नगालैंड विश्वविद्यालय के अध्ययन में खुलासा: चाय बागान की मिट्टी और उत्पादन पर हो रहा जलवायु परिवर्तन का असर

अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ है कि जलवायु परिवर्तन, मिट्टी के स्वास्थ्य और सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों के बीच गहरा संबंध है। यह जानकारी पूर्वोत्तर भारत में टिकाऊ (सस्टेनेबल) और जलवायु-अनुकूल (क्लाइमेट-रेजिलिएंट) चाय उत्पादन प्रणाली विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

नगालैंड विश्वविद्यालय के अध्ययन में खुलासा: चाय बागान की मिट्टी और उत्पादन पर हो रहा जलवायु परिवर्तन का असर

यह बात अब तेजी से स्पष्ट होती जा रही है कि जलवायु परिवर्तन का असर केवल फसलों की वृद्धि तक सीमित नहीं है, बल्कि मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीवों और उसकी जैविक सक्रियता पर भी पड़ रहा है। जलवायु में होने वाले उतार-चढ़ाव का मिट्टी के सूक्ष्मजीवों और जैविक स्वास्थ्य पर प्रभाव कृषि की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण होता जा रहा है।

इसी संदर्भ में नगालैंड विश्वविद्यालय तथा देश के अन्य शोध संस्थानों के वैज्ञानिकों की एक संयुक्त शोध टीम द्वारा असम के जोरहाट स्थित पांच प्रमुख चाय बागानों में किए गए अध्ययन को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस अध्ययन में यह जांच की गई कि मौसम में होने वाले बदलाव मिट्टी में रहने वाले सूक्ष्मजीवों (माइक्रोबियल कम्युनिटीज) और एंजाइम गतिविधियों को किस प्रकार प्रभावित करते हैं।

अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ है कि जलवायु परिवर्तन, मिट्टी के स्वास्थ्य और सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों के बीच गहरा संबंध है। यह जानकारी पूर्वोत्तर भारत में टिकाऊ (सस्टेनेबल) और जलवायु-अनुकूल (क्लाइमेट-रेजिलिएंट) चाय उत्पादन प्रणाली विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

अध्ययन से क्या मदद मिलेगी

यह शोध वैज्ञानिकों को निम्नलिखित क्षेत्रों में सहायता प्रदान करेगा-

* मिट्टी में बैक्टीरिया और फफूंद की आबादी में मौसमी बदलावों को समझने में।

* बदलती जलवायु परिस्थितियों में टिकाऊ चाय उत्पादन के लिए वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध कराने में।

* जलवायु-अनुकूल चाय उत्पादन की रणनीतियां विकसित करने में।

शोधकर्ताओं के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण चाय की उत्पादकता और गुणवत्ता दोनों अधिक प्रभावित होने लगी हैं। मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीव और एंजाइम मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने तथा पोषक तत्वों के चक्र (न्यूट्रिएंट साइक्लिंग) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि, पूर्वोत्तर भारत के चाय बागानों में जलवायु परिवर्तन इन जैविक प्रक्रियाओं को किस प्रकार प्रभावित कर रहा है, इस बारे में अब तक सीमित जानकारी उपलब्ध थी।

इस कमी को दूर करने के लिए वैज्ञानिकों ने कई वर्षों तक चलने वाला व्यापक अध्ययन किया, जिसमें मिट्टी में बैक्टीरिया, फफूंद समुदायों और उनसे जुड़े एंजाइमों का विभिन्न मौसमों में विश्लेषण किया गया। वर्ष 2016 से 2019 के दौरान किया गया यह अध्ययन असम के कई चाय बागानों में मौसमी सूक्ष्मजीव गतिशीलता (माइक्रोबियल डायनेमिक्स) का पहला व्यापक आकलन माना जा रहा है।

