दूध बिक्री मूल्य का 70-80% किसानों को मिले, वरना डेयरी इंडस्ट्री में आएगी बड़ी दिक्कत: आर.एस. सोढ़ी

अमूल के पूर्व एमडी डॉ. आर.एस. सोढ़ी का कहना है कि फीड, पैकेजिंग और ईंधन लागत बढ़ने से डेयरी सेक्टर दबाव में है, जबकि किसानों को दूध का उचित दाम नहीं मिल रहा। उन्होंने चेतावनी दी कि प्राइस कंट्रोल और कम मुनाफे से डेयरी उत्पादन वृद्धि दर लगातार धीमी पड़ सकती है।

दूध बिक्री मूल्य का 70-80% किसानों को मिले, वरना डेयरी इंडस्ट्री में आएगी बड़ी दिक्कत: आर.एस. सोढ़ी

देश में बढ़ती गर्मी, महंगे पशु आहार और उत्पादन लागत के दबाव के बीच डेयरी सेक्टर नई चुनौतियों का सामना कर रहा है। हाल में अमूल और मदर डेयरी समेत कई कंपनियों ने दूध के दाम बढ़ाए हैं। लेकिन क्या दूध की कीमतों में यह बढ़ोतरी वास्तव में किसानों तक पहुंच रही है? क्या बढ़ती लागत के कारण डेयरी कारोबार की रफ्तार धीमी पड़ रही है? इन सवालों पर अमूल (जीसीएमएमएफ) के पूर्व एमडी तथा इंडियन डेयरी एसोसिएशन के पूर्व प्रेसिडेंट आर.एस. सोढ़ी से रूरल वॉयस के एडिटर-इन-चीफ हरवीर सिंह ने विस्तार से बात की। उन्होंने बताया कि फीड कॉस्ट में भारी बढ़ोतरी से किसानों की आय प्रभावित हो रही है। उन्होंने डेयरी सेक्टर में प्राइस कंट्रोल, वैल्यू एडेड प्रोडक्ट्स, एफटीए और उत्पादन वृद्धि दर में गिरावट जैसे मुद्दों पर भी अपनी स्पष्ट राय रखी। बातचीत के मुख्य अंश-

-हाल में मदर डेयरी और जीसीएमएफ (अमूल) ने दूध के दाम बढ़ाए। यह बढ़ोतरी क्यों करनी पड़ी?
मई में दो रुपये प्रति लीटर भाव बढ़े हैं। पहले कोऑपरेटिव ने बढ़ाए, उसके बाद प्राइवेट सेक्टर ने भी कीमतों में वृद्धि की। इससे पहले पिछले साल 25 मई को दाम बढ़े थे। उससे पहले जून 2024 और फरवरी 2023 में भी दो-दो रुपये की वृद्धि हुई थी। इस तरह पिछले तीन-साढ़े तीन साल में दूध का भाव 6 रुपये लीटर बढ़ा है। टोंड दूध 54 से 60 रुपये और फुल क्रीम 66 से 72 रुपये हो गया। हर साल दाम करीब 3% बढ़े हैं। इस दौरान महंगाई 5% की दर से बढ़ी। इसका मतलब दूध में डिफ्लेशन हुआ। भाव बढ़े नहीं, कम हुए हैं। 
आपने दाम बढ़ाने का कारण पूछा, तो एक तो फीड कॉस्ट बढ़ गई है। इस साल फीड के इंग्रेडिएंट की लागत 30 से 40% बढ़ गई। पैकेजिंग कॉस्ट भी 30 से 40% बढ़ी। लेबर कॉस्ट भी बढ़ी है, और अब ईंधन की लागत बढ़ रही है। जब उत्पादन लागत बढ़ी तो स्वाभाविक है कि दाम भी बढ़ाने पड़े। 

