आर्थिक सर्वे में कृषि सुधारों की वकालत, उर्वरक असंतुलन पर चिंता, यूरिया के दाम बढ़ाने का सुझाव

आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 में कृषि सुधारों की जरूरत पर जोर देते हुए उर्वरक असंतुलन और कम पूंजी निवेश को बड़ी चुनौती बताया गया है। सर्वे के मुताबिक, मृदा स्वास्थ्य सुधारने के लिए संतुलित उर्वरक उपयोग, यूरिया कीमतों में सुधार और प्रति एकड़ आधारित प्रोत्साहन जरूरी हैं। साथ ही फसल उत्पादकता बढ़ाने और कृषि निवेश को मजबूत करने की आवश्यकता पर भी बल दिया गया है।

आर्थिक सर्वे में कृषि सुधारों की वकालत, उर्वरक असंतुलन पर चिंता, यूरिया के दाम बढ़ाने का सुझाव

संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 में कृषि सुधारों की वकालत की गई है। सर्वे में कहा गया है कि उर्वरक असंतुलन को कम करने और मृदा स्वास्थ्य सुधारने के लिए यूरिया की कीमतों में बढ़ोतरी तथा किसानों को वित्तीय प्रोत्साहन के माध्यम से संतुलित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा देना जरूरी है।

भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि की अहम भूमिका को रेखांकित करते हुए सर्वे में कहा गया है कि कृषि क्षेत्र ने अर्थव्यवस्था को स्थिरता प्रदान की है, लेकिन इसकी वृद्धि दर अभी अपेक्षाकृत कम है। कृषि एवं सहयोगी क्षेत्रों में जो वृद्धि दर्ज की गई है, उसका बड़ा हिस्सा गैर-कृषि उत्पादन से आया है। भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में विविधता बढ़ रही है और गैर-कृषि क्षेत्र आमदनी में अहम भूमिका निभा रहे हैं। हालांकि, स्किल गैप और प्रोडक्टिविटी में कमी जैसी चुनौतियां हैं।  

सर्वेक्षण में यह भी कहा गया है कि कृषि क्षेत्र में पूंजी निवेश काफी कम है और इसमें बढ़ोतरी आवश्यक है। इसके साथ ही खाद्य सुरक्षा कानून के तहत राशन प्रणाली में फूड वाउचर शुरू करने की सिफारिश भी की गई है।

उर्वरक असंतुलन बड़ी चिंता

उर्वरकों के असंतुलित उपयोग को सर्वेक्षण में गंभीर चिंता का विषय बताते हुए यूरिया की कीमतों में बढ़ोतरी की वकालत की है। साथ ही इनपुट सब्सिडी के बजाय प्रति एकड़ इनकम सपोर्ट देने का सुझाव दिया गया है। मृदा स्वास्थ्य और संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन पर विशेष जोर दिया गया है।

सर्वेक्षण में उर्वरकों के असंतुलित उपयोग को चिंताजनक बताया गया है। नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश (एनपीके) का आदर्श अनुपात 4:2:1 माना जाता है, जबकि वर्ष 2023–24 में यह बिगड़कर 10.9:4.1:1 हो गया। वर्ष 2009–10 में यह अनुपात 4:3.2:1 था। मृदा स्वास्थ्य के लिए इस असंतुलन को दूर करना जरूरी है। किसानों को दी जाने वाली सहायता के तरीके में भी सुधार करना होगा।

पीओएस मशीनों पर आधार आधारित प्रमाणीकरण लागू होने के बाद इंटीग्रेटेड फर्टिलाइजर मैनेजमेंट सिस्टम (IFMS) के माध्यम से सरकार के पास विस्तृत डेटा उपलब्ध है। सर्वे में कहा गया है कि इसी डेटा का उपयोग कर सुधार लागू किए जाने चाहिए।

ग्रामीण आय के लिए उत्पादकता बढ़ाना जरूरी

कृषि फसलों की उत्पादकता उस अनुपात में नहीं बढ़ रही है, जितनी किसानों की आय बढ़ाने के लिए आवश्यक है। इसलिए इस क्षेत्र में व्यापक सुधार की जरूरत बताई गई है। सर्वेक्षण में जोर दिया गया है कि ग्रामीण आय बढ़ाने के लिए प्राइस सपोर्ट की बजाय कृषि उत्पादकता को बढ़ाना होगा। साथ ही न्यूनत समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर अत्यधिक निर्भरता को लेकर भी आगाह किया है।

सर्वे में कहा गया कि मैन्युफैक्चरिंग पर आधारित एक्सपोर्ट ग्रोथ, ग्रामीण इलाकों में लंबे समय तक खुशहाली के लिए ज़रूरी है, क्योंकि सिर्फ़ खेती भारत के बढ़ते वर्कफ़ोर्स को नहीं संभाल सकती।

