी सामने आना है। साथ ही डीएपी की बिक्री में भी भारी गिरावट आई है। इस समय खरीफ सीजन की बुवाई जोरों पर है। ऐसे में सरकार के उपर कीमतों में वृद्धि को लेकर दबाव बन रहा है और 17 मई की उद्योग को चिट्ठी इसी बात का संकेत है कि सरकार इस मुद्दे को लेकर चिंतित है। हो सकता है कि आने वाले दिनों में एनबीएस की सब्सिडी दरों में बढ़ोतरी की जाए ताकि किसानों के लिए कीमतें कुछ कम हो सकें और उनकी नाराजगी से सरकार को होने वाले राजनीतिक नुकसान को कुछ कम किया जा सके।  वहीं कई किसान संगठन उर्वरकों की कीमतों में वृद्धि को लेकर आंदोलन तेज करने की बात कर रहे हैं। किसान संगठन ऑल इंडिया किसान सभा ने 18 मई को एक बयान जारी कर यह बात कही। साथ ही कहा कि इन उर्वरकों की कीमतों को भी नियंत्रण के दायरे में लाया जाना चाहिए।