-देश में करीब 8 करोड़ किसान दूध पर निर्भर हैं। उनका जीवन दूध से चलता है। दाम बढ़ने पर किसान को क्या लाभ हुआ?
देखिए, जहां तक दाम बढ़ने में किसानों के फायदे की बात है, आज पूरे भारत में 3.5% फैट वाला गाय के दूध का भाव किसान के लिए 35-36 रुपये से लेकर 40 रुपये लीटर है। भैंस का 6.5% फैट वाला दूध किसान 56 से 58 रुपये पर बेचते हैं। बाजार में जो फुल क्रीम बिकता है, उसमें 6% फैट होता है और किसान को उसका भाव 52-53 रुपये मिलता है।
जनवरी 2023 में गाय के दूध का भाव  34 से 35 रुपये और भैंस के दूध का भाव करीब 50 रुपये था। तो साढ़े तीन साल में भैंस के दूध में तीन से चार रुपये की वृद्धि हुई और गाय के दूध में दो से तीन रुपये की। महंगाई बढ़ी 5%, कस्टमर के लिए दाम बढ़े 3% और किसान की इनकम सिर्फ 1.5 से 2% बढ़ी। मतलब किसान को मिलने वाला दूध का भाव उस अनुपात में नहीं बढ़ा जिस अनुपात में उसका खर्च बढ़ रहा है।

-किसान को मिलने वाला दाम महंगाई के बराबर नहीं बढ़ रहा। तो कहीं किसान कम दाम की वजह से हतोत्साहित तो नहीं हो रहा है?
देखिए, किसान गाय-भैंसों को हरा चारा खिलाएगा, कंसंट्रेटेड फीड खिलाएगा, उसके हिसाब से दूध का उत्पादन होगा। दूध की 70% उत्पादन लागत फीड कॉस्ट होती है। इसमें कंसंट्रेटेड फीड और चारा भी है। अगर मेरा फीड का या बाकी खर्च बढ़ रहा है, लेकिन उस अनुपात में मेरी इनकम नहीं बढ़ रही तो मैं क्या करूंगा? मैं तो पशुओं पर कम खर्च करूंगा। या पहले जो मुझे प्रॉफिट होता था उससे मैं नए पशु खरीदता था, वह नहीं करूंगा। इस तरह एक तरफ तो मौजूदा पशुओं की उत्पादकता कम हो जाती है और दूसरी तरफ डेयरी फार्मिंग में नया निवेश नहीं आता। खास तौर से जो बड़े कमर्शियल डेयरी फार्म खुल रहे थे, उनकी संख्या कम हो रही है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2024-25 में दूध उत्पादन तकरीबन 247 मिलियन मीट्रिक टन रहा और पिछले साल से 3.3% बढ़ा। 2023-24 में 239 मिलियन मीट्रिक टन उत्पादन हुआ और उसमें 3.8% वृद्धि हुई। उससे पहले एक दशक की ग्रोथ रेट 5.5% थी। तो पिछले दो-तीन साल से हमारी ग्रोथ रेट 30% से 40% कम हो गई। इसका कारण है कि किसान की प्रति लीटर आय कम हो रही है। उसका खर्चे बढ़ रहे हैं, लेकिन उस अनुपात में उसके लिए दूध की कीमत नहीं बढ़ रही है। 
भारत में सबसे गरीब किसान ही है। वह कोई स्टार्टअप नहीं है कि कोई फंडिंग आएगी और वह कैश बर्न करे। किसान के अपने घर तो खाने के लिए कुछ नहीं है, और आप कहते हैं कि वह सस्ता दूध उत्पादन करता रहे। लंबे समय में तो यह चलेगा नहीं। 

-हाल में फैट के दाम बढ़ गए हैं। एसएमपी के दाम उतने नहीं बढ़े हैं। इसका असर है कि कंज्यूमर के लिए घी के दाम बढ़ गए हैं। वैसे तो हर साल गर्मियों (लीन सीजन) में उत्पादन घटने से दूध के दाम बढ़ते रहे हैं, लेकिन मुझे लगता है कि इस बार चैलेंज थोड़ा ज्यादा है। आपका क्या मानना है?
गर्मियों में उत्पादन कम हो जाता है और खपत बढ़ जाती है। भारत में 15% से 20% तक रिकंस्टीट्यूशन होता है, जिसमें एसएमपी और व्हाइट बटर का इस्तेमाल दूध बनाने में किया जाता है। एसएमपी की कीमत फैट से थोड़ी ज्यादा होती है। आज भारत में एसएमपी की कीमत तकरीबन 300-320 रुपये है, और 2023 में भी यही भाव था। बल्कि बीच में इसकी कीमत कम हुई थी, पर अभी ऊपर आई है। फैट की कीमत करीब 600 रुपये किलो है। अगर आप 320 रुपये किलो वाला 8.5% एसएमपी और 600 रुपये वाला 3-3.25% फैट इस्तेमाल करें तो टोंड दूध की लागत 46 रुपए लीटर आएगी, जबकि उसको बेचने का रेट 60 रुपये है। इसमें कोई प्रोक्योरमेंट भी नहीं करना है। मेरे विचार से रिकंस्टीट्यूशन के बाद अभी बेचने का रेट फायदेमेंद है।

