दो अंकों में चल रही महंगाई को सामान्य स्थिति मानने से बचने की जरूरत

थोक बाजारों में 10 प्रतिशत से अधिक और खुदरा बाजारों में 6 प्रतिशत तक कीमतों की वृद्धि दर (महंगाई दर) की खबरें  एक नियमित मामले की तरह बन गई हैं। अफसोस की बात यह है कि खाद्य तेल, एलपीजी , दालें , ट्रेन और बसों से यात्रा जैसी चीजों की महंगाई को रोज़ाना जिंदगी से खारिज नही किया जा सकता है

दो अंकों में चल रही महंगाई को सामान्य स्थिति मानने से बचने की जरूरत

थोक बाजारों में 10 प्रतिशत से अधिक और खुदरा बाजारों में 6 प्रतिशत तक कीमतों की वृद्धि दर (महंगाई दर) की खबरें  एक नियमित मामले की तरह बन गया है। अफसोस की बात यह है कि खाद्य तेल, एलपीजी , दालें , ट्रेन और बसों से यात्रा जैसी चीजों की महंगाई को रोज़ाना जिंदगी से खारिज नही किया जा सकता है। इनकी  कीमतों में नियमित रूप से बढ़ोतरी की वजह से गांव और शहरों , दोनों मे रहने वाली आम महिलाओं को इस महंगाई के कारण बहुत परेशानी होती हैं । महंगाई का दबाव और भी  बढ़ जाता है, जब नौकरियां कम हो और अगर नौकरी करते भी हो तो वेतन की कटौती का सामना करना पड़ रहा  हों । इस बात को कॉरपोरेट फर्म के प्रबंधन शेयर बाजार वाले टीवी चैनलों पर बयान दे रहे हैं कि किस तरह कर्मचारियों पर लागत को युक्तिसंगत बनाकर उन्होने लागत में कटौती की है । एक प्रबंधन तो यहां तक दावा किया कि उसने पिछले साल आई कोराना महामारी में 65 प्रतिशत कर्मचारियों को नियोजित  करने के बावजूद पूर्ण क्षमता का उपयोग किया है। कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को निकालकर और उनके वेतन की कटौती करके बैलेंस शीट को मुनाफे में बनाए रखा है 

थोक मुल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) के तहत जून 2021 में महंगाई दर 12.05 प्रतिशत उच्च  स्तर पर रही है। जबकि चालू वित्त वर्ष के तीन महीनों के लिए थोक महंगाई दर का औसत 11.91 प्रतिशत । इसके मुकाबले जून में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की  6.26 प्रतिशत वृद्धि दर का आंकड़ा कम लग सकता है। लेकिन थोक मंडियों में कीमतें एक अंतराल के बाद खुदरा बाजार के स्तर की कीमतों में बदल जाती हैं । इसलिए यह एक तरह से चेतावनी है कि उपभोक्ताओं के स्तर पर समस्याएं इतनी आसानी से दूर नहीं होने वाली हैं । 

 यह दर्द छोटे से छोटे  स्तर पर और भी ज्यादा दिखाई देता है ।  थोक मूल्य सूचकांक  की मदद से  देखा जा सकता है कि एलपी जी गैस की कीमतों में साल दर साल तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। पिछले साल के मुकाबले जून में इसमें 31.44 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। वहीं डीजल और पेट्रोल की  कीमतों में  60 प्रतिशत की बढोतरी रही।  वनस्पति तेलों , वसा आदि में बढोत्तरी   44 प्रतिशत से अधिक थी जबकि दालो में 11.49 प्रतिशत थी । उपभोक्ता मूल्य सूचकांक  (सीपीआई) के आंकड़े कुछ कम हैं लेकिन अंत में को ही यह मार झेलनी है और वास्तव में खरीदारी के लिए कोई सुरक्षित जगह नही है।

पेट्रोल की कीमत प्रति लीटर 100 रुपये से अधिक चल रही है और डीजल की कीमत कई जगह सौ रुपये के आसपास चल रही है। इस पर राजनीतिक दलों ने सांकेतिक विऱोध प्रर्दशन शुरू कर दिया है। सरकार ने इस मामले में चुप्पी साध ली है , मानो यह सब एक  नियमित मामला हो ।  इन सब के बीच  आम आदमी,  गरीब , औऱ आम महिला पिस रहे हैं ।  अमीर औऱ गरीब , शहरी औऱ ग्रामीण वर्ग के बीच बढ़ रहा विभाजन  लोगों की आप बीती में साफ झलकता है। यह निर्भर करता है कि आप आखिर किससे बाते कर रहे  है ।  कोरोना महामारी के कारण आर्थिक तनाव तो बढ़ा ही है लेकिन उससे भी ज्यादा नुकसान  दैनिक उपयोग की चीजों की बढ़ती कीमतों  के कारण हो रहा है,जो महामारी से भी ज्यादा दर्द दे रहा है।  गांव में रहने वाले गरीब और शहर में  काम करने वाले उनके भाई-बंधु आपको यही बात बताएंगें ।  शहर में रहने वाले औऱ सुरक्षित नौकरियों के साथ रहने वाले लोग आपको इस मंहगाई की अलग तरह से व्याख्या करेंगे कि कैसे देश को  कोरोना की चौथी लहर से  बचाने की जरूरत है ,टीकाकरण, प्रतिबंध ,  लाकडाउन  और चाहे इसके लिए कोई भी  लागत क्यों ना  लगें।

महामारी की दूसरी लहर समाप्त होने के बाद अब निर्माण सहित आर्थिक गतिविधियों में तेजी देखने को मिल रही है। गांवो में खरीफ फसलों की बुआई चल रही जिससे खेती में  फिर से  मजदूरी के अवसर खुलना शुरू हो गये  हैं। निसंदेह यह राहत के संकेत है। लेकिन महंगाई के कारण राहत नही मिल पा रही है।

 इन सबके बीच किसान अजीबो गरीब मुश्किल स्थिति में हैं । बढ़ती महंगाई के हाथों उपभोक्ता के रूप में  पीड़ित होने के अलावा  उन्हें  फसल उत्पादक के रूप में हर फसल के लिए लगने वाली लागत जैसे  ईंधन की कीमत से लेकर उर्वरक  और कीटनाशक और बढ़ती मजदूरी में मूल्य वृद्धि को सहने के लिए के लिए भी मजबूर किया जा रहा है।  किसानों पर हर तरह से बढ़ती लागत  का चौतरफा दबाव है। गांवो में जो मजदूरी दरें कम हो गयी थी वह अब बढ़ती महंगाई के कारण बढ़ने लगी है। लेकिन यह बढ़ी मजदूरी श्रमिकों की जेब में नहीं जा रही है बल्कि महंगाई की जेब में जा रही है।

 इसलिए महंगाई को एक नियमित कहानी बनने से बचाना है क्योंकि यह अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाला गंभीर मुद्दा है। जहां कड़वा तेल ( सरसो का तेल ) केवल अमीरों के लिए विलासिता बन गया है । तथाकथित बैश्विक कमोडिटी मूल्य दबाव और  आपूर्ति श्रृंखला  अड़चन के परिणाम के रूप में इस समस्या को खारिज करना एक अलग बात है । अगर इस समस्या को हल करना है तो इस दर्द को जड़ से खत्म करने की जरूरत है। क्योंकि सिर्फ टालने से  यह समस्या रहेगी और बढ़ती भी जाएगी इसलिए इसका समाधान ढूंढ़ना होगा और इस पर गंभीर होकर हल खोजना होगा। अंत में यह जवाबदेरी सरकार की है उसे ही इसे हल करना है।