निर्यात में संभावनाएं

सर्वेक्षण में यह स्वीकार किया गया है कि देश के बढ़ते कार्यबल को सिर्फ खेती से रोजगार नहीं मिल सकता है, ग्रामीण क्षेत्रों में समृद्धि के लिए मैन्युफैक्चरिंग पर आधारित एक्सपोर्ट ग्रोथ भी आवश्यक है।

हाल में हुए मुफ्त व्यापार समझौतों से श्रम-आधारित एग्रो और फूड प्रोसेसिंग आधारित निर्यात की मांग बढ़ा सकते हैं, बशर्ते भारत वैश्विक प्रतिस्पर्धा में खरा उतरने वाले उत्पाद तैयार करे। 

जलवायु परिवर्तन की चुनौती

सर्वेक्षण में जलवायु परिवर्तन को कृषि क्षेत्र के लिए एक बड़ी चुनौती माना गया है। लगातार बेहतर मानसून से कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई है, जिससे खाद्य सुरक्षा मजबूत हुई है और महंगाई दर को नियंत्रित रखने में मदद मिली है। देश की खाद्य सुरक्षा के लिए जलवायु अनुकूल किस्मों के विकास, सटीक खेती और जल उपयोग में दक्षता पर जोर दिया गया है।  

कृषि विकास और निवेश 

कृषि के विकास और किसानों की आय सुनिश्चित करने के लिए सरकार की लगभग दो दर्जन योजनाओं का उल्लेख सर्वे में किया गया है। इसमें बताया गया है कि कृषि एवं सहयोगी क्षेत्रों की औसत वार्षिक वृद्धि दर (AAGR) का वैश्विक औसत 2.9 प्रतिशत से अधिक रहा है जबकि पिछले पांच वर्षों में भारत के मामले में यह औसत 4.4 प्रतिशत रहा है। चालू वित्त वर्ष मेंं कृषि और सहयोगी क्षेत्र की विकास दर का सर्वे में 3.1 फीसदी रहने का अनुमाना लगाया गया है।

हालांकि चालू वर्ष में कृषि एवं सहयोगी क्षेत्रों की वृद्धि दर मुख्य रूप से गैर-फसली क्षेत्रों की अधिक वृद्धि के कारण रही है। फसल उत्पादकता के मामले में देश में क्षेत्रीय असमानता बनी हुई है, जिसे प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना के माध्यम से दूर करने का प्रयास किया जाएगा।

कृषि में पूंजी निवेश की कमी को आंकड़े भी दर्शाते हैं। वर्तमान में देश के कुल सकल फसल क्षेत्र का केवल 55.8 प्रतिशत हिस्सा ही सिंचित है। इसमें भी तिलहन और दालों का क्षेत्रफल कम है, जबकि चावल, गेहूं और गन्ना जैसी फसलों में सिंचाई सुविधाएं अपेक्षाकृत अधिक हैं।

कृषि ऋण की स्थिति

सर्वे के अनुसार, चालू वित्त वर्ष में सरकार के 27.5 लाख करोड़ रुपये के कृषि ऋण लक्ष्य के मुकाबले  ग्राउंड लेवल क्रेडिट डिस्बर्समेंट 28.69 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। इसमें 15.39 लाख करोड़ रुपये अल्पकालिक ऋण (फसली ऋण) और 12.77 लाख करोड़ रुपये टर्म लोन शामिल हैं।

देश में वर्ष 1950 में कृषि ऋण का 90 प्रतिशत हिस्सा गैर-संस्थागत स्रोतों यानी साहूकारों से आता था, जो 2021–22 में घटकर 23.4 प्रतिशत रह गया है। हालांकि मौजूदा कृषि अर्थव्यवस्था के आकार को देखते हुए यह अनुपात अब भी चिंता का विषय है। इसका अर्थ है कि बड़ी संख्या में किसान आज भी साहूकारों से ऋण ले रहे हैं, जिन पर अक्सर 30 से 50 प्रतिशत तक ब्याज देना पड़ता है।

अनिश्चित माहौल में कृषि पर दारोमदार

वैश्विक माहौल में उथल-पुथल के बीच अर्थव्यवस्था की स्थिरता के लिए कृषि पर दारोमदार रहेगा। हालांकि, अनिश्चित माहौल में खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण आय और कृषि को वैश्विक झटकों और जलवायु जोखिम से बचाए रखना चुनौतीपूर्ण है।  

टिकाऊ ग्रामीण ग्रोथ के लिए सरकारी सहायता और खरीद की बजाय उत्पादकता, विविधता और फूड सिस्टम को टिकाऊ बनाने की तरफ जाना होगा। इसके लिए केंद्र, राज्यों और निजी क्षेत्र को मिलकर काम करना होगा।

कुल मिलाकर, आर्थिक सर्वेक्षण में कृषि क्षेत्र की समस्याओं के बावजूद यह कहा गया है कि विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने में कृषि की केंद्रीय भूमिका रहेगी। कृषि क्षेत्र ने अब तक उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन आगे की चुनौतियों और किसानों की आय में टिकाऊ वृद्धि के लिए बड़े स्तर पर संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता है।

 

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