-अभी दाम बढ़ने के बाद अगले कुछ दिनों तक शायद कोई बढ़ोतरी न हो। हालांकि सरकार ने पेट्रोल-डीजल के दाम कई बार बढ़ाए हैं…।
मुझे लगता है कि अभी जो दाम बढ़े हैं, यह छह महीने पहले होना चाहिए था। अभी जो ईंधन और पैकेजिंग का खर्च बढ़ा है, तो दाम दो रुपये और बढ़ जाते। इस तरह दाम जो चार रुपये बढ़ने थे, उसका 50% ही बढ़ा है। मेरे ख्याल से अगर हमको डेयरी उद्योग को बढ़ाना है और किसान दूध का उत्पादन करता रहे, तो हमें दाम दो से चार रुपये और बढ़ाने चाहिए।

-आपने कहा कि फीड की लागत बहुत बढ़ी है। कमर्शियल डेयरी में कंसंट्रेट का ज्यादा इस्तेमाल होता है। और बाकी जगह नॉर्मल चारे का अधिक प्रयोग होता है। पशुओं की संख्या और चारे की जरूरत को लेकर थोड़ी चिंता है। बरसात में हरा चारा काफी होता है, लेकिन इस साल मानसून भी कमजोर रहने का अनुमान है। क्या इन सबका असर फीड पर आएगा?
बिल्कुल आएगा, क्योंकि हमारे पास हरा चारा पूरे साल उपलब्ध नहीं होता। आजकल स्ट्रॉ की भी उपलब्धता कम हो गई और बहुत महंगी भी हो गई है, 8-10 रुपये किलो। इससे अच्छा कंसंट्रेटेड फीड ही दें। अभी रोजाना करीब डेढ़ लाख टन कंसंट्रेटेड फीड बिकता है। इसकी डिमांड 12 से 15% हर साल बढ़ रही है। फीड के इंग्रेडिएंट्स में 30 से 35% तो डीऑयल्ड राइस ब्रान (डीआरबी) होता है। जब सरकार ने इनके निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया तो भारत में रेट स्थिर रहे। लेकिन निर्यात खुलने के बाद अब डीआरबी के रेट दोगुने हो गए हैं। पहले 20-22 रुपये किलो तो कंसंट्रेटेड फीड बिकता था, आज डीआरबी का रेट ही 20-22 रुपये हो गया है।

-दूध के बाद क्या आइसक्रीम या फ्लेवर्ड मिल्क जैसे वैल्यू एडेड प्रोडक्ट्स के दाम भी बढ़ने की संभावना है?
अगर आप यह प्रश्न कुछ साल पहले पूछते तो मैं बोलता दूध, दही सबसे अच्छे वैल्यू एडेड प्रोडक्ट हैं। पर कुछ सालों में ट्रेंड बदला है। दूध की बिक्री में कोऑपरेटिव मार्केट लीडर रहे हैं। मैं देख रहा हूं कि ज्यादातर राज्यों में दूध के दाम बढ़ाने के लिए कोऑपरेटिव को राज्य सरकारों से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अप्रूवल लेनी पड़ती है। यही कारण है कि हर कोऑपरेटिव ब्रांड अपनी लागत के हिसाब से या किसानों को बेहतर दाम देने के लिए कीमत बढ़ा नहीं पाता। अगर कोऑपरेटिव नहीं बढ़ाता तो प्राइवेट वाला भी नहीं बढ़ा पाता। 
अब प्राइवेट सेक्टर को लगने लगा है कि दूध के दाम तो कोऑपरेटिव बढ़ाएंगे नहीं, उसमें हमारा मार्जिन कम होता जाएगा। लेकिन वैल्यू एडेड प्रोडक्ट इससे प्रभावित नहीं हैं। इसलिए प्राइवेट सेक्टर ज्यादा वैल्यू एडेड प्रोडक्ट की तरफ जा रहा है। कोऑपरेटिव के दूध के दाम कम होने की वजह से उनके पास दूध की डिमांड बढ़ती जा रही है। इसे उन्हें प्राथमिकता के आधार पर पूरा भी करना है। इसलिए उनके पास वैल्यू एडेड प्रोडक्ट्स के लिए दूध कम बचता है। यह असंतुलन बढ़ता जा रहा है। अगर दूध के दाम पर नियंत्रण लगा रहेगा तो आने वाले समय में डेयरी इंडस्ट्री में बड़ी दिक्कत आने वाली है।