आधुनिक वैज्ञानिक विश्लेषण का उपयोग

इस अध्ययन में सूक्ष्मजीव विज्ञान (माइक्रोबायोलॉजी), जैव-रसायन (बायोकेमिस्ट्री), जलवायु विज्ञान तथा उन्नत सांख्यिकीय विश्लेषण को एक ही शोध ढांचे में समाहित किया गया। शोधकर्ताओं ने पारिस्थितिकी विविधता और विभिन्न जलवायु परिस्थितियों में मिट्टी की जैविक प्रतिक्रियाओं को समझने के लिए प्रोबेबिलिटी डिस्ट्रीब्यूशन, सह-संबंध विश्लेषण, हायरार्किकल क्लस्टर विश्लेषण तथा प्रिंसिपल कंपोनेंट एनालिसिस (पीसीए) जैसी उन्नत तकनीकों का उपयोग किया। इस अध्ययन के निष्कर्ष वैज्ञानिक पत्रिका एनवायरनमेंट्स (Environments) में प्रकाशित हुए हैं।

अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष

शोधकर्ताओं ने ऐसी जलवायु परिस्थितियों की पहचान की है जो मिट्टी में लाभकारी सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों को बढ़ावा देती हैं। अध्ययन में यह भी पाया गया कि सूक्ष्मजीवों की संख्या और मिट्टी में एंजाइम गतिविधियों के बीच मजबूत सकारात्मक संबंध मौजूद है। अध्ययन के अनुसार, जैविक आंकड़ों में पाए गए 80 प्रतिशत से अधिक बदलावों की व्याख्या पहले तीन प्रिंसिपल कंपोनेंट्स द्वारा की जा सकती है, जिससे सांख्यिकीय विश्लेषण की विश्वसनीयता सिद्ध होती है।

हायरार्किकल क्लस्टर विश्लेषण के माध्यम से विभिन्न चाय बागानों को उनकी सूक्ष्मजीवी और एंजाइम संबंधी विशेषताओं के आधार पर सफलतापूर्वक वर्गीकृत किया गया। शोध यह स्थापित करता है कि मिट्टी के सूक्ष्मजीव समुदाय और एंजाइम गतिविधियां पर्यावरणीय परिवर्तन तथा टिकाऊ चाय उत्पादन के अत्यंत संवेदनशील जैविक संकेतक (बायोलॉजिकल इंडिकेटर्स) हैं।

चाय क्षेत्र को मिलेगा लाभ

यह अध्ययन जैविक संकेतकों के माध्यम से मिट्टी के स्वास्थ्य की बेहतर निगरानी कर जलवायु-अनुकूल चाय उत्पादन प्रणालियों को मजबूत बनाने में मदद करेगा। साथ ही, इससे चाय उत्पादकों को पोषक तत्व प्रबंधन और टिकाऊ खेती की बेहतर रणनीतियां अपनाने में सहायता मिलेगी। यह शोध नीति-निर्माताओं और कृषि विस्तार एजेंसियों को भी वैज्ञानिक आधार प्रदान करेगा, जिससे भारत के चाय क्षेत्र की दीर्घकालिक स्थिरता और जलवायु परिवर्तन के प्रति उसकी क्षमता को मजबूत किया जा सकेगा।

नगालैंड विश्वविद्यालय के कृषि विज्ञान विद्यालय के मृदा विज्ञान विभाग के प्रोफेसर तनमय कराक ने कहा, "हमने यह समझने का प्रयास किया कि कौन-सी मौसमी परिस्थितियां लाभकारी सूक्ष्मजीव समुदायों के लिए अनुकूल होती हैं और जलवायु संबंधी कारक मिट्टी की जैविक प्रक्रियाओं को किस प्रकार नियंत्रित करते हैं। हमारा अध्ययन यह स्थापित करता है कि मिट्टी के सूक्ष्मजीव समुदाय और एंजाइम गतिविधियां पर्यावरणीय परिवर्तन तथा टिकाऊ चाय उत्पादन के अत्यंत संवेदनशील संकेतक हैं।"

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