अल नीनो ‘मजबूत’ होने के संकेत, सितंबर-नवंबर में भारत में सामान्य से कम बारिश की आशंका
एशिया-पैसिफिक क्लाइमेट सेंटर (APCC) ने अपने मासिक पूर्वानुमान में कहा है कि मौजूदा अल नीनो अब ‘मजबूत’ श्रेणी में पहुंच गया है और इसके फरवरी तक बने रहने की संभावना है। सितंबर से नवंबर के दौरान भारत में सामान्य से कम बारिश होने की संभावना है, जबकि दिसंबर से फरवरी के बीच मध्य भारत के कुछ हिस्सों में सामान्य से अधिक वर्षा की संभावना जताई गई है।
अल नीनो के आने वाले महीनों में और मजबूत होने की संभावना है। एशिया-पैसिफिक क्लाइमेट सेंटर (APCC) के ताजा मौसमी पूर्वानुमान के अनुसार, सितंबर 2026 से फरवरी 2027 के दौरान भारत में मौसम और बारिश के पैटर्न पर इसका असर पड़ सकता है। सितंबर से नवंबर की अवधि में देश में सामान्य से कम बारिश की संभावना जताई गई है, जबकि तापमान सामान्य से अधिक रहने का अनुमान है।
APCC ने 18 अगस्त को सितंबर 2026 से फरवरी 2027 के लिए अपना मल्टी-मॉडल एनसेंबल (MME) मौसमी पूर्वानुमान जारी किया। इसके ENSO अलर्ट सिस्टम में अल नीनो को प्रमुख जलवायु स्थिति बताया गया है और कहा गया है कि आने वाले मौसमों में अल नीनो का प्रभाव और विकसित हो सकता है।
पूर्वानुमान भारत के लिए चुनौतीपूर्ण मौसम की आशंका पैदा करता है। APCC ने सितंबर से नवंबर की अवधि में भारत के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से कम वर्षा की संभावना बढ़ने का संकेत दिया है। साथ ही, भारत और एशिया के बड़े हिस्से में तापमान सामान्य से अधिक रहने की संभावना है।

सितंबर-नवंबर में कम बारिश की आशंका
सितंबर से नवंबर 2026 के मौसम के लिए APCC ने भारत में सामान्य से कम वर्षा की संभावना बढ़ने का अनुमान लगाया है। पूर्वी उष्णकटिबंधीय हिंद महासागर, मैरिटाइम कॉन्टिनेंट और पश्चिमी उष्णकटिबंधीय प्रशांत क्षेत्र में भी सामान्य से कम बारिश की संभावना अधिक जताई गई है।
इसके अलावा, उपोष्णकटिबंधीय दक्षिण प्रशांत, उष्णकटिबंधीय उत्तरी अटलांटिक, पश्चिमी भूमध्यरेखीय अटलांटिक, मध्य अमेरिका, कैरेबियन और उत्तरी दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में भी सामान्य से कम वर्षा का अनुमान है।
हालांकि, दिसंबर 2026 से फरवरी 2027 की अवधि के लिए भारत में वर्षा का परिदृश्य कुछ अलग दिखाई देता है। APCC के अनुसार, मध्य भारत में सामान्य से अधिक वर्षा की प्रवृत्ति रह सकती है। मध्य और पूर्वी एशिया के कुछ हिस्सों में भी सामान्य से अधिक बारिश की संभावना जताई गई है।
इसका मतलब यह है कि सितंबर 2026 से फरवरी 2027 की पूरी अवधि में भारत में लगातार सामान्य से कम बारिश होने का अनुमान नहीं है। वर्षा की स्थिति अलग-अलग मौसम और क्षेत्रों के अनुसार बदल सकती है।
सामान्य से अधिक रह सकता है तापमान
सितंबर से नवंबर की अवधि में हिंद महासागर और एशिया के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से अधिक तापमान की प्रबल संभावना जताई गई है। अफ्रीका के बड़े हिस्से, भूमध्यसागरीय क्षेत्र, पश्चिमी यूरोप, आर्कटिक क्षेत्र, उष्णकटिबंधीय प्रशांत, दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया, कैरेबियन, मध्य अमेरिका और उत्तरी दक्षिण अमेरिका में भी सामान्य से अधिक तापमान रहने की संभावना है।
दिसंबर से फरवरी की अवधि में दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया, हिंद महासागर, अफ्रीका के अधिकांश हिस्सों, उष्णकटिबंधीय प्रशांत और उत्तरी ऑस्ट्रेलिया में सामान्य से अधिक तापमान का संकेत बना हुआ है।
भारत के लिए कम बारिश के जोखिम और सामान्य से अधिक तापमान का एक साथ होना महत्वपूर्ण है। इसका असर मिट्टी में नमी, जल संसाधनों और कृषि की परिस्थितियों पर पड़ सकता है।
अल नीनो रहेगा अहम जलवायु कारक
APCC के ENSO अलर्ट के अनुसार, सितंबर 2026 से फरवरी 2027 के दौरान अल नीनो प्रमुख जलवायु स्थिति बना रह सकता है और आने वाले महीनों में इसके और विकसित होने की संभावना है।
APCC ने Niño 3.4 इंडेक्स का भी पूर्वानुमान जारी किया है। यह मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में समुद्री सतह के तापमान में बदलाव को मापने वाला एक प्रमुख संकेतक है। इसके आधार पर अल नीनो और ला नीना की स्थिति तथा उनकी तीव्रता का आकलन किया जाता है।
अल नीनो की स्थिति तब बनती है जब मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। इससे वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण प्रभावित होता है और दुनिया के विभिन्न हिस्सों में बारिश तथा तापमान का पैटर्न बदल सकता है।
भारत में अल नीनो को ऐतिहासिक रूप से कमजोर मानसून और कम बारिश के बढ़े हुए जोखिम से जोड़ा जाता रहा है। हालांकि, इसका सीधा और हर बार एक जैसा प्रभाव नहीं होता। हिंद महासागर और अन्य वायुमंडलीय कारक भी भारतीय मानसून को प्रभावित करते हैं और अल नीनो के असर को बढ़ा या कम कर सकते हैं।
कृषि के लिए क्या मायने?
APCC का यह पूर्वानुमान भारतीय कृषि के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि सितंबर से नवंबर की अवधि दक्षिण-पश्चिम मानसून के अंतिम चरण और रबी फसलों की बुआई की तैयारी के समय से जुड़ी है।
इस दौरान सामान्य से कम बारिश होने पर उन क्षेत्रों में मिट्टी की नमी प्रभावित हो सकती है, जहां वर्षा कम होती है। जलाशयों में पानी का स्तर और भूजल रिचार्ज भी प्रभावित हो सकता है। इसका असर रबी फसलों के लिए सिंचाई की उपलब्धता पर पड़ सकता है।
हालांकि, इसका प्रभाव देशभर में एक जैसा नहीं होगा। दिसंबर से फरवरी की अवधि के लिए APCC ने मध्य भारत में सामान्य से अधिक वर्षा का संकेत दिया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि सर्दियों के दौरान क्षेत्रीय स्तर पर वर्षा की स्थिति बदल सकती है।

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