-डेयरी में प्राइवेट और कोऑपरेटिव सेक्टर के परफॉर्मेंस को आप किस तरह आंकते हैं?
भारत दूध उत्पादन में नंबर एक बना, तो इसलिए कि कोऑपरेटिव सेक्टर ने सिस्टम बनाया, बेंचमार्क तय किए। डॉ. वर्गीज कुरियन ने दूध संग्रह और किसान के सामने टेस्टिंग जैसे अमूल के उदाहरण स्थापित किये। बाद में प्राइवेट सेक्टर ने उन्हें अपनाया। आज भारत में 13 से 13.5 करोड़ लीटर दूध की खरीद हो रही है। उसमें से करीब 50% कोऑपरेटिव के पास और 50% प्राइवेट सेक्टर के पास है। दोनों बहुत कम मार्जिन पर एक-दूसरे के साथ पूरक तरीके से प्रतिस्पर्धा करते हुए सेक्टर को बढ़ा रहे हैं। दूध की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा है कि कोऑपरेटिव सेक्टर मजबूत रहे और प्राइवेट सेक्टर उसको फॉलो करता रहे ताकि कोऑपरेटिव सेक्टर की खामियां दूर होती रहें। 

-दूध उत्पादन और खपत के आंकड़ों पर कई बार सवाल उठते हैं। कुछ लोग तो कहते हैं कि अगर सिंथेटिक मिल्क पर सरकार सख्ती करे तो किसानों के लिए अच्छा होगा। आपका क्या मानना है?
भारत में दूध का जितना उत्पादन होता है, उतना ही खपता है। मीडिया में जो नकली दूध पकड़े जाने की खबरें आती हैं, उसकी मात्रा 0.001% भी नहीं है। अगर आप केमिकल से बना हुआ दूध खरीदेंगे तो आप उसका इस्तेमाल नहीं कर सकते। आप उसे चाय में डालेंगे या उससे दही या मिठाई बनाएंगे तो तत्काल पता चल जाएगा। इनके बारे में बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बताया जाता है। 
आपने आंकड़ों की बात की। जब ऑपरेशन फ्लड लॉन्च हुआ तब उत्पादन 23-24 मिलियन मीट्रिक टन था। पहले 25 साल में हमने उसे बढ़ा कर 72-73 मिलियन मीट्रिक टन कर दिया। उसके अगले 25 साल में उत्पादन फिर हमने तीन गुना कर दिया। इस दौरान 5-5.5% ग्रोथ रेट थी। हम सोच रहे थे कि अगर यही ग्रोथ रेट रही तो आने वाले 25 सालों में जब भारत विकसित बनेगा, तब दुनिया का 40% से 45% उत्पादन भारत में होगा। लेकिन हमारी उत्पादन वृद्धि दर 3% से 4% के बीच रह गई है। इस साल का तो डेटा अभी आया नहीं, लेकिन जो डेटा उपलब्ध है वह कोऑपरेटिव का होता है। प्राइवेट सेक्टर अपना डेटा साझा नहीं करता। अगर आप कोऑपरेटिव सेक्टर का पिछले दो-तीन साल का देखें तो उनकी खरीद में ज्यादा ग्रोथ नहीं है। औसत ग्रोथ 2% से 3% होगी। मतलब ग्रोथ रेट आधा हो गया।
हमें इसके कारण ढूंढ़ने पड़ेंगे। किसान को भाव कम मिल रहा है और उसकी लागत बढ़ रही है। किसान के पास अपने संसाधनों का इस्तेमाल करने के दूसरे अवसर हैं। वह देखेगा कि अगर मुझे डेयरी में पैसा नहीं मिल रहा तो मैं और क्या कर सकता हूं? वह पोल्ट्री कर सकता है, बागवानी में जा सकता है, छोटा उद्योग लगा सकता है, शहर जाकर नौकरी कर सकता है। आज एक डिलीवरी बॉय दिन के 800 से 1000 रुपये कमा रहा है। खेत में पूरे दिन काम करने वाले किसान को कहां 25 से 30 हजार की आमदनी हो रही है।

-मौजूदा परिस्थिति में डेयरी सेक्टर की ग्रोथ को बरकरार रखने के लिए आप क्या सुझाव देंगे?
भारत विश्व में नंबर एक बना आणंद पैटर्न के कारण। यह पैटर्न क्या था- कस्टमर दूध का जो दाम देता था उसका 70% से 80% किसान को मिलना चाहिए। आज टोंड दूध का एमआरपी 60 रुपये है तो किसान को 35 से 38 रुपये मिल रहे हैं। यह कंज्यूमर प्राइस का 55 से 60% है। फुल क्रीम में भी किसान को 60 से 65% मिल रहा है। सबसे पहले हमें इस अंतर को कम करना पड़ेगा। चाहे वह कोऑपरेटिव हो या प्राइवेट, अगर हमने किसानों को 70% से 80% नहीं दिया तो किसान उत्पादन नहीं करेगा। दूध के दाम बढ़ने चाहिए, पर वह बढ़त किसान को भी मिलनी चाहिए ना कि सिर्फ बीच के खर्चों में जाने चाहिए।
दूसरी बात, सरकार दूध के बिक्री मूल्य को नियंत्रित न करे। कई राज्यों में ऐसा हो रहा है। वहां सरकारें पांच से छह रुपये सब्सिडी देती हैं, इसलिए कहती हैं कि हमारा हक बनता है प्राइस कंट्रोल करने का। वे छह रुपये की सब्सिडी देंगी और दाम आठ रुपये कम रखेंगी। यह तो कस्टमर को सब्सिडी देना और किसान को दंड देने जैसा है। कई राज्य तो सब्सिडी नहीं देने के बावजूद कीमत को कंट्रोल करते हैं। हमारे यहां उपभोक्ता मामले मंत्रालय है, लेकिन कोई ऐसा मंत्रालय नहीं जो किसानों के दूध की कीमत तय करे। फसलों में एमएसपी है, लेकिन दूध में नहीं है। हम चाहते भी नहीं है। हम चाहते हैं कि डेयरी इंडस्ट्री को मुक्त रखें। बाजार तय करे किस दाम पर बेचना है। 
जैसा मैंने पहले बताया कि किसान की लागत में 70% हिस्सा फीड कॉस्ट का होता है। डीऑयल्ड राइस ब्रान पर फिर प्रतिबंध लगा देना चाहिए, क्योंकि इसके दाम इतने बढ़ते जा रहे हैं कि किसान इसका बोझ उठा ही नहीं सकता। इस पर सरकार को जल्दी ध्यान देना चाहिए। 

-हमने कुछ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट किए हैं। न्यूजीलैंड और ईयू के साथ एफटीए में डेयरी को बाहर रखा, लेकिन इंग्रेडिएंट्स शामिल हैं। इस तरह के समझौते हमारे डेयरी सेक्टर के लिए कितना बड़ा खतरा हैं?
हमें दो बातों पर सावधानी रखनी पड़ेगी। पहला है डेयरी इंग्रेडिएंट्स। इसमें स्किम्ड मिल्क पाउडर, व्हाइट बटर, एसएनएफ आयात की अनुमति है निर्यात करने के लिए। मान लीजिए सभी ब्रांड मिलाकर भारत से 2000 करोड़ रुपये का घी निर्यात करते हैं। अभी इसे बनाने में भारत की गाय-भैंसों का फैट प्रयोग करते हैं। अब अगर लगेगा कि न्यूजीलैंड का फैट सस्ता है तो निर्यातक वहां से फैट ला सकते हैं।
दूसरा, बल्क में इन्फेंट मिल्क फूड आयात की जरूरत क्या है? इन्फेंट मिल्क फूड में मिल्क पाउडर, शुगर और विटामिन होते हैं। इसका तो किसी भी काम के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इसे डेयरी व्हाइटनर में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इसलिए हमें इन दोनों बातों पर निगाह रखनी चाहिए कि कहीं इसका दुरुपयोग तो नहीं हो रहा।

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